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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Vijay Diwas 2023 Remembering 1971 War and liberation of Bangladesh after 52 years

झरोखा: बावन साल पुरानी 'विजय' की याद और बांग्लादेश की मुक्ति का रोमांच

Sat, 16 Dec 2023 07:36 AM IST
Prashant Dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Sat, 16 Dec 2023 07:36 AM IST
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सार
वर्ष 1971 में पाकिस्तानी सेना ने अपने ही मुल्क के पूर्वी हिस्से के नागरिकों का नरसंहार किया था, जिसके चलते वहां से भाग रहे 65 लाख शरणार्थियों की समस्याओं से भारत जूझ रहा था। मानवीय क्रूरता के काले इतिहास में पूर्वी पाकिस्तान में हुए इस नरसंहार को सबसे वीभत्स माना गया है।
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Vijay Diwas 2023 Remembering 1971 War and liberation of Bangladesh after 52 years
1971 के युद्ध के दौरान भारतीय सेना - फोटो : Twitter@adgpi

विस्तार

इन पंक्तियों को लिखते हुए मैं अनुमान लगा सकता हूं कि 16 दिसंबर, 2023 को बांग्लादेश की धरती पर खड़े होकर उसकी मुक्ति और विजय दिवस मनाते हुए कैसा रोमांच महसूस होगा। क्रूर पाकिस्तानी शासन से बांग्लादेश की मुक्ति के लिए भारत के राष्ट्रीय प्रयासों का मैं भी एक हिस्सा था। 25 मार्च, 1971 की रात को पाकिस्तानी सेना ने अपने ही मुल्क के पूर्वी हिस्से के नागरिकों पर लगातार कहर बरपाना शुरू कर दिया था। अकेले ढाका में हजारों लोगों को गोली मार दी गई, बम गिराए गए और जला दिया गया। जुलाई, 1971 तक भारत इस नरसंहार के चलते भाग रहे 65 लाख शरणार्थियों की समस्याओं से जूझ रहा था। मानवीय क्रूरता के काले इतिहास में पूर्वी पाकिस्तान में हुए इस नरसंहार को शायद बोस्निया और रवांडा से ज्यादा रक्तरंजित व वीभत्स माना गया है।



भारत इस नरसंहार की और ज्यादा अनदेखी नहीं कर सकता था। विशुद्ध मानवीय कारणों से उसे इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। अपने नागरिकों पर छाए गंभीर भावनात्मक एवं आर्थिक बोझ के चंगुल से खुद को बचाना इसके लिए जरूरी था। भारत सरकार के समक्ष इस मानवीय त्रासदी का एकमात्र समाधान सैन्य अभियान ही था। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैन्य प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ (बाद में फील्ड मार्शल) के साथ एक बैठक की थी और फिर सैन्य योजनाकारों ने अपनी योजनाएं बनाईं।


'मुक्ति वाहिनी' को अप्रैल, 1971 में भारत ने बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में समर्थन दिया था, जो चार दिसंबर, 1971 को होने वाली सैन्य कार्रवाई की प्रस्तावना थी। लेकिन इससे पहले पाकिस्तान ने तीन दिसंबर को ही पश्चिम भारत के इलाकों में भारतीय ठिकानों पर हवाई हमले कर दिए और हमारे खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी। यह युद्ध 16 दिसंबर, 1971 तक चला, जिसमें पाकिस्तानी सेना के करीब 93,000 सैनिकों ने अपने हथियार डाल दिए और भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इस तरह से बांग्लादेश अस्तित्व में आया।

वर्ष 1971 का युद्ध मेरे लिए एक चुनौती बनकर आया था। मैं भारतीय वायुसेना में युवा फ्लाइट लेफ्टिनेंट था और 106 स्क्वाड्रन का सदस्य था। हम कैनबरा टोही विमान को उड़ाने वाले प्रशिक्षित विशेषज्ञ थे, जिसका काम शत्रु के सामरिक लक्ष्यों की तस्वीरें लेना था। चार दिसंबर को हम ऑफिसर मेस में आराम कर रहे थे, तभी देर शाम हमें स्क्वाड्रन में आने के लिए कहा गया। हम सभी फ्लाइट कमांडर स्क्वाड्रन लीडर चरणजीत सिंह के कार्यालय में इकट्ठा हुए। हमारे कमांडिंग ऑफिसर विंग कमांडर रमेश बेनेगल ने खबर दी कि बॉम्बर फोर्स पश्चिमी पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण पाकिस्तानी वायुसेना अड्डे सरगोधा पर बमबारी के लिए चालक दल के समूह की तलाश कर रही है और उन्हें स्वयंसेवक चाहिए। हम सबने अपना दाहिना हाथ उठाया, हालांकि तीन साल से सेवा देने के बावजूद बमवर्षक विमान उड़ाना तो दूर, मैंने कभी बमवर्षक विमान के भीतर झांककर भी नहीं देखा था। सामान्य परिस्थितियों में इस मिशन पर भेजने से पहले कुछ हफ्तों का रिफ्रेशर ओरिएंटेशन होता था, लेकिन यहां तो मिशन शुरू होने से पहले केवल 20 मिनट का समय था।

