टाइम मशीन: यूक्रेन का होल्डोमॉर, दुनिया का सबसे जघन्य जनसंहार
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विस्तार
अमेरिका के प्रसिद्ध डाॅक्यूमेंटरी निर्माता मैक्स वेक्स्टर बुढ़ापे से खौफजदा थे। वर्ष 2011 में उन्होंने एक खास फिल्म बनाई, जिसका नाम था-हाउ टु लिव फॉर एवर। वेक्स्टर ने उम्रदराज लोगों से बात की, ताकि लंबी उम्र का रहस्य पता चल सके। इसी फिल्म में एक सौ साला बुजुर्ग से सवाल किया गया कि आपकी जिंदगी में सबसे खुशी का दिन कौन-सा था। बुजुर्ग का जवाब था- 11 नवंबर, 1918 यानी पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति का दिन, जब उत्तर पूर्व फ्रांस के कस्बे कॉपिग्ने में संधि पर दस्तखत हुए थे। इतनी खुशी क्यों? बुजुर्ग ने कहा, क्योंकि युद्ध हमेशा के लिए खत्म होने वाले थे। पहले विश्वयुद्ध में दो करोड़ लोग मारे गए थे और इतने ही घायल हुए। और फिर, करीब बीस साल बाद दूसरा विश्वयुद्ध हुआ और फिर युद्ध रह-रहकर होते रहे। जैसे कि अगस्त के आखिरी सप्ताह में रूस ने यूक्रेन पर अब तक का सबसे बड़ा हवाई हमला किया। सैकड़ों मिसाइलें यूक्रेन के पूर्वी हिस्से में बरस पड़ीं।
विश्व के कुछ ही भूगोल इतने अधिक अभागे होंगे, जितना कि रूस-यूक्रेन है। यहां 21वीं सदी भी युद्ध से खाली नहीं गई। जार से लेकर कम्युनिस्टों के शासन तक और अब पुतिन तक, रूस-यूक्रेन का एक अतीत है, जिसे सत्ता संचालित मेगामर्डर, डेमोसाइड, जेनोसाइड और क्रूरतम सामूहिक हत्याओं ने लिखा है। यूक्रेन-रूस का भूगोल इतना दुर्भाग्यशाली है कि यहां कुछ जघन्यतम हत्याएं आर्थिक नीतियों की वजह से भी हुईं। चौंकिए नहीं, आर्थिक नीतियों ने हजारों लोगों को मार डाला। पकड़िए टाइम मशीन में अपनी सीट। यह यात्रा हमें कुछ ऐसा दिखाएगी, जो कभी नहीं होना चाहिए था। सो चलिए इस सफर पर...
यह पहले विश्वयुद्ध के बाद का दौर है। ऑस्ट्रिया और रूस के साम्राज्यों के बीच बंटा इतिहास सिमट रहा है। यह 1917 है। रूस में जार शासन को उखाड़कर व्लादिमीर लेनिन के बोल्शेविकों ने सत्ता संभाल ली है। इधर यूक्रेन में स्वतंत्र सरकार बन गई। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ यूक्रेन नाम का नया देश नक्शे पर उभर आया है। अब हम मास्को में हैं। बोल्शेविक यूक्रेन को खत्म करने जा रहे हैं। लाल सेना यूक्रेन पर चढ़ आई है। यूक्रेन की अस्थायी सरकार ने रूस से जमकर लोहा (1918 से 1921) लिया, लेकिन अंततः हार गया। अब यह मुल्क नए सोवियत संघ यानी सोशलिस्ट रिपब्लिक का हिस्सा है।
जार शासन के तख्तापलट के बाद रूस में सिविल वार शुरू हो गई है। लेनिन आर्थिक ताकत का केंद्रीकरण कर रहे हैं। वह रेड आर्मी की ताकत बढ़ाने के लिए उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने लगे हैं। यहां तक कि अनाज का उत्पादन भी सरकार के कब्जे में आ गया है। इससे लेनिन की सेना तो मजबूत हुई, मगर दमनकारी नीति ने अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया है। उत्पादन बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है। किसानों ने पैदावार सीमित कर दी है। शहरों में सामान की किल्लत साफ दिख रही है। फैक्टरी में कामगार नहीं है। हड़तालें हो रही हैं। यह 1921 का साल है। जो लोग लेनिन की क्रांति की सबसे बड़ी ताकत थे, वे अब विरोधी हो गए हैं। विरोध और दबाव के कारण व्लादिमीर लेनिन को नई आर्थिक नीति लानी पड़ी है। मार्च, 1921 में लेनिन ने नई नीति का एलान कर दिया है। अनाज पर बलपूर्वक कब्जे की नीति खत्म। इसके बदले एक टैक्स लगा दिया गया है। कुछ उद्योगों को निजी क्षेत्र को दे दिया गया। उत्पादन बढ़ा है, शहरों में लोग आने लगे हैं, लेनिन का नया पूंजीवाद उभर रहा है।
