{"_id":"11-53075","slug":"Dehradun-53075-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"जल-जंगल-जमीन बचाने निकलेंगे सर्वोदयी कार्यकर्ता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जल-जंगल-जमीन बचाने निकलेंगे सर्वोदयी कार्यकर्ता
Dehradun
Updated Fri, 16 Nov 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन
देहरादून। जल-जंगल और जमीन से पूंजीपतियाें का आधिपत्य समाप्त करने के लक्ष्य से अखिल भारतीय सर्वोदय मंडल (सर्व सेवा संघ) और नदी बचाओ अभियान की ओर से ‘राष्ट्रीय स्वराज अभियान यात्रा’ निकाली जाएगी। 20 नवंबर को दून से प्रारंभ होने वाली यात्रा नौ दिसंबर को दिल्ली स्थित महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर समाप्त होगी। वहां कार्यकर्ता 48 घंटे का उपवास भी रखेंगे। प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल और ब्रह्मदेव शर्मा यात्रा को हरी झंडी दिखाएंगे। यात्रा में देशभर के सर्वोदयी कार्यकर्ता, पर्यावरणविद और समाजसेवी शामिल होंगे।
इन स्थानों से गुजरेगी यात्रा
देहरादून, नौगांव, उत्तरकाशी, घनसाली, तिलवाड़ा (रुद्रप्रयाग), श्रीनगर, उफरैंखाल, सतपुली, कोटद्वार, ऋषिकेश, पौंटा साहिब, हरियाणा, पश्चिमी उप्र, दिल्ली
इन विषयों पर रहेगा फोकस
-एक दशक में देश की एक करोड़ 80 लाख हेक्टेअर खेती की जमीन खत्म हो गई। इसकी जगह एक्सप्रेस हाइवे, विशेष आर्थिक क्षेत्र, बांध, विद्युत परियोजनाएं, औद्योगिक क्षेत्र और शहर बस गए हैं।
-भारतीय कृषि को अमेरिकी व्यवस्था के अनुरूप चलाने के हानिकारक परिणाम सामने आए हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंचा है।
विज्ञापन
-नदियां लोगों की खुशहाली, संस्कृति का आधार हुआ करती थीं, लेकिन अब यह पूंजीपतियों की कमाई का साधन बन गई हैं।
कुछ समय से ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा रहा है, जिससे किसान यह सोचने लगे हैं कि खेती अब लाभ का सौदा नहीं रही। ऐसे में वे मजबूरी में जमीनें बेच रहे हैं। यात्रा का उद्देश्य किसानों को खेती के लिए जागरूक करना और सरकार से ऐसी नीतियां बनवाना है, जिनसे पूंजीपति देश की संपदा का अपने फायदे के लिए दोहन न कर सकें।
-सुरेश भाई, अध्यक्ष सर्वोदय मंडल उत्तराखंड
विज्ञापन
इन स्थानों से गुजरेगी यात्रा
देहरादून, नौगांव, उत्तरकाशी, घनसाली, तिलवाड़ा (रुद्रप्रयाग), श्रीनगर, उफरैंखाल, सतपुली, कोटद्वार, ऋषिकेश, पौंटा साहिब, हरियाणा, पश्चिमी उप्र, दिल्ली
इन विषयों पर रहेगा फोकस
-एक दशक में देश की एक करोड़ 80 लाख हेक्टेअर खेती की जमीन खत्म हो गई। इसकी जगह एक्सप्रेस हाइवे, विशेष आर्थिक क्षेत्र, बांध, विद्युत परियोजनाएं, औद्योगिक क्षेत्र और शहर बस गए हैं।
विज्ञापन
-भारतीय कृषि को अमेरिकी व्यवस्था के अनुरूप चलाने के हानिकारक परिणाम सामने आए हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से जमीन की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंचा है।
विज्ञापन
-नदियां लोगों की खुशहाली, संस्कृति का आधार हुआ करती थीं, लेकिन अब यह पूंजीपतियों की कमाई का साधन बन गई हैं।
कुछ समय से ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा रहा है, जिससे किसान यह सोचने लगे हैं कि खेती अब लाभ का सौदा नहीं रही। ऐसे में वे मजबूरी में जमीनें बेच रहे हैं। यात्रा का उद्देश्य किसानों को खेती के लिए जागरूक करना और सरकार से ऐसी नीतियां बनवाना है, जिनसे पूंजीपति देश की संपदा का अपने फायदे के लिए दोहन न कर सकें।
-सुरेश भाई, अध्यक्ष सर्वोदय मंडल उत्तराखंड