बेनेगल ने तुरंत फ्लाइट लेफ्टिनेंट मोहिंदर सिंधु को पायलट और मुझे नेविगेटर के रूप में नामित किया। हमें पश्चिमी पाकिस्तान में मध्य रात्रि के दौरान सरगोधा हवाई अड्डे पर 8,000 पाउंड के बम गिराने थे, जिसे हमने सटीक तरीके से पूरा किया। लेकिन उसके बाद बमवर्षक के दरवाजे बंद नहीं हो रहे थे। इस वजह से जहां दुश्मन के इलाके में विमान की गति घट गई, वहीं ईंधन की खपत खतरनाक सीमा तक पहुंच गई। करीब 15 मिनट तक हम इससे जूझते रहे और इस दौरान हमें विमान-भेदी गोलाबारी का सामना करना पड़ा। दूसरा विकल्प था कि हम ऊंचाई पर बने रहते और फाइटर विमानों द्वारा मार गिराए जाते। ईंधन बचाने और पश्चिमी हवाओं का लाभ उठाने के लिए हम दोस्ताना इलाके में करीब 45,000 फीट ऊंचाई तक चढ़ गए। पर ईंधन खत्म होने के कारण लैंडिंग करते वक्त हमें एक इंजन खोना पड़ा।

इसी तरह हमने कई अभियान चलाए। आठ दिसंबर को हम तस्वीर लेने के मिशन पर थे, जब हम गुवाहाटी में लॉन्चिंग एअरफील्ड पहुंचे, तो ईंधन भरने के लिए मुश्किल से समय बचा था। भारतीय नौसेना की कार्रवाई से तालमेल बिठाने के लिए हमें दो बजे तक कॉक्स बाजार स्थित अपने पहले लक्ष्य तक पहुंचना महत्वपूर्ण था। और इसलिए हमें तेजी से उड़ान भरनी थी, ताकि विमान सुरक्षित रूप से समय पर पहुंच सके। इस तरह की उड़ान में बहुत ईंधन खर्च होता है। हमें फोटो लेने के लिए आईजोल (मिजोरम) से पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश करना था। जैसे ही हम तेजी से आगे बढ़े, हमारे विमान पर हमला हुआ। लेकिन हमने जमीनी हमले की परवाह किए बगैर फिर से गोता लगाया और फिर हम चटगांव बंदरगाह व हवाई अड्डे की तरफ बढ़े, जहां उसी तरह का एक और फोटो लेना था। हवाई क्षेत्र से कुछ दूर हम ईंधन भंडारण टैंक से, जिस पर शायद ग्रुप कैप्टन शमशुल आलम ने हमला किया था, उठते धुओं के बीच से ऊपर चढ़े। उन्होंने भारतीय वायुसेना के सहयोग से बांग्लादेश वायुसेना का गठन किया था। जब कुछ ही मिनटों का ईंधन बचा था, हम नीचे उतर चुके थे।

इसी तरह 13 दिसंबर का फोटो मिशन वाकई साहसिक था, जब हमें बैटरी वाले डिब्बे में लगी आग बुझानी पड़ी थी। हमने घटती रोशनी के बावजूद ढाका परिसर की तस्वीरें लीं और समय पर उड़ान भरी। हमारे ऊपर काफी दबाव था, और हमें सीधे दिल्ली जाना था। लेकिन जब हम दिल्ली के करीब पहुंचे, रात हो गई थी। सबसे गंभीर बात यह थी कि ढाका से आगे की यात्रा के दौरान हमारी वास्तविक गति घटकर एक तिहाई रह गई थी। यह पश्चिमी हवाओं का एक उल्लेखनीय अनुभव था। नतीजतन जब हम पालम में नियोजित उड़ान योजना से काफी आगे निकल गए, तो अपने ही देश में हमारे विमान को शत्रु विमान घोषित कर दिया गया। लेकिन हम यह कहानी बताने के लिए बच गए। ढाका पर हमले के लिए वे तस्वीरें काफी उपयोगी साबित हुईं। बेनेगल को वीरता के लिए महावीर चक्र और चरणजीत को वीर चक्र मिला। शमशुल आलम को बांग्लादेश सरकार द्वारा बीर उत्तम से सम्मानित किया गया। उनकी यादें अब भी हमारे दिल में हैं।
(-लेखक को 1971 के युद्ध में वीरता के लिए वायुसेना मेडल दिया गया था।)

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