अंबाती रायुडू को क्रिकेट जगत एक ऐसे खिलाड़ी के तौर याद करेगा, जो अपनी दुर्लभ क्रिकेट प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पाया। बहुमुखी प्रतिभा का धनी एक खिलाड़ी जो खेल नहीं राजनीति के मैदान पर हार गया। विश्व कप टीम में नजरअंदाज किए जाने से बेहद दुखी होकर रायुडू ने बुधवार को हमेशा-हमेशा के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया।
टीम में नंबर चार पोजिशन के प्रबल दावेदार रहे अंबाती की जगह विजय शंकर को विश्व कप स्क्वॉड में जगह मिली थी, तब से ही रायुडू अंदर ही अंदर घुट रहे थे। आलोचनाओं के बाद बीसीसीआई ने जरूर रिजर्व खिलाड़ी बनाया, लेकिन जरूरत पड़ने पर एक बार फिर उन्हें नजरअंदाज करते हुए किसी और को जगह दे दी गई।
अपने मुखर स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले रायुडू ने बीसीसीआई को किए मेल में किसी पर अपने संन्यास का दोष नहीं मढ़ा। अपने कप्तानों का धन्यवाद किया। मनमौजी व्यक्तित्व के लिए पहचाने जाने वाले 33 वर्षीय रायुडू की माने तो उनके संन्यास को विजय शंकर की जगह मयंक अग्रवाल को टीम में शामिल किए जाने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
अपने लंबे क्रिकेट करियर में आंध्र प्रदेश के इस खिलाड़ी ने बेहद उतार-चढ़ाव देखा। टीम इंडिया के लिए 55 वन-डे इंटरनेशनल और छह टी-20 खेलने वाले इस खिलाड़ी ने 16 साल की उम्र में ही बल्ले से तहलका मचा दिया था। 2002 में अंडर-19 क्रिकेट खेलते हुए इंग्लैंड के खिलाफ 177 रनों की ताबड़तोड़ पारी खेली। इसके ठीक बाद उन्होंने रणजी में धमाकेदार डेब्यू किया।
हैदराबाद के लिए खेलते हुए उन्होंने डबल सेंचुरी लगाई। साल 2004 में अंडर-19 टीम की कप्तानी की। शिखर धवन, आरपी सिंह, दिनेश कार्तिक जैसे खिलाड़ियों से सजी टीम की अगुवाई करते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया। हालांकि, अगले कुछ सीजन अच्छे नहीं बीते। एक तरफ बल्ले से रन नहीं निकल रहे थे तो दूसरी ओर कोच और फिर अंपायर से लड़ बैठे।