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बैंक संकट: ए भाई, जरा देख के चलो, वित्तीय संस्थानों के पतन से घबराए निवेशक

Thu, 16 Mar 2023 05:54 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Thu, 16 Mar 2023 05:54 AM IST
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सार
सिलिकन वैली बैंक (और सिल्वरगेट एवं सिग्नेचर बैंकों) के पतन ने निवेशकों में घबराहट पैदा कर दी है। वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल मची हुई है। धन की बढ़ती लागत अमेरिका और अन्य जगहों पर उद्यम पूंजी की क्षमता को कम करती है। भारत के स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इसके निहितार्थ हैं।
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US bank failure Silicon Valley Bank signature bank collapse panic among investors
सिलिकॉन वैली बैंक - फोटो : Social Media

विस्तार

सदियों से भारतीय संतों और महात्माओं ने माया की व्याख्या की है। उन्होंने पाया कि जो कुछ भी दिखाई देता है, वह माया है और हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह भी माया ही है। खुलासे के इस मौसम में बचतकर्ताओं, निवेशकों और सरकारों की यह दुनिया इस शाश्वत सत्य का अनुभव कर रही है। शुक्रवार तक दुनिया के दस में से नौ लोगों ने संभवतः सिलिकन वैली बैंक (एसवीबी) का नाम तक नहीं सुना होगा। सात मार्च को इस बैंक ने फोर्ब्स पत्रिका द्वारा अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ बैंकों में स्थान दिए जाने का जश्न मनाया। और दस मार्च को ध्वस्त होने पर उसे बंद कर दिया गया।



अमेरिका के नियामकों ने फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन को नियुक्त किया है। दो सौ अरब डॉलर से अधिक संपत्ति वाले एसवीबी का पतन अमेरिका के इतिहास में बैंकों के पतन की दूसरी सबसे बड़ी घटना है। जिन लोगों के ढाई लाख डॉलर से अधिक जमा थे, उन्हें कतार में खड़ा होना पड़ा। अमेरिकी सरकार द्वारा शुक्रवार और शनिवार को दिखाया गया लचीलापन अन्य छोटे और क्षेत्रीय बैंकों की घबराहट के साथ खत्म हो गया। रविवार को एशियाई बाजार खुलने से पहले अमेरिकी सरकार ने जमाकर्ताओं को उनके पैसे की गारंटी देने के लिए एक योजना बनाई, ताकि स्टार्ट-अप वेतन का भुगतान करने के लिए धन का उपयोग कर सकें।


एसवीबी (और सिल्वरगेट और सिग्नेचर बैंकों) के पतन ने निवेशकों में घबराहट पैदा कर दी है। हिंदी के दिवंगत मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन के शब्द उधार लेकर वैश्विक बाजार को देखें तो वह, लथ-पथ, लथ-पथ, लथ-पथ, नजर आ रहा है। अमेरिका और यूरोप में बैंक शेयरों का मूल्य करीब 200 अरब डॉलर घटा-अमेरिका में लगभग आधा दर्जन बैंकों ने अपने बाजार मूल्य का 50 प्रतिशत से अधिक खो दिया, कई में व्यापार रोकना पड़ा।

भारत में बैंक निफ्टी (जो बैंकों का मूल्य मापता है) लगभग 1,800 अंक नीचे गिर गया। एसवीबी की संपत्ति देनदारी बेमेल थी- इसने कम अवधि के लिए जमा लिया था, लेकिन धन को लंबी अवधि के बॉन्ड में लगा रखा था। स्पष्ट शब्दों में कहें, तो जब जमाकर्ताओं ने अपने धन की मांग की, तो बैंक के पास पैसा नहीं था। इसका क्या कारण है? बचत कितनी सुरक्षित है, यह बैंकिंग परिदृश्य पर निर्भर करता है। यह उन बदलावों के क्रम को समझने के लिहाज से शिक्षाप्रद है, जो भरोसे के पतन का कारण बने। एक दशक से अधिक समय से अमेरिका और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने कम ब्याज दर पर ऋण दिया। अमेरिका में ब्याज दरें सिर्फ एक प्रतिशत से ऊपर थीं और यूरोप के बैंकों ने बैंकों में अपना पैसा रखने के लिए ग्राहकों से शुल्क लिया-वास्तव में दुनिया भर में 180 खरब डॉलर से अधिक ऋण ने नकारात्मक कमाई दर्ज की।

