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कैलाश से चलकर ससुराल पहुंचे भगवान आशुतोष
Updated Mon, 10 Jul 2017 10:43 PM IST
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कौशल सिखौला
हरिद्वार।
देवशयनी एकादशी के दिन जगे भगवान आशुतोष श्रावण के पहले सोमवार को अपनी ससुराल कनखल पहुंच गए। उन्होंने ससुर राजा दक्ष को दिया वचन निभाया। अब पूरे सावन यहीं रहकर भक्तों को दर्शन देंगे। भगवान शिवशंकर का मानस मिलन उस सती से भी हो गया, जिसने शिव प्रेम में यह पार्थिव देह अपमान की अग्नि में दग्ध कर दी थी। उनकी ससुराल में लाखों शिवभक्तों ने सूर्योदय से पूर्व महादेव का स्वागत किया।
काल के किसी खंड में भगवान शिव इसी नगरी में सती को ब्याहने आए थे। परंपराओं के अनुसार उनके आगमन पर अलसुबह पंडितों और महंतों ने शंख ध्वनि से भोलेनाथ का स्वागत किया। राजा दक्ष को दिया वचन निभाते हुए शिव शंकर मंदिर में एक महीने के लिए विराजमान हो गए। अब उनका साक्षात दर्शन खुली आंखों से भक्तों को होगा। कनखल कभी राजा दक्ष की राजधानी थी। दक्ष सृष्टि के अनादि देव ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। जिस स्थान पर जहां आज दक्ष मंदिर है, वहीं राजा दक्ष का महल था और भगवती सती इसी स्थल पर जन्मी थी। युवा होती सती का मानस प्रेम शिव से हो गया और वे उन्हें पाने के लिए शिव को निरंतर ध्यान करने लगी। ब्रह्मा की भांति शिव भी अनादि देव हैं। लेकिन दक्ष को शिव का नरमुंडधारी भूतभावन स्वरूप कतई पसंद नहीं था। एक बार जब दक्ष अपने पिता ब्रह्मा के दरबार में गए, तब सभी देवता खड़े हो गए, लेकिन अनादि शंकर आसन पर विराजमान रहे। दक्ष ने इसका बुरा मनाते हुए शिव से बैर की गांठ बांध ली। आगे चलकर जब सती सबकुछ छोड़कर यिव के प्रेम में लीन हो गई, तब न चाहते हुए भी पुत्री मोह में फंसे दक्ष को अपनी बेटी का विवाह शिव से करना पड़ा। इसी कनखल में भूतगणों के साथ शिव की बारात आई थी। कालांतर में राजा दक्ष ने जब कनखल में महायज्ञ किया तब सभी देवों को बुलाया, किंतु पुत्री सती और जामाता शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। पिता के घर इतना बड़ा यज्ञ होते देख सती बिन बुलाए कनखल पहुंच गई और पति का अपमान देखकर अपमान की अग्नि में दग्ध हो गई।
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तब भोलेनाथ ने महातांड़व किया और अपने गणों से दक्ष के यज्ञ को भंग करा दिया। वीरभद्र ने ऐसा कहर ढाया कि यज्ञ में भाग लेने आए 84 लाख देवता जख्मी होकर भाग खड़े हुए। कुपित वीरभद्र ने दक्ष का सिर धड़ से अलग कर दिया। समूचे ब्रह्मांड में त्राहि-त्राहि मच गई और सभी ऋषि मुनियों तथा देवताओं ने प्रार्थना कर शिव का कोप शांत कराया। दयालु शिव पसीजे और बकरे का सिर दक्ष के धड़ पर रखकर उन्हें जीवनदान दिया। जब राजा दक्ष ने शिवाष्टक द्वारा शिव का वंदन किया। दक्ष की प्रार्थना पर शिव ने दक्ष को वचन दिया कि वे प्रत्येक सावन में दक्षेश्वर बनकर कनखल में विराजमान होंगे। तब से दक्ष को दिया वचन निभाने को सावन के पहले दिन भोले भंडारी कनखल आ जाते हैं। सती की पार्थिव देह लेकर शिव दिंगत में घूमे और उनके अंग टूटकर गिरते रहे। बावन स्थानों पर सती के अंग गिरे। वहीं आज 52 शक्ति पीठ आसीन हैं। सावन मास शिव के ससुराल आने का पावन दिन है।
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