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यूनान के रास्ते पर तो नहीं!

Mon, 19 Nov 2012 03:50 PM IST
यादवेंद्र
यादवेंद्र Updated Mon, 19 Nov 2012 03:50 PM IST
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we are not on the way to greece

यूनान के 46 वर्षीय वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार कोस्तास वाक्सेवानिस और तीन अन्य पत्रकारों को अक्तूबर के अंतिम दिनों में इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने 2010 में तत्कालीन सरकार को सौंपी गई 2,059 विदेशी बैंक खाताधारकों की एक सूची अपनी समाचार पत्रिका में सार्वजनिक कर दी, जो सरकारी फाइलों से कथित रूप से गायब हो गई थी।

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इन पत्रकारों पर सरकार ने खाताधारकों की वैयक्तिक गोपनीयता का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। इस मुकदमे ने दुनिया भर के लोगों का ध्यान आकर्षित किया, और अपना समर्थन देने के लिए इनमें से अनेक लोग अदालत में उपस्थित भी हुए। ग्यारह घंटे तक बहस सुनने के बाद जज ने फैसला सुनाया कि आप लोग निर्दोष हैं।
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एक साहसी और जिम्मेदार पत्रकार की गिरफ्तारी और सम्मानजनक रिहाई के बरक्स इतिहास जैसे मोड़ ले रहा है कि उसने सैनिक तानाशाही और गृहयुद्ध से निकल कर आए यूनान के बुद्धिजीवियों की नींद उड़ा दी हैं। वे बार-बार पिछली सदी के तीस के दशक का हवाला देते हैं, जब आर्थिक संकट की आपाधापी के बीच जर्मनी में हिटलर की धुर राष्ट्रवादी नाजी पार्टी का उदय ऐसी ही परिस्थितियों में हुआ था।
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लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर वासिलिस मोनास्त्रीरायोतिस चेतावनी देते हैं कि एक बार आर्थिक संकट से यूनान उबर जाए, तब भी अतिवादी दक्षिणपंथियों की विदेशियों के विरोध पर आधारित राजनीति में उसका पड़ोसी देशों के साथ सहज संबंध बरकरार रखना मुश्किल होगा। तभी तो वहां पिछले चुनाव में लगभग नाजी हाव-भाव वाली पार्टी गोल्डन डॉन अठारह सीटें हासिल कर संसद के अंदर पहुंचने में कामयाब हो गई।

देश की सभी समस्याओं का ठीकरा वह पड़ोसी देशों से आकर यूनान में शरण लेने आए मजदूरों पर फोड़ती है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में वह इन विदेशियों का सफाया करने के नारे लगाती है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि दंगा रोकने वाली विशेष पुलिस में उसकी घुसपैठ हो चुकी है। एक समाचार पत्रिका का कहना है कि पिछले चुनाव में दो में से एक पुलिस वाले ने इसी पार्टी को वोट डाला।

और तो और, इस पार्टी के मुखिया पर सिनेमा हॉल में बम विस्फोट करने और दूसरे नंबर के नेता पर एक वामपंथी छात्र नेता पर जानलेवा हमला करने के लिए मुकदमा तक चल चुका है। अपने सार्वजनिक व्यवहार के लिए व्यापक विरोध झेल रही गोल्डन डॉन ने 2005 में राजनीति से बाहर रहने की घोषणा की थी, पर अस्थिरता और निराशा के माहौल का फायदा उठाकर उसने अपना नकाब उतार फेंका और सत्ता के केंद्र में पहुंच गई।

यदि देश और लोगों के नाम बदल दिए जाएं, तो यह कमोबेश आज के भारत की ही कहानी लगती है। स्विस बैंक में जमा काला धन, खाताधारकों की सूची के बारे में सरकार का ढुलमुल रवैया, अरविंद केजरीवाल द्वारा खाताधारकों के नाम उजागर करना, इन सबके बीच सरकार द्वारा जांच का दायरा कई साल पीछे तक ले जाना और कैग का ओहदा कमजोर करने का प्रयास, आर्थिक संकट के नाम पर जनता को राहत देने वाली सुविधाओं का बंद करते जाने का उपक्रम हमारे सामने अभी बिलकुल ताजा है।


और इस प्रतिगामी ऊहापोह में कभी असम में, तो कभी महाराष्ट्र में बाहरी लोगों के प्रति घृणा का उन्मादी वातावरण पैदा करने की कोशिश करती दक्षिणपंथी शक्तियां, जो सार्वजनिक तौर पर सांस्कृतिक संगठन की नामपट्टिका टांगती हैं, मुखौटा लगाकर विचरण कर रही  हैं, लेकिन देश की केंद्रीय सत्ता पर अर्जुन की तरह उनकी निगाहें एकाग्र होकर गड़ी हुई हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं हम यूनान के फिसलन भरे रास्ते पर तो आगे नहीं बढ़ रहे!

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