फिर महामारी के बाद राहत पैकेज आया। सरकारों ने जीवन और जीविका बचाने के लिए राहत पैकेजों में 70 खरब डॉलर से अधिक का निवेश किया। इससे कम लागत वाली व्यवस्था वास्तव में शून्य लागत वाली व्यवस्था में बदल गई! इससे अतिरेक बढ़ गया। बेहतर रिटर्न के लिए धन का फैंसी और जोखिम भरे क्षेत्रों में निवेश होने लगा-क्रिप्टो संपत्ति में बिटकॉइन के नेतृत्व में वैल्यूएशन 30 खरब डॉलर तक पहुंच गया, अचल संपत्ति में और फैंसी स्टार्ट-अप एवं उद्यमों में कम दरों पर निवेश किया गया, जहां 'लाभ नहीं कमाना' व्यापार मॉडल था।

मार्च, 2022 तक दुनिया दोहरे अंकों की मुद्रास्फीति से घबराकर जागी। केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दर बढ़ाने का फैसला किया। यह आसान धन का अंत था। इस सप्ताह (17 मार्च) अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा शुरू की गई नई ब्याज दर में वृद्धि का एक वर्ष पूरा हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक सहित कई अन्य ने भी इसका अनुसरण किया। पिछले 12 महीनों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में आठ बार बढ़ोतरी की, जिससे दरों में बढ़ोतरी की वैश्विक दौड़ शुरू हो गई। दरों में बढ़ोतरी की गति को देखते हुए ऐसी दुर्घटना का होना निश्चित था।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी से क्रिप्टो परिसंपत्तियों, शेयरों, रियल एस्टेट और पुराने बॉन्ड के मूल्यों में गिरावट आई, जो एसवीबी जैसे बैंकों द्वारा कम दरों पर जारी किए गए थे। अमेरिकी बैंकों ने बॉन्ड होल्डिंग्स में 620 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया है। दरों में तेज वृद्धि ने मुद्रास्फीति को रोका तो नहीं, बल्कि इसने निश्चित रूप से प्रणालीगत कमजोरी को बढ़ाया। व्यवसाय मॉडल और निवेश रणनीतियों में दोष अभी तक उजागर नहीं हुआ है और उद्यमों से धन का पलायन परिणामों के साथ जुड़ा हुआ है। भारत सहित दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने पहली बार यह धारणा बनाई कि मुद्रास्फीति अस्थायी थी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती के साथ यह प्रचारित किया जा रहा है कि मंदी अस्थायी होगी।

यह सच है कि अमेरिका में प्रणालीगत संकट ने इस पर फिर से विचार करने पर मजबूर किया है कि क्या ब्याज दरों में बढ़ोतरी होनी चाहिए या नहीं। पूर्वानुमान यह था कि अमेरिका में ब्याज दरें छह प्रतिशत तक पहुंच जाएंगी। यह भी सच है कि मौजूदा ब्याज दरें भी प्रभावित करेंगी और विकास को भी रोकेंगी। भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए इसमें सबक हैं, जो विकसित दुनिया की मुद्रास्फीति एवं पूर्वव्यापी तर्क में फंस गए हैं। धन की बढ़ती लागत अमेरिका और अन्य जगहों पर उद्यम पूंजी की क्षमता को कम करती है। भारत के स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र के लिए इसके निहितार्थ हैं। एक यूनिकॉर्न के रूप में स्टार्ट-अप का विकास व्यवसाय मॉडल पर निर्भर करता है, लेकिन एक स्थायी इकाई के रूप में विकसित होने के लिए वित्त पोषण अनुक्रमिक ग्लाइड पथ पर भी गंभीर रूप से निर्भर होता है।

पहले से ही धन की तंगी के संकेत बढ़ रहे हैं, जिसने जॉम्बी स्टार्ट-अप (ऐसी कंपनियां जो बूम के समय तो कमाई करती हैं, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पातीं) का भय पैदा कर दिया है। मूल्यांकन और शेयर बाजार में गिरावट भी फंड को बाहर निकलने से रोकती है —और स्टार्ट-अप के आईपीओ जारी होने के बाद के खराब रिकॉर्ड से यह और बढ़ जाता है। व्यापक स्तर पर उच्च लागत और कम विकास वाला परिदृश्य वैश्विक खपत को प्रभावित करता है और इसलिए व्यापार, एफडीआई एवं पोर्टफोलियो प्रवाह प्रकट होता है। यह और भी बदतर हो सकता है, अगर यह प्रकरण अमेरिकी वित्तीय बाजारों को संक्रमित करता है। प्रणालीगत जोखिम आमतौर पर केवल तभी सामने आता है, जब वह एक होता है। ऐसे में सलाह है कि गीतकार नीरज की पंक्तियों को याद रखें- ए भाई, जरा देख के चलो।   

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