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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Those who are creating a fog of questions regarding Operation Sindoor should remove the fog and see the truth

ऑपरेशन सिंदूर : हासिल बहुत कुछ हुआ, आलोचकों को कुहासे को हटाकर देखनी चाहिए सच्चाई

Arunendra Nath Verma अरुणेंद्र नाथ वर्मा
Updated Tue, 13 May 2025 06:51 AM IST
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सार
ऑपरेशन सिंदूर को लेकर जो लोग सवालों का कुहासा निर्मित कर रहे हैं, उन्हें कुहासे को हटाकर सच्चाई देखनी चाहिए।
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Those who are creating a fog of questions regarding Operation Sindoor should remove the fog and see the truth
ऑपरेशन सिंदूर के मकसद पूरे हुए - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ऑपरेशन सिंदूर (प्रथम) की शानदार सफलता पर भारतीय जनमानस ने एक स्वर में सेनाओं और राजनीतिक नेतृत्व को बधाई दी थी। दूसरे चरण के अड़तालीस घंटों के अंदर ही हमारी सेनाओं की स्वर्णिम सफलता पर नकारात्मक सोच वाले शंकालु बेतुके सवाल और टिप्पणियां करने लगे। अतः समीचीन होगा कि तटस्थ और वैज्ञानिक अन्वेषण से निकली सच्चाइयों को इस सवालिया कुहासे के ऊपर उभरने दिया जाए।



पहले इन सवालों पर एक नजर-पहला पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ‘मौलाना’ असीम मुनीर ने अपने गैरजिम्मेदाराना वक्तव्यों और कृत्य के लिए माफी नहीं मांगी है। दूसरा, पाकिस्तानी सेनाओं ने सन 1971 जैसा आत्मसमर्पण नहीं किया। तीसरा, पहलगाम के हत्यारे आतंकियों को अब तक भारत के हवाले नहीं किया। चौथा, पीओके का भारत में विलय नहीं किया गया। पांचवां, पाकिस्तान के किसी सैन्य ठिकाने पर भारत ने कब्जा नहीं किया। छठा, पाकिस्तान ने कोई गारंटी नहीं दी कि भविष्य में आतंकी सरगनाओं को पनाह नहीं देगा और सातवां सवाल, भारत विश्व की चौथी आर्थिक शक्ति बनने के बावजूद अपनी समृद्धि को युद्धोन्माद पर लुटाने की स्थिति में नहीं है।


छिद्रान्वेषी हर सूरत में कोई न कोई सवाल उठाते रहेंगे। फिर भी उनके उत्तर देना जरूरी है। अतः इन सवालों के उत्तरों पर आएं। कोई भी देश सैन्य कार्रवाई से पहले अपने लक्ष्य निर्धारित करता है। सैनिक अभियान और उन्मादित भीड़ में यही मौलिक अंतर होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दूसरे चरण का मूल लक्ष्य आक्रामक था ही नहीं। इसका लक्ष्य सिंदूर प्रथम चरण में पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर किए गए कारगर भारतीय हमले से दहले पाकिस्तान के युद्धोन्मादी सेना प्रमुख की गैरजिम्मेदाराना हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देना भर था।

ध्यान रहे कि इस सीमित मुठभेड़ को दोनों देशों ने अघोषित युद्ध में ही सिमटे रहने दिया। भारत ने पाकिस्तान के ड्रोन, मिसाइल व लड़ाकू विमानों के हमलों का जवाब उसी की भाषा में दिया। पाकिस्तान ने तो राजस्थान की सीमा पर युद्धाभ्यास के बहाने अपनी स्थल सेना के टैंकों, बख्तरबंद गाड़ियों और तोपों को मोबिलाइज भी किया, पर भारत की स्थल सेना को अग्रिम क्षेत्र में मोर्चे संभालने का कोई आदेश नहीं दिया गया। यहां तक कि हमारी सरहदों की पहली सुरक्षा पंक्ति बीएसएफ (सीमा सुरक्षा बल) को गृह मंत्री अमित शाह ने केवल सतर्क रहने और आवश्यकता पड़ने पर समुचित कार्रवाई करने का ही आदेश दिया। ये सभी तथ्य दिखाते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के द्वितीय चरण में भारत ने पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर कब्जा करने या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को रौंदकर वापस हमारे गणतांत्रिक कश्मीर में मिलाने का लक्ष्य अपनी सेनाओं को दिया ही नहीं गया था।

हर तरह से छेड़े जाने पर भी भारत ने आपा नहीं खोया व आणविक युद्ध की धमकी जैसी बचकानी हरकत करने से बचकर रहा। भुज व जैसलमेर से लेकर श्रीनगर तथा अवंतिपुरा तक पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। उसके जवाब में हमारी सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया। इसका प्रमाण यह है कि संघर्ष विराम (युद्ध विराम नहीं, क्योंकि युद्ध तो उभय पक्ष ने घोषित ही नहीं किया) करने का अनुरोध पाकिस्तान के डीजीएमओ ने अपने भारतीय समकक्ष को फोन करके किया था।

पाकिस्तानी सेना द्वारा ढाका शैली में आत्मसमर्पण न करने या मौलाना मुनीर का अपने कृत्यों के लिए खेद प्रदर्शन न करने वाली टिप्पणी को या तो बचकाना कहा जा सकता है या युद्धोन्माद। जिन परिस्थितियों में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने 1971 में आत्मसमर्पण किया, उसमें काफी अंतर था। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि पीओके के भारत में विलय की कामना हर भारतीय के मन में है, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के दूसरे चरण का उद्देश्य केवल प्रतिरक्षात्मक था। एक सीमित लक्ष्य की दिशा में बढ़ते कदमों को सीमाहीन युद्ध की तरफ मोड़ देना आज की वैश्विक परिस्थितियों में व्यावहारिक नहीं है। रूस जैसा सशक्त देश वर्षों से यूक्रेन में जूझ रहा है। हमास को स्थायी सबक सिखाने का इस्राइल का इरादा लंबे युद्ध में बदल गया। यह सब देखने के बाद अखंड भारत के पुनर्निर्माण की कल्पना आकर्षक तो है, पर व्यावहारिक नहीं-कम से कम फिलहाल।

अंत में शंकालुओं का सवाल-क्या पाकिस्तान से आतंकियों को प्रश्रय न देने की गारंटी मिल गई? इसका उत्तर बहुत कड़वा है, लेकिन पाकिस्तान में जब तक गणतंत्र फौजी बूटों के तले कराहता रहेगा, वह किराये के आतंकियों को पनाह देने को मजबूर होता रहेगा। तो क्या हमारे सैनिकों का बलिदान और महंगे हथियारों का प्रयोग व्यर्थ गया? इसका उत्तर है ‘इटरनल विजिलेंस इज द प्राइस ऑफ लिबर्टी’-स्वाधीनता का मूल्य शाश्वत सतर्कता से अदा करना पड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर के द्वितीय चरण के हासिल के रूप में पाकिस्तानी आतंकियों से सदा के लिए मुक्ति पाने की आशा रखना कोरी काव्यात्मक कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

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