यह 1924 है। व्लादिमीर लेनिन नहीं रहे। जोसेफ स्टालिन ने सत्ता संभाल ली है और लेनिन की 1921 वाली नीति खत्म कर दी गई है, जिसमें निजी उद्यमिता को वरीयता दी गई थी। स्टालिन पंचवर्षीय योजना लेकर आए हैं। यूक्रेन के लिए स्टालिन की पहली पंचवर्षीय योजना मौत का फरमान साबित हुई है।
यह 1932 है। स्टालिन ने यूक्रेन की पूरी अर्थव्यवस्था बदल दी है। खेती का सामूहिकीकरण और सरकारीकरण हो गया है। निजी खेतों पर कब्जा कर सामूहिक कोलहोप्स फार्म में बनाए जा रहे हैं, जिनमें किसान मजदूर की तरह काम कर रहे हैं। कभी ये किसान इन खेतों के मालिक थे। स्टालिन अनाज उत्पादन में सोवियत संघ को बड़ी ताकत बनाना चाहते हैं। मगर यूक्रेन के अधिकांश किसान छोटी जोत वाले हैं, जो जीविका के लिए खेती करतेे हैं। स्टालिन की इस नीति के खिलाफ आंदेालन शुरू हो गए हैं। यूक्रेन में ऐसे करीब 4,000 आंदोलन हुए हैं, जिन्हें स्टालिन की सोवियत पुलिस ने सख्ती से कुचल दिया है। किसानों को लेबर कैंप में भेज दिया गया है। स्टालिन की कृषि नीति के विरोध को राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया गया है।
स्टालिन ने (1932) फाइवे स्टेक्स ऑफ ग्रेन की कुख्यात नीति लागू कर दी है। प्रत्येक गांव के लिए अनाज का कोटा तय कर दिया है। अनाज की जबरन खरीद हो रही है। अनाज पहले सरकार को देना होता है, इसके बाद जो बचा, वह खाने को मिलता है। घर-घर में अनाज का संकट हो गया है। अगर कोई बच्चा भी अनाज ले जाता मिल जाए, तो उसे जेल में बंद करने या गोली मारने के आदेश हैं। कोटे से अधिक अनाज घर में मिलना यानी सोशलिस्ट प्रॉपर्टी की लूट। 1933 की शुरुआत तक 55 हजार लोग जेल में बंद किए गए। 2,000 को मौत की सजा दी गई। अब यूक्रेन में भुखमरी शुरू हो गई है। गांव खाली कर लोग भोजन की तलाश में दूसरी जगहों पर जाने लगे हैं।
यूक्रेन के भयावह युग को देखते हुए आपने वायश्लेव मोल्टोव का नाम सुना होगा, जो स्टालिन के सबसे करीबी हैं। मोल्टोव ने यूक्रेन की सीमाएं बंद कर दी हैं। गांव छोड़कर जाने पर रोक लगा दी गई, ताकि मजदूर भाग न जाएं। जो गांव अनाज का कोटा पूरा नहीं करता, उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। अनाज के लिए हिंसा शुरू हो गई। अब आप यूक्रेन का होल्डोमॉर देख रहे हैं। यानी ऐसी भुखमरी, जो शासकों ने पैदा की है। लोग घास, सड़ा अनाज, यहां तक कि कुत्ते-बिल्ली भी मारकर खा रहे हैं। सोवियत पुलिस घर-दीवारें खोदकर अनाज तलाश रही हैं।
यह होल्डोमॉर दुनिया के इतिहास का सबसे जघन्य जनसंहार है। यूक्रेन के डेमोग्राफी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट (2015) बता रही है कि 1932-33 के बीच होल्डोमॉर से यूक्रेन में 39 लाख लोग मारे गए। वर्ष 1932 में सोवियत शासन ने 42.7 लाख टन अनाज लूटा, जिससे करीब 1.2 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था। यह स्टालिन का ऐसा जनसंहार था, जो बरसों तक दुनिया से छिपा रहा।
अब हम 2019 के बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में हैं। यहां पोलैंड के मशहूर फिल्म निर्देशक एग्निज्का हॉलैंड की फिल्म दिखाई जा रही है, जो पत्रकार गैरेट जोन्स और होल्डोमॉर पर केंद्रित है। गैरेट जोन्स ब्रिटेन के पत्रकार थे, जो 1933 में यूक्रेन गए थे। वह इस मेगामर्डर के शायद अकेले गवाह थे। यूक्रेन से लौटने के बाद उन्होंने होल्डोमॉर के बारे में बताया, लेकिन तब इसे शायद नात्जी प्रचार का हिस्सा मान लिया गया। जोन्स की मौत के लंबे समय के बाद उनके कुछ संस्मरण मिले। तब तक होल्डोमॉर को लेकर अन्य जानकारियां भी सामने आने लगी थीं। दुनिया को जब इस जनसंहार के बारे में पता चला, तो दिल दहल उठे। पत्रकार जोन्स यूक्रेन के हीरो हो गए। यह फिल्म देखकर आपके रोंगटे खड़े हो गए होंगे। क्या आप भी यही सोच रहे हैं कि यूक्रेन का अभिशाप खत्म क्यों नहीं होता... टाइम मशीन इस दर्दनाक सफर को अब खत्म करना चाहती है। फिर मिलते हैं अगली यात्रा में...