फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   When will the youth get the command?

युवाओं को कब मिलेगी कमान?

Fri, 17 Nov 2017 08:35 AM IST
वरुण गांधी
वरुण गांधी Updated Fri, 17 Nov 2017 08:35 AM IST
विज्ञापन
When will the youth get the command?
युवा

ऑस्ट्रिया के नए चांसलर सेबेस्टियन कुर्ज सिर्फ 31 साल के हैं। न्यूजीलैंड की नई प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न की उम्र मात्र 37 साल है और वह दुनिया की सबसे युवा महिला नेत्री भी हैं। टोनी ब्लेयर और डेविड कैमरन दोनों 43 की गरिमामय उम्र में प्रधानमंत्री बने। एमैनुअल मैक्रों 39 की उम्र में फ्रांस के राष्ट्रपति हैं। दुनिया में किसी राजनीतिक दल की औसत आयु सिर्फ 43 साल है। ऐसे में, राजनीतिक दल अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए लगातार नए खून को अपने साथ जोड़ रहे हैं और उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं।


loader

इसकी तुलना में जरा भारत पर नजर डालिए, तो सियासी दल अपनी बुजुर्गियत और वरिष्ठता की स्वामिभक्ति के साथ ठहरे से हैं। वर्ष 2014 में मौजूदा संसद में सिर्फ 12 सांसद 30 साल से कम उम्र के थे, इसके 53 फीसदी सदस्य 55 साल से कम उम्र के थे, जबकि एक सांसद की औसत उम्र 50 साल से ऊपर (भाजपा में 54 और  कांग्रेस में 57) थी। एक तरफ हमारी आबादी (देश की औसत उम्र का मध्यांक 25 है) लगातार युवा हो रही है, दूसरी तरफ संसद बुढ़ाती जा रही है। पहली लोकसभा की औसत आयु 46.5 साल थी, जो दसवीं लोकसभा तक बढ़कर 51.4 साल हो चुकी थी। राजनीतिक नेता सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर जाने के बाद भी सत्ता की डोर थामे होते हैं। कुछ तब तक कुर्सी थामे रहते हैं, जब तक कि उनका उत्तराधिकारी इसके लिए तैयार न हो जाए।

लेकिन हमेशा इसके अपवाद भी रहे हैं। कुछ युवा नेताओं को जिम्मेदारी के पद दिए गए, हालांकि ये गिने-चुने मामले ही हैं, और ज्यादातर मामलों में ऐसा मुख्यतः राजनीतिक विरासत के चलते हुआ। मैं खुद भी इस प्रथा का लाभार्थी हूं। और ऐसा भी नहीं है कि राजनीतिक दल युवओं को शामिल नहीं करते। ज्यादातर राजनीतिक दलों की युवा और छात्र इकाइयां हैं, पर इनकी राजनीति में तरक्की प्रत्यक्षतः सीमित है। कुछ दलों में अनौपचारिक रूप से 75 साल सेवानिवृत्ति की उम्र तय करना स्वागतयोग्य है, फिर भी काफी कुछ करने की जरूरत है। आज राजनीति में हिस्सेदारी पैसे, विरासत और संपर्कों पर निर्भर है।

संघर्षरत युवाओं को मजबूत बनाने के और भी रास्ते हैं। दक्षिण यूरोपीय देश सर्बिया एक कार्यक्रम चलाता है, जिसके तहत नौजवान नेताओं की खोज करके युवा राजनीतिक नेतृत्व को प्रश्रय दिया जाता है। इस प्रोग्राम में विभिन्न पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण मुहैया करा युवा नेताओं का एक नेटवर्क तैयार किया जाता है, जो पार्टी रुख से परे नीतिगत समाधान पेश कर सके और सत्ता प्रतिष्ठान के दरवाजे आमजन के लिए खोल सके। इस प्रोग्राम से युवा नेताओं को ताकत देने के लिए माहौल बनाने में मदद मिली और वे पार्टियों की नीतियों पर प्रभाव छोड़ सके।

यूएनडीपी ने 26 लाख डॉलर के फंड से एक राष्ट्रीय युवा नागरिक शिक्षा अभियान चलाया, जिसका मकसद नागरिक समझदारी व कौशल का विकास करना है और राजनीति में युवाओं के दखल को लेकर परंपरागत रवैये में बदलाव लाना है। केन्या में नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट साल 2001 से एक युवा राजनीतिक नेतृत्व अकादमी को मदद करती है, जहां सभी दलों के युवा राजनीतिज्ञ अपने दलों में लागू की जाने वाली परियोजनाओं के साथ संधि वार्ता और जनसमर्थन विषय पर कौशल विकास प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। यूनिसेफ ने कोसोवो में 2010 से 2013 के बीच इनोवेशंस लैब के लिए फंड दिया, जिसमें भावी नेताओं को जरूरी सुविधाएं व सरकार में संस्थागत संपर्क मुहैया करवा कर सामाजिक रूप से प्रभाव छोड़ने वाले उनके विचारों का चयन और उन्हें लागू किया जाना था। यूएनडीपी ने एशियाई युवा नेताओं की नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए  एशियन यंग लीडर्स प्रोग्राम चलाया।

संस्थागत समर्थन से भी हमें काफी मदद मिल सकती है। बहुत से देश (जैसे, मोरक्को, पाकिस्तान, केन्या, इक्वाडोर) ने अपनी विधायिका में युवा नेताओं के लिए अलग से सीटें सुरक्षित कर रखी हैं- आखिरकार समुदाय और जाति आधारित समूहों को आरक्षण दिया जा सकता है, तो युवाओं को क्यों नहीं ? अन्य देशों (जैसे, इक्वाडोर, अल साल्वाडोर, सेनेगल, युगांडा, बुरुंडी) ने सभी विधायिकाओं में उम्मीदवारी की उम्र घटाकर 18 साल कर दी है। बोस्निया में अगर चुनाव में किसी भी प्रत्याशी को बहुमत नहीं मिलता, तो वहां के चुनाव कानून के तहत सबसे युवा उम्मीदवार को वह सीट दे दी जाएगी।

अल साल्वाडोर 18 साल की उम्र के करीब पहुंच रहे लोगों को जिम्मेदारी संभालने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु स्कूलों में सक्रिय अभियान चलाता है। केन्या ने एक राष्ट्रीय युवा नीति और राष्ट्रीय युवा अधिनियम बना रखा है। इसी तरह हमारे राजनीतिक ढांचे को मजबूत बनाने के लिए युवाओँ को मौके मुहैया कराना चाहिए- स्थानीय निकाय चुनावों में उन नेताओं को मौका दिया जाना चाहिए, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया है। कुछ अनुभव हासिल करने के बाद ऐसे नेताओं को राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहिए और अंत में लोकसभा के लिए। स्वस्थ लोकतंत्रों में ऐसे ही तो नेता बनते हैं। पर पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र में गिरावट, बढ़ता चुनावी खर्च और स्थानीय निकाय, पंचायत और मेयर चुनाव में आरक्षण ने युवा नेताओं की राह में बाधाएं डाल दी हैं। राजनीतिक दलों को गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवा प्रत्याशियों को कुछ पदों पर आरक्षण देने के साथ ही मुख्यधारा की राजनीति में पेशेवरों को शामिल करने के मुद्दे पर सक्रियता से विचार करना चाहिए। युवा राजनेता विशाल युवा आबादी वाले भारत की जरूरतों और ख्वाहिशों को समझते हैं। राजनीतिक दलों को ऐसे नेताओं को अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ने का मौका मुहैया कराना चाहिए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed