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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   What are the sixteen names of Maa Durga and their meanings?

जानना जरूरी है: क्या हैं दुर्गा के सोलह नाम और उनके अर्थ? संस्कृति के पन्नाें से जानें

Sun, 23 Feb 2025 05:28 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 23 Feb 2025 05:28 AM IST
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सार
देवी दुर्गा के सोलह नाम बताए गए हैं-दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमंगला, अंबिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी। इन सभी नामों के उत्तम अर्थ हैं।
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What are the sixteen names of Maa Durga and their meanings?
मां दुर्गा की प्रतिमा। संवाद

विस्तार

वेद की कौथुमी शाखा में देवी दुर्गा के सोलह नाम बताए गए हैं-दुर्गा, नारायणी, ईशाना, विष्णुमाया, शिवा, सती, नित्या, सत्या, भगवती, सर्वाणी, सर्वमंगला, अंबिका, वैष्णवी, गौरी, पार्वती और सनातनी। इन सभी सोलह नामों के उत्तम अर्थ हैं। इन नामों के अर्थों के अलावा शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि देवी की उपासना किस-किस ने और किस क्रम में की थी। दुर्गा में ‘दुर्ग’ शब्द दैत्य, महाविघ्न, शोक, नरक, यमदंड, भय एवं रोग के अर्थ में आता है तथा ‘आ’ शब्द ‘हंता’ का वाचक है, जो देवी महाविघ्न आदि का हनन करती है, उसे ‘दुर्गा’ कहते हैं। देवी दुर्गा, यश, तेज, रूप और गुणों में नारायण के समान हैं तथा नारायण की ही शक्ति हैं। इसलिए उन्हें ‘नारायणी’ भी कहते हैं। ईशाना में दो शब्द हैं-ईशान और आ। ‘ईशान’ शब्द संपूर्ण सिद्धियों के अर्थ में प्रयुक्त होता है और ‘आ’ शब्द दाता का वाचक है। संपूर्ण सिद्धियों की दात्री ‘ईशाना’ कही गई हैं। सृष्टि के समय विष्णु ने माया की रचना की थी और अपनी उस माया द्वारा संपूर्ण विश्व को मोहित किया। वह माया देवी, विष्णु की शक्ति हैं, इसलिए उन्हें ‘विष्णुमाया’ कहा गया है। शिवा शब्द में ‘शिव’ कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा ‘आ’ शब्द दाता के अर्थ में। वह देवी कल्याणस्वरूपा हैं, शिवदायिनी हैं और शिवप्रिया हैं, इसलिए ‘शिवा’ कही गई हैं। देवी दुर्गा सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं और पतिव्रता हैं। इसीलिए उन्हें ‘सती’ कहते हैं। जैसे भगवान नित्य हैं, उसी तरह भगवती भी ‘नित्या’ हैं। संपूर्ण जगत कृत्रिम होने के कारण मिथ्या है, परंतु दुर्गा सत्य स्वरूपा हैं, इसलिए जैसे भगवान सत्य हैं, उसी तरह देवी ‘सत्या’ हैं।



सिद्ध, ऐश्वर्य आदि के अर्थ में ‘भग’ शब्द का प्रयोग होता है। यह संपूर्ण ऐश्वर्य आदि रूप जिनके भीतर विद्यमान हैं, वे दुर्गा ‘भगवती’ कही गई हैं।

विश्व के समस्त प्राणियों को जन्म, मृत्यु, जरा तथा मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले गुण के कारण उन्हें ‘सर्वाणी’ कहा गया है। ‘मंगल’ शब्द मोक्ष के साथ हर्ष, संपत्ति और कल्याण के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इन सबको देने वाली देवी दुर्गा, इसलिए ‘सर्वमंगला’ के नाम से भी विख्यात हैं। ‘अंबा’ शब्द माता का वाचक है तथा पूजन के अर्थ में भी ‘अंब’ शब्द का प्रयोग होता है। देवी दुर्गा, सबके द्वारा पूजित हैं और तीनों लोकों की माता हैं, इसलिए ‘अंबिका’ कहलाती हैं। देवी श्रीविष्णु की भक्ता, विष्णुरूपा तथा विष्णु की शक्ति हैं। विष्णु के द्वारा ही उनकी सृष्टि हुई है। इसलिए उनका एक नाम ‘वैष्णवी’ भी है। ‘गौर’ शब्द पीले रंग, निर्लिप्त एवं निर्मल के अर्थ में प्रयुक्त होता है। वे देवी ‘गौर’ परमात्मा की शक्ति हैं, इसलिए ‘गौरी’ कही गई हैं। भगवान शिव सबके गुरु हैं और देवी उनकी सती-साध्वी प्रिया शक्ति हैं। इसलिए 'गौरी' कही गई हैं। श्रीकृष्ण सबके गुरु हैं और देवी उनकी माया हैं। इसलिए भी उनको ‘गौरी’ कहा गया है। ‘पर्व’ शब्द तिथिभेद (पूर्णिमा), पर्वभेद, कल्पभेद तथा अन्यान्य भेद अर्थ में प्रयुक्त होता है तथा ‘ती’ शब्द ख्याति के अर्थ में आता है। पर्व आदि में विख्यात होने से देवी दुर्गा को ‘पार्वती’ कहते हैं। पर्वतराज (हिमालय) की पुत्री होने के कारण भी उन्हें ‘पार्वती’ कहा जाता है। ‘सना‘ का अर्थ है सर्वदा और ‘तनी’ का अर्थ है विद्यमान। सर्वत्र और सब काल में विद्यमान होने से वे देवी ‘सनातनी’ कही गई हैं।


सबसे पहले परमात्मा श्रीकृष्ण ने सृष्टि के आदिकाल में गोलोकवर्ती वृंदावन के रासमंडल में देवी की पूजा की थी। दूसरी बार मधु व कैटभ से भयभीत होकर ब्रह्मा जी ने उनकी पूजा की। तीसरी बार त्रिपुरारी महादेव ने त्रिपुर से प्रेरित होकर देवी का पूजन किया था। चौथी बार महर्षि दुर्वासा के शाप से राज्यलक्ष्मी से भ्रष्ट हुए देवराज इंद्र ने देवी भगवती की आराधना की थी। तभी से मुनींद्रों, सिद्धेंद्रों, देवताओं व महर्षियों द्वारा संपूर्ण विश्व में सब ओर देवी की पूजा होने लगी। पूर्वकाल में संपूर्ण देवताओं के तेज पुंज से देवी प्रकट हुई थीं। उस समय सब देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र और आभूषण दिए थे। उन्हीं देवी ने दैत्यों का वध किया और देवताओं को अभीष्ट वर दिए थे। दूसरे कल्प में महात्मा राजा सुरथ ने सरिता के तट पर मिट्टी की मूर्ति में देवी की पूजा की थी। उन्होंने वेदोक्त सोलह उपचार अर्पित करके विधिवत पूजन और ध्यान के पश्चात कवच धारण किया तथा परिहार नामक स्तुति करके अभीष्ट वर पाया।

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