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क्यों बोझ बन गई एसजीबी: सोने की महंगाई बड़ा कारण, जरूरतों के आधार पर निवेश करें तभी वित्तीय लक्ष्य हासिल होंगे
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सोना (फाइल)
- फोटो :
ANI
विस्तार
सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (एसजीबी) के बंद हो जाने से सोने, खासकर स्वर्ण बॉन्ड या स्वर्ण म्यूचुअल फंड में निवेश करने वालों के लिए निवेश का एक साधन कम हो गया है। वर्ष 2015 में लॉन्च की गई एसजीबी योजना को भौतिक स्वर्ण के विकल्प के रूप में पेश किया गया था, ताकि इस पीली धातु को खरीदने वालों को हतोत्साहित किया जा सके और सोने में निवेश करने के इच्छुक लोगों को एक विकल्प प्रदान किया जा सके। इस निवेश योजना के खास लाभ-भौतिक सोना रखने की चिंता से मुक्ति, सोने की कीमत में बढ़ोतरी होने पर लाभ, नियमित ब्याज आय, कोई निर्माण शुल्क या भंडारण लागत नहीं और सुरक्षित निवेश- बताए गए थे। इसे एक ऐसी निवेश योजना कहा गया था, जिसमें निवेशकों को सोने की कीमत में वृद्धि और निश्चित ब्याज, दोनों का लाभ मिलता है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत सरकार की ओर से ये सरकार समर्थित प्रतिभूतियां (सिक्योरिटीज) जारी कीं। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की परिपक्वता अवधि आठ वर्ष रखी गई और निवेशकों को कूपन भुगतान तिथियों पर पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद ही समय से पहले इसे भुनाने की अनुमति दी गई थी। इसके अलावा, निवेशकों को बॉन्ड की परिपक्वता से एक महीने पहले इसकी सूचना देने और 2.5 फीसदी का निश्चित वार्षिक ब्याज देने का प्रावधान था। दरअसल, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण यह था कि इसे एक सुरक्षित निवेश उपकरण माना जाता है, क्योंकि सोने की कीमतें बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रति कम संवेदनशील होती हैं। सोने की लोकप्रियता और व्यापक मांग के कारण, ऐसी संपत्तियों की कीमतें समय के साथ काफी बढ़ जाती हैं, जो एक अत्यधिक संभावित निवेश मार्ग है।
शुरू में कुछ वर्षों तक सब कुछ ठीक चल रहा था और इस योजना की बढ़ती लोकप्रियता तथा बढ़ती हुई मांग को देखते हुए रिजर्व बैंक हर साल बॉन्ड की कई किश्तें जारी करता था। हालांकि, पिछले दशक में सोने की बढ़ती कीमत ने रिजर्व बैंक को अलग तरह से प्रभावित करना शुरू कर दिया, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड का प्रबंधन करना महंगा हो गया। बजट दस्तावेज के विश्लेषण से पता चलता है कि एसजीबी पर सरकार की देनदारियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन इन बॉन्ड से उसकी प्राप्तियां तुलनात्मक रूप से कम रही हैं। इसके अलावा, एसजीबी का मुख्य उद्देश्य सोने के आयात पर अंकुश लगाना था, जो हासिल नहीं हो पाया। एक दशक पहले जब इसकी शुरुआत की गई थी, तो सरकार को लगा कि वह एसजीबी जारी करके सोने के आयात को सीमित कर लेगी और अपने चालू खाता घाटे को स्थायी सीमा के भीतर नियंत्रित कर सकती है।
चूंकि, एसजीबी को सॉवरेन गारंटी का समर्थन प्राप्त था, और बॉन्डधारकों को ब्याज भी प्रदान करता था, इसलिए मंत्रालय के भीतर यह सोच थी कि यह योजना कामयाब है। बॉन्ड पर 2.5 फीसदी ब्याज अन्य सरकारी प्रतिभूतियों पर लागू 8-9 फीसदी ब्याज से बहुत कम था, जिसका मतलब था कि यह योजना सरकार के लिए फायदेमंद होगी। हालांकि, यह सब सोने की कीमतों के लंबे समय तक स्थिर रहने पर भी निर्भर करता था। जिस तरह से यह योजना तैयार की गई, उसमें सरकार को न केवल सोने के बॉन्ड पर 2.5 प्रतिशत ब्याज देना होगा, बल्कि उसे बॉन्डधारक को सोने की मौजूदा कीमत पर राशि चुकानी होगी, न कि उस कीमत पर, जिस पर बॉन्ड खरीदे गए थे। उदाहरण के लिए 17 मार्च, 2017 को जारी एसजीबी 2016-17 सीरीज IV को ही लीजिए, जिसका निर्गम मूल्य 2,943 रुपये प्रति ग्राम था, और इसमें ऑनलाइन आवेदन करने वाले निवेशकों के लिए 50 रुपये की छूट शामिल थी।
17 मार्च, 2025 को अंतिम शोधन मूल्य (भुनाने पर मिलने वाली राशि) इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन लिमिटेड द्वारा प्रकाशित सोने (999 शुद्धता) के औसत मूल्य के आधार पर 8,624 रुपये प्रति ग्राम निर्धारित किया गया है। इसका मतलब यह है कि कुल मिलाकर, निवेशक ने ब्याज के अतिरिक्त आठ वर्षों में 193 फीसदी का रिटर्न कमाया। यह योजना उन निवेशकों के लिए अच्छी थी, जो सोने की बढ़ती कीमत पर दांव लगाते थे। पिछले एक दशक में सोने की कीमत में भारी वृद्धि देखी गई। वर्ष 2015 में 10 ग्राम सोने की कीमत लगभग 26,000 रुपये थी, जो अब बढ़कर 88,000 रुपये से अधिक हो गई। यह लगभग 3.5 गुना वृद्धि है, जिसे सरकार ने योजना शुरू करते समय ध्यान में नहीं रखा था। यह भी स्पष्ट नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में इस योजना में किसी भी बदलाव पर पुनर्विचार किया गया या नहीं, खासकर तब, जब सरकार अपनी देनदारियों को कम करना चाह रही हो।
सरकार ने एक और गलत कदम उठाया, वह यह कि उसने निवेशकों को 2017 में एसजीबी में निवेश की सीमा 0.5 किलोग्राम से बढ़ाकर चार किलोग्राम सोने तक करने की अनुमति दे दी। ऐसा यह मानकर किया गया कि सोने की कीमत में यदि बढ़ोतरी होगी भी, तो वह मामूली ही होगी और सरकार बॉन्ड जारी करते समय अपनी देनदारियों का प्रबंधन करने में सक्षम होगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पर संभावित देनदारियों के 2032 तक 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाने की संभावना है, जो एसजीबी के डिजाइन और जुलाई, 2024 के अंतरिम बजट में सोने के आयात पर सीमा शुल्क को 15 फीसदी से घटाकर छह फीसदी करने के कारण है। स्मार्ट निवेशकों के लिए सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड का बंद होना एक खोया हुआ अवसर है।
इसकी आखिरी किश्त फरवरी 2024 में 6,263 रुपये प्रति ग्राम के निर्गम मूल्य पर पेश की गई थी और भारतीय रिजर्व बैंक ने निवेशकों के लिए योजना से जल्दी बाहर निकलने की तिथि के विकल्प साझा किए हैं, लेकिन इस योजना की परिपक्वता 2032 में इस आखिरी किश्त के आठ साल पूरे होने तक जारी रहेगी। सोने में निवेश करना किसी के निवेश उद्देश्य और परिसंपत्ति आवंटन मिश्रण का हिस्सा होना चाहिए। अपनी जरूरतों के आधार पर वित्तीय साधनों में निवेश करें, तभी आपके वित्तीय लक्ष्यों के समय के साथ पूरे होने की संभावना बढ़ेगी।