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खलंगा मेले में शहीदों की वीरता को याद किया
Updated Mon, 26 Nov 2018 01:51 AM IST
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ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
बलभद्र खलंगा विकास समिति की ओर से आयोजित 44वें खलंगा मेले में शहीदों की वीरता और साहस को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। नालापानी स्थित बलभद्र स्मारक में रविवार को आयोजित मेले में हुए वन भोज में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। मेले में कलाकारों ने गोरखाली, गढ़वाली एवं कुमाऊंनी लोकनृत्यों की प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। साथ ही मेले में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के स्टॉल भी लगाए गए।
समिति के पूर्व उपाध्यक्ष कर्नल एसएम शाही (रि.) ने बताया कि 1814 में हुए आंग्ल गोरखा युद्ध के बाद 24 अप्रैल 1815 में शुबाटु, नाहन हिमाचल प्रदेश और अल्मोड़ा में तीन गोरखा पलटनों की स्थापना हुई। इसके बाद आठ गोरखा पलटनों का और गढ़वाल व कुमाऊं पलटनों की स्थापना हुई। इस मौके पर समिति के पूर्व अध्यक्ष राम सिंह थापा ने मांग की कि युद्ध स्मारक और सागरताल की सुरक्षा के लिए हल्दू आम में वन विभाग की अेार से काम किया जाए। साथ ही सागरताल में नाले के कटाव को रोकने के लिए पुस्ता बनाने, मेला आयोजन स्थल का सौंदर्यीकरण करने, मंच का निर्माण एवं पंचायत द्वारा आवंटित भूमि पर समिति का कार्यालय बनाने और बैठक कक्ष का निर्माण कराने की सरकार से मांग की गई।
इस मौके पर पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट, गोरखाली सुधार सभा के अध्यक्ष पदम सिंह थापा, ब्रिगेडियर पीएस गुरूंग, ब्रिगे. सीबी थापा, कर्नल सीबी थापा, समिति अध्यक्ष कर्नल डीएस खड़का, उपाध्यक्ष बीनू गुरूंग, सचिव जितेंद्र खत्री, शशिकांत शाही, पूजा सुब्बा, सुखमान, डीएस भंडारी, नरेंद्र गुरूंग, गोपाल राना, दीपक कार्की, कृष्ण प्रसाद, किशन सिंह पंवार, एलबी गुरूंग, कर्नल बीएस क्षेत्री आदि मौजूद रहे।
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बलभद्र खलंगा विकास समिति की ओर से आयोजित 44वें खलंगा मेले में शहीदों की वीरता और साहस को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। नालापानी स्थित बलभद्र स्मारक में रविवार को आयोजित मेले में हुए वन भोज में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। मेले में कलाकारों ने गोरखाली, गढ़वाली एवं कुमाऊंनी लोकनृत्यों की प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। साथ ही मेले में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के स्टॉल भी लगाए गए।
समिति के पूर्व उपाध्यक्ष कर्नल एसएम शाही (रि.) ने बताया कि 1814 में हुए आंग्ल गोरखा युद्ध के बाद 24 अप्रैल 1815 में शुबाटु, नाहन हिमाचल प्रदेश और अल्मोड़ा में तीन गोरखा पलटनों की स्थापना हुई। इसके बाद आठ गोरखा पलटनों का और गढ़वाल व कुमाऊं पलटनों की स्थापना हुई। इस मौके पर समिति के पूर्व अध्यक्ष राम सिंह थापा ने मांग की कि युद्ध स्मारक और सागरताल की सुरक्षा के लिए हल्दू आम में वन विभाग की अेार से काम किया जाए। साथ ही सागरताल में नाले के कटाव को रोकने के लिए पुस्ता बनाने, मेला आयोजन स्थल का सौंदर्यीकरण करने, मंच का निर्माण एवं पंचायत द्वारा आवंटित भूमि पर समिति का कार्यालय बनाने और बैठक कक्ष का निर्माण कराने की सरकार से मांग की गई।
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इस मौके पर पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट, गोरखाली सुधार सभा के अध्यक्ष पदम सिंह थापा, ब्रिगेडियर पीएस गुरूंग, ब्रिगे. सीबी थापा, कर्नल सीबी थापा, समिति अध्यक्ष कर्नल डीएस खड़का, उपाध्यक्ष बीनू गुरूंग, सचिव जितेंद्र खत्री, शशिकांत शाही, पूजा सुब्बा, सुखमान, डीएस भंडारी, नरेंद्र गुरूंग, गोपाल राना, दीपक कार्की, कृष्ण प्रसाद, किशन सिंह पंवार, एलबी गुरूंग, कर्नल बीएस क्षेत्री आदि मौजूद रहे।
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