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...जीवन बचाने के लिए गंगा को बचाना जरूरी
Updated Fri, 14 Jul 2017 11:02 PM IST
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रतनमणी डोभाल
हरिद्वार।
गंगा नदी को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के कड़े फैसले एवं दिशा-निर्देश ने गंगा का अंधाधुंध दोहन करने वालों की बेचैनी बढ़ा दी है।
32 साल से गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जूझ रहे पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी मेहता का कहना है कि गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने पर अब तक 7 हजार करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी गंगा को एक किमी दायरे में भी प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सका है। मोदी सरकार ने 2019 तक गंगा को स्वच्छ, निर्मल व अविरल बनाने का दावा किया था, परंतु तीन साल में कुछ हुआ नहीं है। गंगा के नाम पर कुछ एनजीओ अवश्य फलफूल रहे हैं। गंगा को रोज पूजा भी जा रहा है और सड़ाया भी जा रहा है। गंगा को लेकर कोर्ट और एनजीटी के दिशा-निर्देश क्रियान्वित करने के लिए कोई जवाबदेह तंत्र नहीं होने से हालात बिगड़ते जा रहे हैं।
लंबी है गंगा के मुजरिमों की फेहरिस्त
हरिद्वार। गंगा नदी के मुजरिमों की फेहरिस्त काफी लंबी है। इनमें सबसे अधिक जिम्मेदार एचआरडीए है। धर्मनगरी के धर्मावलंबियों, पंडा-पुरोहितों व संतों-महंतों ने वर्ष 1985-86 के महाकुंभ की तैयारियों के समय गंगा में बढ़ते प्रदूषण, गिरते गंदे नालों और अनियोजित विकास से चिंतित होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मेला प्राधिकरण की स्थापित करने की मांग की थी ताकि गंगा को प्रदूषित होने और मेला भूमि को सुरक्षित रखा जा सके। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। शहर के गंदे नालों की निकासी गंगा में होने से प्रदूषण बढ़ रहा है। चंडीघाट नीलधारा, गंगा नदी में नमामि गंगे से जुुड़े लोगों ने ही कब्जा कर गंगा में सीवर डालकर उसे प्रदूषण कर रखा है। सिंचाई विभाग ने गंगा किनारे की भूमि पर अवैध कच्चे और महंतों के पक्के अवैध निर्माण कराकर गंगा का मर्ज बढ़ाने का काम किया है। गंगा पर घाटों के नाम पर संतों-महंतों ने आलीशान आशियाने बना रखे हैं। कुछ महंतों ने अपने आश्रमों के कर्मचारियों के आवास ही घाटों के अंदर बना रखे हैं। गंगा किनारे सरकारी भूमि पर कब्जा कर गो भक्ति के नाम पर गोशाला, डेयरी खोल रखी है और गंदगी गंगा में बहाई जा रही है। पंडा-पुरोहितों जिनकी गंगा की पवित्रता-मर्यादा व निर्मलता को बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, लेकिन नवउदारीकरण के दौर में वे सब भूलकर मालामाल होने की दौड़ में शामिल हो गए है।
हरिद्वार।
गंगा नदी को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के कड़े फैसले एवं दिशा-निर्देश ने गंगा का अंधाधुंध दोहन करने वालों की बेचैनी बढ़ा दी है।
32 साल से गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जूझ रहे पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ अधिवक्ता एमसी मेहता का कहना है कि गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने पर अब तक 7 हजार करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी गंगा को एक किमी दायरे में भी प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सका है। मोदी सरकार ने 2019 तक गंगा को स्वच्छ, निर्मल व अविरल बनाने का दावा किया था, परंतु तीन साल में कुछ हुआ नहीं है। गंगा के नाम पर कुछ एनजीओ अवश्य फलफूल रहे हैं। गंगा को रोज पूजा भी जा रहा है और सड़ाया भी जा रहा है। गंगा को लेकर कोर्ट और एनजीटी के दिशा-निर्देश क्रियान्वित करने के लिए कोई जवाबदेह तंत्र नहीं होने से हालात बिगड़ते जा रहे हैं।
लंबी है गंगा के मुजरिमों की फेहरिस्त
हरिद्वार। गंगा नदी के मुजरिमों की फेहरिस्त काफी लंबी है। इनमें सबसे अधिक जिम्मेदार एचआरडीए है। धर्मनगरी के धर्मावलंबियों, पंडा-पुरोहितों व संतों-महंतों ने वर्ष 1985-86 के महाकुंभ की तैयारियों के समय गंगा में बढ़ते प्रदूषण, गिरते गंदे नालों और अनियोजित विकास से चिंतित होकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मेला प्राधिकरण की स्थापित करने की मांग की थी ताकि गंगा को प्रदूषित होने और मेला भूमि को सुरक्षित रखा जा सके। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। शहर के गंदे नालों की निकासी गंगा में होने से प्रदूषण बढ़ रहा है। चंडीघाट नीलधारा, गंगा नदी में नमामि गंगे से जुुड़े लोगों ने ही कब्जा कर गंगा में सीवर डालकर उसे प्रदूषण कर रखा है। सिंचाई विभाग ने गंगा किनारे की भूमि पर अवैध कच्चे और महंतों के पक्के अवैध निर्माण कराकर गंगा का मर्ज बढ़ाने का काम किया है। गंगा पर घाटों के नाम पर संतों-महंतों ने आलीशान आशियाने बना रखे हैं। कुछ महंतों ने अपने आश्रमों के कर्मचारियों के आवास ही घाटों के अंदर बना रखे हैं। गंगा किनारे सरकारी भूमि पर कब्जा कर गो भक्ति के नाम पर गोशाला, डेयरी खोल रखी है और गंदगी गंगा में बहाई जा रही है। पंडा-पुरोहितों जिनकी गंगा की पवित्रता-मर्यादा व निर्मलता को बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, लेकिन नवउदारीकरण के दौर में वे सब भूलकर मालामाल होने की दौड़ में शामिल हो गए है।
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