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आधे उतराखंड की राजभाषा रही है कुमाऊंनी
Updated Sun, 02 Sep 2018 02:12 AM IST
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आधे उत्तराखंड की राजभाषा रही है कुमाऊंनी
ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। आज सीमित क्षेत्र में सिमट चुकी कुमाऊंनी कभी आधे उत्तराखंड की राजभाषा हुआ करती थी। कुमाऊं के पूरे क्षेत्र में कुमाऊंनी भाषा में ही राजकाज होता था। कुमाऊंनी का इतिहास हिंदी से भी पुराना है। इसलिए सरकार को कुमाऊंनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना चाहिए।
शनिवार को प्रेस क्लब में आयोजित कुमाऊंनी भाषा दिवस के अवसर पर वक्ताओं ने यह विचार रखे। पर्वतीय राज्य मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सबसे पहले खटीमा गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित की गई। कार्यक्रम के संयोजक अनुज जोशी ने कहा कि एक सितंबर को खटीमा में अलग राज्य बनाने के आंदोलन के लिए कई लोग शहीद हुए थे।
संस्कृतिकर्मी गिरीश सनवाल ने हिंदी की तर्ज पर कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस को मान्यता दिए जाने की आवश्यकता जताई। मंच अध्यक्ष गंभीर सिंह जयाडा ने कहा कि एक सितंबर को खटीमा और दो सितंबर को मसूरी गोलीकांड के शहीदों और राज्य की मूल भावना को बनाए रखने के लिए भाषा दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। ललित जोशी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार अगले डेढ़ सौ वर्ष में कई बोलियां और भाषाएं खत्म हो जाएंगी। रघुवीर बिष्ट ने कहा कि सब लोग अपने बच्चों को गढ़वाली और कुमाऊंनी आवश्यक सिखाएं।
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अध्यक्षता करते हुए कूर्मांचल परिषद के अध्यक्ष कमल रजवार ने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा का ज्ञान आसानी से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है। साहित्यकार भारती पांडे ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा में प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। लेखक राजेंद्र पंत ने लोकभाषाओं के इतिहास की जानकारी दी। इस अवसर पर लोक गायिका मीना राणा, मीना बिष्ट, जितेंद्र पंवार, मोहित कुमार, विजय शर्मा, संजय कुमोला आदि मौजूद रहे।
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ब्यूरो/अमर उजाला
देहरादून। आज सीमित क्षेत्र में सिमट चुकी कुमाऊंनी कभी आधे उत्तराखंड की राजभाषा हुआ करती थी। कुमाऊं के पूरे क्षेत्र में कुमाऊंनी भाषा में ही राजकाज होता था। कुमाऊंनी का इतिहास हिंदी से भी पुराना है। इसलिए सरकार को कुमाऊंनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना चाहिए।
शनिवार को प्रेस क्लब में आयोजित कुमाऊंनी भाषा दिवस के अवसर पर वक्ताओं ने यह विचार रखे। पर्वतीय राज्य मंच की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सबसे पहले खटीमा गोलीकांड के शहीदों को श्रद्धांजली अर्पित की गई। कार्यक्रम के संयोजक अनुज जोशी ने कहा कि एक सितंबर को खटीमा में अलग राज्य बनाने के आंदोलन के लिए कई लोग शहीद हुए थे।
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संस्कृतिकर्मी गिरीश सनवाल ने हिंदी की तर्ज पर कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषा दिवस को मान्यता दिए जाने की आवश्यकता जताई। मंच अध्यक्ष गंभीर सिंह जयाडा ने कहा कि एक सितंबर को खटीमा और दो सितंबर को मसूरी गोलीकांड के शहीदों और राज्य की मूल भावना को बनाए रखने के लिए भाषा दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। ललित जोशी ने बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार अगले डेढ़ सौ वर्ष में कई बोलियां और भाषाएं खत्म हो जाएंगी। रघुवीर बिष्ट ने कहा कि सब लोग अपने बच्चों को गढ़वाली और कुमाऊंनी आवश्यक सिखाएं।
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अध्यक्षता करते हुए कूर्मांचल परिषद के अध्यक्ष कमल रजवार ने कहा कि स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल कर गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा का ज्ञान आसानी से अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है। साहित्यकार भारती पांडे ने कहा कि कुमाऊंनी भाषा में प्रचुर साहित्य उपलब्ध है। लेखक राजेंद्र पंत ने लोकभाषाओं के इतिहास की जानकारी दी। इस अवसर पर लोक गायिका मीना राणा, मीना बिष्ट, जितेंद्र पंवार, मोहित कुमार, विजय शर्मा, संजय कुमोला आदि मौजूद रहे।