मौसम: हीट एक्शन प्लान कितने कारगर, जरूरत पहले से ज्यादा सतर्क होने की
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विस्तार
भारत लगातार भीषण गर्मी से जूझ रहा है, इसलिए हीट एक्शन प्लान (एचएपी) देश की गर्मियों से लड़ाई के मामले में एक महत्वपूर्ण नीतिगत साधन के रूप में उभरे हैं। अत्यधिक गर्मी के कारण होने वाली मानवीय और बुनियादी ढांचे की क्षति को कम करने के उद्देश्य से बनाई गईं ये योजनाएं हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों और नगर पालिकाओं में तेजी से फैल रही हैं। 2013 में अहमदाबाद में शुरू की गई एचएपी की अग्रणी योजना से लेकर महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और अन्य स्थानों पर इसके क्रियान्वयन तक, इस ढांचे को जलवायु लचीलेपन के एक मॉडल के रूप में प्रचारित किया गया है। हालांकि, जमीनी हकीकत की गहराई से पड़ताल करने पर इसका मिला-जुला रिकॉर्ड सामने आता है, जिसमें असमान कार्यान्वयन, कमजोर कानूनी समर्थन और सबसे कमजोर लोगों के प्रति अपर्याप्त ध्यान शामिल है।
भारत में पहले हीट एक्शन प्लान का जन्म एक त्रासदी से हुआ था। वर्ष 2010 में, अहमदाबाद में भयंकर गर्मी की लहर ने 1,300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली थी। अहमदाबाद सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, मौसम विज्ञानियों और गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से एक व्यापक हीट एक्शन प्लान विकसित करके इससे निपट सका था। अहमदाबाद एचएपी ने प्रेरक का काम किया। उसके बाद से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अन्य क्षेत्रों को इसी तरह की रणनीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। देश भर में 130 से अधिक जिलों और शहरों ने एचएपी का मसौदा तैयार किया है। बीते कुछ दिनों पहले तक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भीषण गर्मी की चपेट में थी, पर यहां एचएपी का क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पाया है। भारत में 37 एचएपी का विश्लेषण करने वाली 2023 सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की रिपोर्ट में पाया गया कि इनमें से अधिकांश में स्थानीय संदर्भ की कमी है, कमजोर समूहों को कम प्राथमिकता दी जाती है और अपर्याप्त वित्तपोषण की समस्या है।
दिल्ली सहित नौ शहरों के 2025 सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव (एसएफसी) अध्ययन में कहा गया कि एचएपी में विशिष्टता, कानूनी जवाबदेही व व्यापक जलवायु नीतियों के साथ तालमेल की कमी है। एसएफसी में विजिटिंग फेलो और किंग्स कॉलेज, लंदन में डॉक्टरेट शोधकर्ता तथा एसएफसी अध्ययन के सह-लेखक आदित्य वलियाथन पिल्लई ने चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘डाटा की बड़ी चुनौती है। सरकारें कार्यान्वयन गतिविधियों पर सार्वजनिक डाटा जारी नहीं करती हैं, जिसके कारण हमें रैंडम स्पॉट चेक और साक्षात्कारकर्ताओं से सेल्फ-रिपोर्ट ही मिलती है।’ मौसम विज्ञान विभाग से लेकर शहरी स्थानीय निकाय तक हितधारकों की बहुलता के कारण तालमेल और भी जटिल हो जाता है, खासकर गर्मियों में, जब त्वरित प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है। भारत की मौजूदा एचएपी भी दीर्घकालिक संरचनात्मक अनुकूलन के बजाय अल्पकालिक प्रतिक्रियाओं पर असंगत रूप से ध्यान केंद्रित करती है, जबकि प्रारंभिक चेतावनियां और सार्वजनिक सलाह आवश्यक हैं। ऐसे में कई कदम उठाने जरूरी हैं। सबसे पहले, केंद्र सरकार एचएपी के लिए एक कानूनी जनादेश लागू करने पर विचार करे। दूसरा, योजनाओं को स्थानीयकृत आंकड़ों द्वारा सूचित किया जाना चाहिए। तीसरा, शहरों को तालमेल और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एचएपी को व्यापक विकास नीतियों में शामिल करना चाहिए। अंत में, नागरिकों की भागीदारी को मुख्यधारा में लाना होगा। सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, स्कूल अधिकारियों, ट्रेड यूनियनों और निवासियों को योजना व कार्यान्वयन, दोनों में शामिल किया जाना चाहिए।