फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Why medical education is only in English, other states can make Madhya Pradesh an example

शिक्षा: मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में ही क्यों, मध्य प्रदेश को मिसाल बना सकते हैं अन्य राज्य

Tue, 15 Jul 2025 07:27 AM IST
शिव शुक्ला डॉ. विवेक एस अग्रवाल
डॉ. विवेक एस अग्रवाल Published by: शिव शुक्ला Updated Tue, 15 Jul 2025 07:27 AM IST
विज्ञापन
सार
मध्य प्रदेश में हिंदी भाषा में चिकित्सा शिक्षा की पढ़ाई के साथ ही शुल्क में छूट दी जा रही है, जबकि अन्य राज्य अंग्रेजी के आधिपत्य से मुक्त नहीं हो पा रहे।
 
loader
Why medical education is only in English, other states can make Madhya Pradesh an example
डॉक्टर - फोटो : Freepik.com

विस्तार

विदेश में वहां की स्थानीय भाषा में पढ़कर आए चिकित्सकों के लिए तो भारत में जगह है, लेकिन अब भी देश में हिंदी एवं अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में मेडिकल शिक्षा को बढ़ावा देने से हम कोसों दूर हैं। संभवत: इसके पीछे विदेशी से प्रेम और देशी को हेय समझने संबंधी गुलाम मानसिकता का प्रभाव है। यह समझ से परे है कि आजादी के 75 वर्ष बाद वर्ष 2022 में पहली बार मध्य प्रदेश में मेडिकल शिक्षा हिंदी में प्रारंभ हो पाई। हालांकि, कुछ राज्यों ने सीमित तौर पर स्थानीय भाषा में मेडिकल की पढ़ाई संबंधी प्रस्ताव और उद्घोषणाएं की हैं, लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही है।



गौरतलब है कि मेडिकल की पढ़ाई के बाद चिकित्सक का पूरा जीवन मरीजों की देखरेख में बीतता है, जो कि अपना संवाद मूलतः स्थानीय या मातृभाषा में ही करते हैं। अंग्रेजी में तो सीमित बातचीत होती है। लेकिन ब्रिटिश औपनिवेशक साम्राज्य के दंश अब भी मेडिकल शिक्षा में अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं। दक्षिणी राज्यों में हिंदी के विरोध में तो आंदोलन होते रहते हैं, लेकिन अंग्रेजी के आधिपत्य को कम से कम चिकित्सा शिक्षा से कम करने हेतु कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। यह भी शोध का विषय है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा को अंग्रेजी में देना ही क्यों आवश्यक है? राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं वर्तमान सरकार की मंशा स्थानीय भाषाओं को प्रोन्नत करने की है। मौजूदा सरकार अंग्रेजी परस्त नहीं है, इसलिए मेडिकल शिक्षा हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषा में प्रदान करने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता।


वैज्ञानिक रूप से भी मातृभाषा में शिक्षा सर्वाधिक प्रभावी होती है। मैंने खुद अपनी चिकित्सा शिक्षा के दौरान महसूस किया की ग्रामीण अंचल से आने वाले और 12वीं तक की शिक्षा हिंदी या स्थानीय भाषा में हासिल करने वाले छात्र यकायक अंग्रेजी आच्छादित वातावरण में खुद को असहज पाते हैं और कई तो भाषा की विवशता के कारण प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। उन में हीन भावना भी पैदा हो जाती है। कई बार तो ऐसे छात्रों को शिक्षक महत्व नहीं देते व उपहास तक उड़ा देते हैं।

एआई के युग में अंग्रेजी में ही चिकित्सा शिक्षा प्रदान करने के पीछे शासन की मजबूरियां समझ से परे हैं। मध्य प्रदेश में शासन की पहल पर लगभग सभी किताबों का हिंदी में अनुवाद कर दिया गया है और हिंदी माध्यम से चिकित्सा शिक्षा हासिल करने पर शुल्क में भी छूट दी जा रही है। शुरुआती वर्ष में ही 30 फीसदी से अधिक छात्रों ने अपनी शिक्षा के लिए हिंदी माध्यम का चुनाव किया। यह इसका द्योतक है कि छात्रों के मानस में अपनी मातृभाषा में पढ़ने की कितनी उत्कंठा है।

एक सरल शुरुआत के रूप में सर्वप्रथम परीक्षा के माध्यम में मातृभाषा का विकल्प प्रदान कर विद्यार्थियों को प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सक्षम बनाया जा सकता है। इसके लिए न तो अतिरिक्त अधोसंरचना और न ही उत्तर पुस्तिका जांचने वाले शिक्षकों को अतिरिक्त ज्ञान देने की जरूरत है। यूनिसेफ के एक अध्ययन के मुताबिक, लगभग तीन चौथाई छात्र अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषा में प्रदत्त ज्ञान को पूर्णता के साथ नहीं समझ पाते। एक महत्वपूर्ण विषय यह भी है कि जब प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा तक मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने के विकल्प बहुतायत में उपलब्ध हैं, तो ऐसे में चिकित्सा शिक्षा के लिए अंग्रेजी की बाध्यता कहां तक न्यायोचित है। करीब 12 वर्षों के शिक्षण काल में जिस छात्र ने अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा ग्रहण की हो, उसके लिए यकायक दूसरी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना एक दुष्कर कार्य होता है। बौद्धिक विकास के लिए ठोस आधार मातृभाषा के माध्यम से ही स्थापित हो पाता है, इस बाबत किए गए कई अध्ययन एकमत से शिक्षा को मातृभाषा के माध्यम से प्रदान करने की वकालत करते हैं।

चिकित्सा शिक्षा में तो यह इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि विषय के मूल को स्पष्टता से समझना, प्रचलित एवं विद्यमान बीमारियों के विकल्प में से सही कारण को ढूंढ पाना आवश्यक होता है। यह तब ही संभव हो पाता है, जब  मरीज व चिकित्सक के मध्य संवाद प्रभावी एवं स्पष्ट हो। इसके लिए भी माध्यम मातृभाषा ही होता है। जैसे मरीज चिकित्सक संवाद में बीमारी एवं उसके लक्षण पर चर्चा किताबी ज्ञान के अनुरूप न होकर स्थानीय संदर्भ में ही की जाती है, ताकि मरीज एवं चिकित्सा एक स्तर पर रहकर निदान की सही दिशा में अग्रसर हो सकें। उसके साथ ही दोनों के मध्य भावनात्मक जुड़ाव भी समान भाषा से ही बन पाता है। भाषा के माध्यम से ही सांस्कृतिक समझ गहरी होती है और त्रुटि या भावनात्मक आघात की गुंजाइश भी कम हो जाती है। यह उचित समय है, जब चिकित्सा शिक्षा में मातृभाषा के विकल्प के साथ अंग्रेजी के अनावश्यक बोझ को दूर कर उसके भय के कारण अंतिम छोर पर बैठे युवा को भी चिकित्सक बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed