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नजरिया: चौंकाने वाले क्यों होते हैं चुनावी नतीजे, आखिर कौन सी लहर चलती है जो दिखती नहीं
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कांग्रेस घोषणा पत्र जारी करते नेता
- फोटो :
ट्विटर/सिद्धारमैया
विस्तार
सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे। लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने वाले थे। पत्रकारों ने उनका मत जानना चाहा। जवाब मिला कि नतीजे चौंकाने वाले होंगे। नतीजे आए, तो कांग्रेस हार चुकी थी। केसरी जी से पत्रकारों ने फिर पूछा कि आप तो कह रहे थे कि नतीजे चौंकाने वाले होंगे, पर आप तो हार गए। इस पर केसरी जी ने कहा कि कांग्रेस की हार से हर कोई चौंक गया है। मैंने क्या गलत कहा कि नतीजे चौंकाने वाले होंगे?
सीताराम केसरी की वह बात आज कर्नाटक के चुनाव पर भी लागू होती है। वहां चुनाव प्रचार चरम पर है। धड़ाधड़ रैलियां हो रही हैं। चुनाव कवरेज में सैकड़ों रिपोर्टर लगे हुए हैं। सर्वे वाले अलग-अलग आंकड़ों के साथ सामने आ रहे हैं। हर कोई कह रहा है कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी है, या वैसे तो कांग्रेस आगे है, पर त्रिशंकु विधानसभा की सूरत में ऑपरेशन लोटस से इन्कार नहीं किया जा सकता। या तो किसी के खिलाफ लहर है या किसी के पक्ष में हवा है। कुल मिलाकर नतीजे चौंकाने वाले होंगे।
ऐसी कौन-सी लहर होती है, जो पकड़ में नहीं आती? करीब दस लोकसभा चुनाव और दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा चुनाव कवर करने के बाद लगता यही है कि या तो वोटर अतिरिक्त रूप से चतुर हो गया है या रिपोर्टर संकेतों को पकड़ नहीं पा रहा। ऐसे में ऊंट काम आता है, जिसकी करवट को चुनावी नतीजे से जोड़ दिया जाता है। हालांकि बहुत साल पहले बीकानेर के ऊंट अनुसंधान केंद्र में मैंने यही सवाल ऊंट पालक रेबारी और केंद्र के एक अधिकारी से पूछा था। अधिकारी का कहना था कि ऊंट की करवट का पहले से पता लगाना लगभग असंभव है। उधर रेबारी का कहना था कि ऊंट को ध्यान से देखो और लगातार देखते रहो, तो करवट को पकड़ा जा सकता है। यानी अगर कोई चुनाव पर लगातार नजर रखे, जनता के बीच जाता और उसका मन टटोलता रहे, तो नतीजे उसे चौंकाएंगे नहीं।
नतीजों का तो पता नहीं, पर बहुत बार वोटरों के जवाब जरूर चौंका देते हैं। बात 2003 की है। राजस्थान में विधानसभा चुनाव का माहौल था। जयपुर और कोटा के बीच एक जगह चुनाव कवरेज के दौरान ठेलेवाले से केला खरीदना हुआ। केले खाते-खाते मैंने फलवाले से मौजूदा विधायक के बारे में पूछा, तो वह कहने लगा कि आप यहां केला खा रहे हैं। कोटा पहुंचेंगे, तो केले की जगह सेब खाना पसंद करेंगे। इशारा साफ था कि वहां की जनता ने केले की जगह सेब खाने का मन बना लिया था, यानी विधायक जी की हार तय थी। हुआ भी वैसा ही। सेब से याद आया बाली विधानसभा उपचुनाव। मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत उपचुनाव लड़ रहे थे। सामने खड़े थे संघ के दुबले-पतले कार्यकर्ता अमृत। उनका चुनाव चिह्न सेब था। मैंने टीवी कैमरे पर उनका इंटरव्यू लेना शुरू किया, तो उन्होंने सेब की माला गले में पहन ली। इंटरव्यू थोड़ा लंबा हो गया। बीच में उन्होंने टोका कि गरदन अकड़ गई है। सेब की माला दो किलो की तो थी ही। एक वोटर तुरंत बोला कि चुनाव चिह्न का बोझ उठाया नहीं जा रहा, तो जीतने पर जनता से किए वादों का बोझ कैसे उठा पाओगे? वहीं हार तय हो गई।
गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 99 पर सिमट गई थी, हालांकि सरकार बनाने में वह सफल रही थी। अहमदाबाद एयरपोर्ट से निकलते ही टैक्सी ड्राइवर ने चेता दिया था कि भाजपा को हराना तो नहीं है, पर चर्बी कम कर देनी है। मंत्रियों और नेताओं की चर्बी बहुत चढ़ गई है। ऐसे ही गुवाहाटी एयरपोर्ट से निकलते ही बेटे की बेरोजगारी से परेशान ड्राइवर का कहना था कि बांग्लादेशी मुस्लिम हमारे बच्चों की नौकरियां तक खाने लगे हैं। कांग्रेस चुनाव हार गई थी।
वर्ष 2018 में रायपुर एयरपोर्ट से निकलते ही टैक्सी ड्राइवर ने कहा था कि रमन सिंह अच्छे आदमी हैं, पर हमने तो कांग्रेस का राज एक बार भी देखा तक नहीं, इस बार बदलाव करके देखते हैं। नतीजे आए, तो भाजपा सरकार बदली जा चुकी थी। वर्ष 2015 में पटना एयरपोर्ट से निकलने पर टैक्सी ड्राइवर ने एक ही लाइन में चुनावी गणित समझा दिया था। तीन दल हैं राजद, जदयू व भाजपा। जहां दो दल एक साथ, उनकी जीत पक्की। लालू-नीतीश साथ थे, इसलिए जीत गए। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव का नतीजा अगले दिन आने वाला था और देर रात एक पांच सितारा होटल का गार्ड मुझसे कह रहा था कि इंडिया शाइनिंग और फील गुड तो साहब लोगों के लिए है, हमारी जिंदगी में तो वही अंधेरा है। मेरे दिल से आवाज निकली...अटल जी चुनाव हार रहे हैं।
वर्ष 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान अलवर टाइगर प्रोजेक्ट के बाहर चाय की चुस्कियां लेते एक किसान ने वसुंधरा राजे सरकार के काम की तारीफ की, पर साथ में कह दिया कि इस बार वोट गहलोत को जाएगा। मैंने पूछा कि वसुंधरा ने इतनी राहत दी, तो वोट गहलोत को क्यों? जवाब मिला, वह और भी ज्यादा देगा। वैसे यह बात भी सही है कि इन दिनों दिल्ली से गए पत्रकारों के सामने स्थानीय मतदाता खुलता नहीं है। बिहार के कटिहार व उत्तर प्रदेश के कन्नौज में कुछ वोटरों ने कह ही दिया कि आप लोग दिल्ली से आए हैं, आपको मोदी जी ने भेजा है। हम कुछ बोलेंगे, तो हमारा नाम लाभार्थियों की सूची से हटा दिया जाएगा।
एक दिलचस्प किस्सा मंदसौर का है। बात 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की है। एक युवा किसान मुख्यमंत्री को कोस रहा था। कह रहा था कि इस बार तो मामा जी यानी शिवराज सिंह चौहान की दुकान उखाड़ दी जाएगी। दरअसल भावांतर योजना के तहत उस किसान के करीब डेढ़ लाख रुपये खाते में नहीं आए थे। करीब आधा घंटे बाद वही युवा किसान हांफता हुआ पास आया। मोबाइल फोन दिखाकर कहने लगा कि चने का बकाया डेढ़ लाख आ गया है खाते में। मामा जी जिंदाबाद। फिर हमसे अनुरोध करने लगा कि उसने पहले जो चौहान को कोसा था, उसे हम डिलीट कर दें। इससे साबित होता है कि वोटर भी बहुत डिमांडिंग होता जा रहा है।
चुनाव कवर करने से पता चलता है कि युवा पीढ़ी क्या सोच रही है। वह मेहनत करती है और घर वाले कोचिंग में पैसा खर्च करने के लिए भी तैयार दिखते हैं। यह पीढ़ी एक मौके के इंतजार में है, जहां वह खुद को साबित कर सके। पर अच्छे स्कूल, अच्छे शिक्षण संस्थान नेताओं के एजेंडे में हंै ही नहीं। युवा पीढ़ी पढ़ जाए, तो अंडर करंट, लहर और हवा का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा।