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Turkey Earthquake: तुर्किये के भूकंप पीड़ितों की मार्मिक पुकार, अकेला छोड़ने को लेकर लोगों में गुस्सा

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सार
भूकंप प्रभावित लोग सोशल मीडिया पर बगैर कैप्शन या टिप्पणी के तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। इनके जरिये वे दो संदेश दे रहे हैं : एक यह कि उन्होंने अपने जीवन के सबसे भीषण अनुभव का सामना किया है, और दूसरा यह कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है। मैंने अपने लोगों को इतने गुस्से में कभी नहीं देखा।
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Turkey earthquake story A Girl Trapped Under Collapsed building Debris Man Unsure of What to Do
Turkey Earthquake - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

उदास आंखों वाली वह लड़की निश्चित तौर पर दस या बारह साल की होगी। कैमरा फोन की तरफ टकटकी लगाकर देखते हुए भी मुश्किल से वह हिल-डुल सकती है। वीडियो बना रहे व्यक्ति की नजर अचानक उस पर पड़ती है, और वह खुशी से चिल्लाने लगता है, 'यहां कोई है, यहां कोई है!' लेकिन वहां धुंधली रोशनी और बर्फ गिरने की खामोशी के अलावा कुछ नहीं है। यह दक्षिण पूर्वी तुर्किये की कोई जगह है, जो कुछ ही दिनों पहले दो भूकंपों से पूरी तरह विध्वस्त हो चुकी है, जिनकी तीव्रता रिक्टर स्केल पर क्रमश: 7.8 और 7.5 थी। वह व्यक्ति उस लड़की के पास जाता है, जो सीने तक कंकरीट के मलबे में धंसी है। स्पष्ट है कि वे एक-दूसरे को नहीं जानते।


'क्या तुम्हें प्यास लगी है?' व्यक्ति पूछता है।
'नहीं, मुझे ठंड लग रही है। मेरा भाई भी इसी मलबे में है।'
'क्या तुम हिल सकती हो?'
'नहीं', लड़की के स्वर में कमजोरी स्पष्ट है। इसके बावजूद उसकी धीमी पड़ती आवाज सुनने लायक है। लेकिन उसकी आंखों में कोई उम्मीद नहीं है। ‘क्या तुम अपने पांव हिला सकती हो?’


'बहुत मुश्किल से', लड़की धीमे स्वर में जवाब देती है, जिसे समझना कठिन है। अब उसके चेहरे पर नए तरह के भाव हैं, जैसे वह कुछ छिपाना चाहती है, या व्यक्तिगत परेशानी से शर्मिंदा है। रात से सुबह तक रह-रहकर बर्फबारी हो रही है। भूकंप की यंत्रणा तथा मारे जा चुके व मर रहे लोगों के बीच बर्फ की मोटी चादर बिछ चुकी है। दो से तीन मंजिला मकानों तथा पंद्रह से सोलह मंजिले अपार्टमेंट्स के मलबों पर भी, जो रात में कुछ सेकंड के भीतर ही ध्वस्त हो गए, बर्फ की चादर बिछी है।

मोबाइल से वीडियो बना रहे उस आदमी को समझ में नहीं आ रहा कि वह क्या करे! अपने आप वह उस लड़की को मलबे के ढेर से बाहर नहीं निकाल सकता। वे दोनों खामोश रहते हैं। एकबारगी लगता है कि लड़की की आंखों में कोई भाव नहीं है। लेकिन दूसरे ही पल उसके चेहरे पर दर्द और गहरी थकान के भाव दिखने लगते हैं। 'तुम यहीं रहना। मैं तुम्हारे लिए मदद की व्यवस्था करता हूं। हम तुम्हें मलबे से बाहर निकाल लेंगे', वह आदमी कहता है।

लेकिन उस व्यक्ति के स्वरों में अनिश्चय है। भूकंप के कारण बिल्कुल समतल हो चुका यह इलाका संभवत: सिटी सेंटर से दूर है। चूंकि सड़कें और पुल-ध्वस्त हो चुके हैं, ऐसे में मदद पहुंचने में समय लगेगा। यहां जो लोग रहते थे, बहुत संभव है कि उनमें से कुछ अंधेरी और बर्फबारी भरी भूकंप की रात में, जब उनका घर टूटकर बिखर रहा था, अपनी जान बचाकर बाहर निकलने में सफल हो गए हों। निश्चय ही वे लोग इस ठंड में कहीं शरण मांग रहे होंगे। लेकिन यह मानना असंभव है कि मलबे में फंसी यह लड़की और उसके भाई के अलावा उसके परिवार का और कोई इस भूकंप में जीवित बचा होगा। इसी कारण कोई इन भाई-बहन को नहीं ढूंढ़ रहा। 'आप मत जाइए', फंसी हुई लड़की जाते हुए व्यक्ति से अनुरोध करती है। 'मुझे जाना होगा, पर मैं लौटूंगा। मैं तुम्हें भूलूंगा नहीं, तुम्हारी मदद के लिए लौटूंगा', ठिठकते हुए वह आदमी कहता है।

ऐसा लगता है कि आधे दिन से भी अधिक अवधि से मलबे में फंसी हुई लड़की अब मानसिक रूप से खुद को मृत्यु के लिए तैयार कर रही है। जाते हुए व्यक्ति ने जवाब हालांकि बुलंद आवाज में दिया था, लेकिन उसके कहे पर यकीन नहीं किया जा सकता।

हम नहीं जानते कि वह आदमी मदद का अपना वादा पूरा कर पाएगा या नहीं। वह उन सैकड़ों आर्त स्वरों और प्रत्यक्षदर्शियों में से एक था, जिन्हें मैंने पहले दिन घंटों मोबाइल के स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रखने के क्रम में देखा था। दूसरे लोगों की तरह उस व्यक्ति ने भी मलबे में फंसी उस लड़की का वीडियो बगैर किसी टिप्पणी के ट्विटर पर पोस्ट किया था। उसके बाद से ही मैं उस लड़की को मलबे से बाहर निकालने के वीडियो का इंतजार कर रहा हूं।

पिछले 80 साल में तुर्किये में आया यह सबसे भीषण और मेरे अनुभव में यह चौथा भूकंप है। वर्ष 1999 में मार्मरा में आए भूकंप के बाद, जिसमें 17,000 से अधिक लोग मारे गए थे, मैं उस यालोवा शहर में गया था, जो ध्वस्त हो चुके शहरों में से एक था। वहां मैं ध्वंसावशेषों के बीच घूमते हुए खुद को दोषी मानने और कुछ जिम्मेदारी उठाने की भावना से भरा हुआ था। मैंने ठान लिया था कि और कुछ नहीं, तो मलबा हटाने में ही मदद जरूर करूंगा, लेकिन एक आदमी की भी सहायता किए बगैर मैं रात को लौटा था। उस हताश मन:स्थिति से मैं बहुत दिन तक बाहर नहीं निकल पाया था।

भूकंप से चूंकि हवाई अड्डे ध्वस्त हो चुके हैं और सड़कें चलने लायक नहीं बची हैं, ऐसे में, मीडिया को भी कामकाज में मुश्किलें आ रही हैं। सरकार के मुताबिक, देश के कुल 1.35 करोड़ लोग भूकंप से प्रभावित हुए हैं, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तुर्किये और सीरिया में भूकंप से प्रभावित लोगों का आंकड़ा 2.3 करोड़ है। सोशल मीडिया पर लोग बगैर कैप्शन या टिप्पणी के तस्वीरें पोस्ट कर रहे हैं। इनके जरिये वे दो संदेश दे रहे हैं : एक यह कि उन्होंने अपने जीवन के सबसे भीषण अनुभव का सामना किया है, और दूसरा यह कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है। हर बड़े शहर में मलबों के ढेर के पास अगर कोई रिपोर्टर आता है, तो लोग चिल्लाते हैं, 'फोटो खींचिए, फोटो खींचिए। हमें मदद चाहिए। हमें भोजन चाहिए। कहां है सरकार? राहतकर्मी कहां हैं?'

अगले दिन सोशल मीडिया के जरिये मुझे पता चला कि अनेक डॉक्टर खुद ही लंबी दूरी तय कर भूकंप प्रभावित बड़े शहरों में पहुंचे। लेकिन उन्हें दिशा-निर्देश देने वाले सरकारी अधिकारी कहीं नहीं थे। कई सरकारी अस्पताल तक ध्वस्त हो चुके हैं। भूकंप के दो दिन बाद बड़े शहरों में राहत पहुंचनी शुरू हुई। लेकिन राहत सामग्रियों से भरे ट्रक प्रभावित इलाकों से सैकड़ों मील दूर सड़क जाम में फंसे हुए हैं। अपने घर, परिवार और प्रिय व्यक्तियों को खो चुके लोगों को लग रहा है कि कोई उनकी मदद नहीं कर रहा। ऐसे में, वे सड़क पर किसी सरकारी अधिकारी या पुलिस की गाड़ी देखते ही उसे रोक देते हैं और अधिकारियों पर बरसने लगते हैं। मैंने अपने लोगों को इतने गुस्से में कभी नहीं देखा।

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