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घालमेल: पहलवानों के विरोध के बीच खेल की सत्ता और सत्ता का खेल
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पहलवानों का प्रदर्शन
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
सत्ता का दंभ अक्सर सिर चढ़कर बोलता है। टेलीविजन पर दिखने-दिखाने के चक्कर में आजकल दिखावा भी ज्यादा हो रहा है। आज राज की नीति हो, लोकप्रियता का क्रिकेट हो या मशक्कत भरी कुश्ती हो, सभी खेल सत्ता के दंभ में दबे ही दिखते है। खेलों की लोकप्रियता सत्ता को भी प्रिय होती है। जनसेवक जब खेल की सेवा करने का दावा करते हैं, तो उनका आशय सिर्फ खेल की सत्ता से सत्ता का खेल खेलना भर होता है। वहीं जब खिलाड़ी खेल की सेवा करने उतरते हैं, तो उनका आशय अपनी लोकप्रियता और धन से सत्ता की सेवा में लगना ही रह जाता है। ऐसा ही काफी-कुछ पिछले दिनों देखने में आया। समाज को अपने चुने गए जनसेवकों और लोकप्रिय बना दिए गए खिलाड़ियों से सवाल करने होंगे। आखिर ये बेवजह का दंभ क्यों दर्शाते हैं?
कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के कुश्ती पहलवानों ने भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष पर जघन्य आरोप लगाए हैं। जांच की मांग के साथ पदक विजेता पहलवान दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं। लंबे समय से कुश्ती संघ के अध्यक्ष पद पर काबिज राजनेता केंद्रीय सत्ताधारी दल के छह बार के सासंद भी हैं। कुश्ती संघ अध्यक्ष पर लगते रहे आरोपों की सूची लंबी है। उन्होंने खुद कभी पहलवानी की या नहीं, पता नहीं, लेकिन अपने रूतबे से कुश्ती की पहलवानी कराने-चलाने की जिम्मेदारी लंबे समय से चला रहे हैं। उनके अनुसार, कुश्ती लड़ने-भिड़ने का खेल है, और इसलिए उनके जैसा बाहुबली ही इस खेल को चला सकता है।
दूसरी तरफ आनंद और रोमांच से भरे शानदार प्रतिद्वंद्विता के आइपीएल क्रिकेट में भी घिनौने दृश्य देखे गए। बंगलूरू घरेलू मैच में लखनऊ से हारा, तो घर पर लखनऊ भी बंगलूरू से हार गया। मैदान पर एक-दूसरे के समर्थक दर्शकों को दिल्ली के जांबाज क्रिकेट खिलाड़ियों ने उकसाया और भड़काया। और खुद भी लड़-भिड़ गए। खेल का मैदान गाली-गलौज से भरा गली का नुक्कड़ बना दिखा। बस हाथ-बल्ले ही नहीं चले। बाकी मैदान का माहौल तो बदरंगा ही बना। झंझट-झगड़े के एक तरफ सफल कप्तान और महानतम बल्लेबाज थे, तो दूसरी तरफ सफल बल्लेबाज और दिल्ली से लोकसभा सांसद। दोनों अपनी-अपनी खुन्नस में दर्शकों को दंभ का बाहुबल दिखाने में लगे थे। क्रिकेट खेल भी इतना गजब है कि दोनों को खुन्नस और खुशी दर्शाने का बराबर मौका मिला। दोनों अपने-अपने दंभी व्यवहार में घिरे, और चरित्र में गिरे ही नजर आए।
फिर सवाल उठता है कि क्या लड़ाकू-जुझारू मानसिकता ही खेल की असल-सफल व्यवहारिकता है? और क्यों लोकतंत्र में सत्ता को बाहुबल और भीड़तंत्र से चलाने की कोशिशें होती हैं? खेल की सत्ता क्या खेल से भी बड़ी हो सकती है? और क्यों सत्ता के खेल को खेल भावना से नहीं खेला जा सकता? खेल प्रतिभा के खेलने से ही खिलता है और सत्ता सेवा के समर्पण से ही चलती है। भीड़तंत्र में भिड़ने की प्रतिभा को ही आज का मीडिया सनसनीखेज़ बना कर दर्शाता है। उसी सनसनी से बने सितारे फिर बाज़ार गणित के काम आते हैं। आम लोगों से अलग दिखने की होड़ में ही खिलाड़ी और सत्तासीन दंभ दर्शाते दिखते हैं।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आज केवल बदरंग सत्तासीन और मुंह-चिढ़ाऊ खिलाड़ी ही हैं। अच्छे-सच्चे जनसेवक और प्रतिभा के धनी खिलाड़ियों से ही समाज चलता-फलता-फूलता रहा है। हमारे समय में टेनिस के अगासी, सेम्प्रास, फैडरर थे, तो फुटबॉल के मेस्सी, सालाह और केविन डी ब्रुइन हैं, या फिर क्रिकेट में अपने कपिल देव, कुंबले और तेंदुलकर। ये सभी प्रतिभा के धनी और व्यवहारिकता के गुणी रहे। बेशक आज सत्तासीन में नैतिकता न दिखती हो मगर सबसे विशाल लोकतंत्र सत्ता के आदर्श से ही चलता आ रहा है। इन खिलाड़ियों से ही खेल सफल और लोकप्रिय होता है। जनसेवकों से ही जनतंत्र जीवट और जीवित है। खेल के रोमांच का और नीति की सभ्यता का विकास होता रहेगा।
ह्वाट्सएप पर किसी ने ठीक ही कहा, ‘जो कुछ भी हम आजकल सुनते हैं, वे विचार हैं तथ्य नहीं। और जो कुछ भी हम आजकल देखते हैं, वह दृष्टिकोण है सत्य नहीं।’