फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Worry about saving air

हवा को बचाने की फिक्र

Tue, 02 Jan 2018 06:10 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Updated Tue, 02 Jan 2018 06:10 PM IST
विज्ञापन
Worry about saving air
अनिल प्रकाश जोशी

पिछला वर्ष वायु प्रदूषण को लेकर काफी चर्चित रहा। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट काफी डरावनी थी, जिसमें कहा गया कि दुनिया में औसतन वायु प्रदूषण 300 पीपीएम पहुंच गया, जिसे 100 से ऊपर नहीं होना चाहिए था। मतलब तमाम पृथ्वी में मनुष्य द्वारा चल रही गतिविधियां इसकी सीधी दोषी हैं। जाहिर है, वर्ष 2018 में भी यह चुनौती बरकरार रहेगी।


loader

दुनिया के 20 बड़े देश 96,000 अरब डॉलर के मालिक हैं और ये सब उद्योगों की ही कृपा है। इन देशों की जीवन शैली ऐसी हो चुकी है, जिससे प्रदूषण पैदा होता है। इनमें से छह देश, जिनमें चीन और अमेरिका भी शामिल हैं, अकेले 60 फीसदी प्रदूषण के कारक हैं। चीन की उद्योगों पर आधारित अर्थव्यवस्था अकेले 30 फीसदी हवा को प्रदूषित करने की दोषी है।

विकास की जिस दौड़ में सब जुटे हैं, वह एक तरह का पागलपन है। सभी देशों की नजर जीडीपी पर टिकी है और जिसका बड़ा आधार उद्योग ही हैं। ज्यादातर उद्योगों के उत्पाद विलासिता को बढ़ावा देने के लिए हैं। अब देखिए, पिछले 50 वर्षों में सड़कों पर गाड़ियों की संख्या कई गुना बढ़ गई। आज 1.35 अरब वाहन विषैला धुंआ उगल रहे हैं और 2025 तक इनकी संख्या दो अरब होगी। ऐसे ही हालात भारत में हैं, गत वर्ष प्राण वायु को लेकर पर्यावरण में सबसे बड़ी चर्चा रही। वैसे गंगा व नदियों को लेकर यात्राएं भी हुईं, पर बड़ा सवाल हवा को लेकर ही था और क्यों न हो, क्योंकि हर व्यक्ति को हर पल सांस तो लेनी ही है। उसे नई दुनिया से कुछ मिले न मिले, पर हवा का तो उसका अधिकार सुरक्षित रहे। वायु को प्राण के साथ जोड़ा गया है, क्योंकि इसके बिना जीवन संभव नहीं। किसी भी व्यक्ति के लिए प्रतिदिन 2.6 से 3.5 किलोग्राम ऑक्सीजन चाहिए, जिसके बदले वह 1.043 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ता है। यह भी समझना होगा कि एक वृक्ष एक दिन में 0.0597 किलोग्राम कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण करता है और 0.3234 किलोग्राम ऑक्सीजन छोड़ता है। इसलिए जरूरी है कि वृक्ष व जीवों की सुरक्षा के बीच ठीक तालमेल हो।

देश की राजधानी दिल्ली एक बड़े गैस चैंबर के रूप में बदल गई है। सामान्य दिनों में भी वहां पीएम का आंकड़ा 250 से ऊपर रहता है और पिछली दिवाली में भी और उसके बाद भी कई इलाकों में ये 900 से ऊपर जा चुका था। स्मॉग व धुंध का साथ यहां हर जाड़ों में भयानक स्थितियां पैदा कर देता है। अब ऐसा क्यों न हो, दिल्ली में पिछले दस वर्षों में वाहनों की संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई है। बची-खुची कसर पंजाब-हरियाणा की पराली पूरी कर देती है।

अगर दिल्ली को छोड़ दें, तो भी अपने देश में वायु प्रदूषण एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। आंकड़े दर्शाते हैं कि देश का कोई भी बड़ा शहर वायु प्रदूषण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं बचा। इसमें कानपुर, इलाहाबाद, बंगलूरू, कोलकाता और विशाखापट्टनम सभी हैं। 2017-18 में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में लुधियाना, आगरा, अमृतसर, फिरोजाबाद, अहमदाबाद, ग्वालियर व पटना भी जुड़ गए। इन शहरों में कार्बन डाईऑक्साइड सबसे ज्यादा मात्रा में तो पाई ही गई, नाइट्रस ऑक्साइड भी दूसरे नंबर पर तेजी से प्रदूषकों में अपनी जगह बना रही है।

जिस तरह के हालात हैं, वे एक बड़े पर्यावरण आंदोलन को जन्म देने वाले हैं। यही हाल रहा, तो तय मानिए कि आने वाले कुछ ही वर्षों में हम मूक क्रांति को जन्म देंगे, जिससे देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हालात ढेर हो जाएंगे। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed