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Unemployment: नौकरियों की कमी के बुनियादी कारण क्या हैं? एमएसएमई के पास श्रमिकों की कमी...

Sun, 25 May 2025 08:52 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 25 May 2025 08:52 AM IST
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सार
बड़े उद्योग उच्च शैक्षणिक योग्यता और अधिक हुनरमंद लोगों को रोजगार देते हैं, जो बेरोजगारों की एक बड़ी संख्या के पास नहीं होते। वहीं एमएसएमई को आवश्यकता है, लेकिन प्रतिभा को आकर्षित न कर पाने के कारण उनके पास श्रमिकों की कमी है।
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Unemployment In India What are the basic reasons for less job opportunities MSMEs facing shortage of workers
नौकरियों की कमी के बुनियादी कारण समझना जरूरी (सांकेतिक) - फोटो : फ्री पिक

विस्तार

बहुत छोटे, लघु, मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र पर हाल ही में दो रिपोर्ट आई हैं- एक भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की और दूसरी नीति आयोग की। दोनों ही आधिकारिक रिपोर्ट हैं। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण भी है।



बुनियादी तथ्य, विशेषता

बहुत छोटे, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के बुनियादी तथ्य क्या हैं, ये इन दोनों रिपोर्ट से समझा जा सकता है।

  1. मौजूदा वर्गीकरण के मुताबिक, बहुत छोटे उद्यम के लिए निवेश सीमा 2.5 करोड़ और कारोबार सीमा 10 करोड़ रुपये तक है। लघु उद्यमों के लिए 25 करोड़ रुपये तक और कारोबार सीमा 100 करोड़ रुपये तक है और मध्यम उद्यमों के लिए निवेश सीमा 125 करोड़ रुपये तक और कारोबार सीमा 500 करोड़ रुपये तक है। इस वर्गीकरण से यह साफ हो जाएगा कि भारत में कुछ हजार उद्यमों को छोड़कर बाकी सभी एमएसएमई हैं।
  2. एमएसएमई की कुल संख्या में ज्यादा झुकाव बहुत छोटे उद्यमों के पक्ष में है। इनका हिस्सा बहुत छोटे - 98.64 प्रतिशत, लघु - 1.24 प्रतिशत और मध्यम - केवल 0.12 प्रतिशत है।
  3. स्वामित्व में प्रोपराइटरशिप (59 प्रतिशत), साझेदारी (16), एलएलपी (1), प्राइवेट लिमिटेड कंपनी (23) और पब्लिक लिमिटेड कंपनी (1 फीसदी)
  4. शामिल हैं।
  5. भारत में करीब 7 करोड़ 34 लाख एमएसएमई हैं। मार्च 2025 तक इनमें से 6 करोड़ 20 लाख सरकार के उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत हैं।
  6. एमएसएमई क्षेत्र में 24 प्रतिशत का ऋण अंतर (करीब 30 लाख करोड़ रुपये) है। सेवा उप-क्षेत्र में यह अंतर 27 प्रतिशत है और महिलाओं के स्वामित्व वाले उद्यमों में यह अंतर 35 प्रतिशत है।
  7. 2023-24 में भारत के व्यापारिक निर्यात में एमएसएमई का योगदान लगभग 45 प्रतिशत था।  कुल मिलाकर, 2024-25 में निर्यात करने वाले बहुत छोटे, लघु और मध्यम उद्यमों की संख्या 1,73,350 थी, जो एमएसएमई की कुल संख्या का 1 प्रतिशत का एक अंश है। यहां से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएं हैं - सिले-सिलाए वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, चमड़े की वस्तुएं, हस्तशिल्प, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और ऑटो कलपुर्जे। इनमें से एक को छोड़ कर शेष सभी निम्नस्तरीय प्रौद्योगिकी वाली वस्तुएं हैं।
  8. बहुत छोटे, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए ऋण सहायता और विकास योजनाओं की भरमार है। रिपोर्ट पढ़ते हुए मैंने कम से कम दो सब्सिडी योजनाएं, चार क्रेडिट गारंटी योजनाएं और तेरह विकास योजनाएं गिनाई हैं। 2025-26 के बजट में पहली बार के उद्यमियों के लिए एक क्रेडिट कार्ड योजना की घोषणा की गई। इसके अलावा नए फंड ऑफ फंड्स, डीप टेक फंड ऑफ फंड्स और नए सिरे से बनाए गए स्ट्रीट वेंडर्स निधि (पीएम स्वनिधि) की भी घोषणा की गई है।
  9. एमएसएमई रोजगार सृजन का प्राथमिक स्रोत हैं। ऐसा दावा किया जाता है कि इस क्षेत्र द्वारा सृजित कुल रोजगार लगभग 26 करोड़ है।

नौकरियां हैं, पर लोग नहीं
अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं। एमएसएमई क्षेत्र की जो प्रमुख चुनौतियां हैं, वे रिपोर्ट में सूचीबद्ध हैं-

  • कुशल श्रमिकों की कमी, कार्य क्षमता में अंतर और प्रतिभा को आकर्षित करने में कठिनाई।

ये निष्कर्ष देश में बेरोजगारी की पूरी कहानी बयां करते हैं। यह मानना सही है कि बड़े उद्योग (जिनमें 125 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश और 500 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार है) उच्च शैक्षणिक योग्यता और अधिक हुनरमंद लोगों को रोजगार देते हैं, जो बेरोजगारों के बड़े हिस्से के पास नहीं होते। दूसरी ओर, एमएसएमई को श्रमिकों की आवश्यकता है, फिर भी यदि उनके पास श्रमिकों की कमी है और प्रतिभा को आकर्षित करने में कठिनाई है तो क्यों? खेदजनक, लेकिन अपरिहार्य निष्कर्ष यह है कि सबसे पहले आवेदकों के पास नौकरियों को भरने के लिए शिक्षा या कौशल ही नहीं है। दूसरी बात यह है कि उद्यम की संरचना या मेहनताने के कारण प्रस्तावित नौकरियां आकर्षक नहीं हैं।

  • संरचनात्मक तथ्यों और रोजगार परिणामों का मिलान करके यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि भारत के युवाओं में बेरोजगारी अधिक क्यों है।
  • अप्रैल 2025 में अपने देश की जनसंख्या 146 करोड़ थी।
  • श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) जनसंख्या का वह प्रतिशत है, जो या तो काम कर रहा है या सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश कर रहा है। यह 55.6 प्रतिशत या लगभग 81 करोड़ है।
  • श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) कुल जनसंख्या में कार्यरत लोगों के अनुपात को  परिभाषित करता है। यह 52.8 प्रतिशत या लगभग 77 करोड़ है।
  • बेरोजगारों की कुल संख्या का अंतर 4 करोड़ है। यह एक बड़ी संख्या है, लेकिन याद रखें, यह ‘सक्रिय रूप से रोजगार की तलाश’ करने वालों   की संख्या से बाहर है। ऐसे कई लाख लोग हैं, जिन्होंने अलग-अलग कारणों से रोजगार की तलाश छोड़ दी है।
  • आधिकारिक बेरोजगारी दर करीब 5 प्रतिशत है। यह आंकड़ा कुल 81 करोड़ में से 4 करोड़ है।

समाधान कहां है?
सबसे बड़ी संख्या ‘बहुत छोटे’ एमएसएमई की है, करीब 98.64 प्रतिशत, इस तथ्य के साथ कि स्वामित्व और भागीदारी सभी एमएसएमई का 75 प्रतिशत हिस्सा है। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि 26 करोड़ ‘रोजगार’ में से अधिकांश ऐसे हैं, जिनमें परिवार के सदस्य और रिश्तेदार हैं और वे उन्हीं के द्वारा संचालित उद्यमों में काम करते हैं। यह ‘लघु’ और ‘मध्यम’ (एमएसएमई का 1.36 प्रतिशत या लगभग 10,00,000) हैं, जो वास्तव में लोगों को रोजगार देते हैं, जहां मालिक और नौकर का रिश्ता होता है।

  • नौकरियों का ‘आपूर्ति’ पक्ष 10,00,000 एमएसएमई से आना चाहिए।
  • नौकरियों के लिए ‘मांग’ पक्ष उन युवा पुरुषों और महिलाओं से आना चाहिए, जो स्कूल छोड़ चुके हैं या जिनके पास स्कूली शिक्षा है या जिनके पास बुनियादी कला या विज्ञान की डिग्री है।

संभावित नियोक्ता ऋण की कमी, दमनकारी नियमों और अनेक योजनाओं तथा अनुपालनों से प्रभावित होते हैं। संभावित कर्मचारियों के सामने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव, कौशल की कमी और प्रशिक्षण का अभाव, संक्षेप में कहा जाए तो ‘प्रतिभा’ का अभाव जैसी समस्या सामने आती है।

शासन को इन कमियों पर ध्यान देना चाहिए। पहला पड़ाव कौशल प्रशिक्षण के साथ स्कूली शिक्षा है। अगला पड़ाव एसएमई (ध्यान दें कि मैंने एम हटा दिया है) को केवल एक उदार ऋण-सह-ब्याज सब्सिडी योजना के साथ मदद करना है। इसे सरल रखें।

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