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साफ शहर आदतों से बनेंगे: समाज केवल कानूनी बंदिशों से नहीं, परस्पर सम्मान की आदतों से सुसंस्कृत बनता है

Mon, 07 Sep 2026 10:56 AM IST
ज्योति भास्कर कुमार रोहित।
कुमार रोहित। Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 07 Sep 2026 10:56 AM IST
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सार
शहर केवल कानूनों से नहीं, बल्कि नागरिकों के विवेक से और समाज के परस्पर सम्मान की आदतों से संवरते व सुसंस्कृत बनते हैं।
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Clean city built through habits society becomes cultured not merely with legal restriction but mutual respect
क्या हमारे शहर स्वभाव से गंदे हैं या हम उन्हें अपनी आदतों से रोज गंदा बनाते हैं? - फोटो : अमर उजाला Archive

विस्तार

सुबह छह बजे किसी भी शहर की मुख्य सड़क देखिए। सफाईकर्मी की झाड़ू ने रातभर की धूल समेट दी है। सड़क साफ लगती है। दोपहर होते-होते उसी किनारे प्लास्टिक की बोतलें, चाय के कुल्हड़ व नमकीन के पैकेट फिर दिखने लगते हैं। शाम तक वही कोना अपनी पुरानी मैली पहचान में लौट आता है। सवाल है, क्या हमारे शहर स्वभाव से गंदे हैं या हम उन्हें अपनी आदतों से रोज गंदा बनाते हैं? यह केवल कचरा प्रबंधन की नाकामी है या उस साझा जिम्मेदारी के संकट का संकेत, जिस पर सभ्य व शांत समाज टिका है? संयोग देखिए।



 संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 8 दिसंबर, 2023 को प्रस्ताव पारित कर 20 सितंबर को ‘विश्व स्वच्छता दिवस’ घोषित किया। अगले दिन 21 सितंबर को ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस’ है। पहला धरती को कचरे से मुक्त रखने का आह्वान करता है, दूसरा समाज में शांति और सह-अस्तित्व का। लेट्स डू इट वर्ल्ड के अनुसार 2018 से अब तक 212 देशों में 13.9 करोड़ से अधिक लोग इसमें भाग ले चुके हैं। चेतावनी बड़ी है।


संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की ग्लोबल वेस्ट मैनेजमेंट आउटलुक 2024 कहती है कि वैश्विक नगरपालिका कचरा 2023 में 2.1 अरब टन से बढ़कर 2050 तक 3.8 अरब टन हो सकता है। 2020 में कचरा प्रबंधन की प्रत्यक्ष लागत 252 अरब डॉलर थी, पर प्रदूषण और बीमारी की छिपी लागत जोड़ें, तो यह 361 अरब डॉलर थी, जो बिना सुधार के 2050 तक 640.3 अरब डॉलर सालाना तक पहुंच सकती है। भारत में चुनौती बड़ी है।

स्वच्छ भारत मिशन के बाद 12 करोड़ से अधिक शौचालय बने व घर-घर कचरा संग्रहण 80 प्रतिशत शहरी वार्डों तक पहुंचा। फिर भी स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन 2.0 के अनुसार देश में रोज करीब 1.5 लाख टन कचरा निकलता है, जिसमें से प्रसंस्करण 65-70 प्रतिशत के आसपास है। शेष लैंडफिल में जाता है, नाले जाम करता है और बाढ़ से डेंगू तक की श्रृंखला बनाता है। पर्यावरण मंत्रालय ने 27 जनवरी 2026 को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2026 अधिसूचित किए। इनमें स्रोत पर चार-धारा पृथक्करण-गीला, सूखा, सेनेटरी और विशेष देखभाल वाला कचरा-अनिवार्य है और ‘प्रदूषक भुगतान करे सिद्धांत’ पर क्षतिपूर्ति का प्रावधान है।

पर नियम कागज पर, आदत जमीन पर। सार्वजनिक संपत्ति को किसी की नहीं समझना हमारे नागरिक बोध की कमजोर कड़ी है। यह कमजोरी केवल कचरा फेंकने तक सीमित नहीं। कतार तोड़ना, बिना जरूरत हॉर्न बजाना-ये सब अपनी सुविधा के लिए दूसरे के अधिकार की अनदेखी हैं।

छोटी अव्यवस्था अनदेखी रहे तो बड़ी अराजकता को न्योता देती है। जहां यह अनदेखी भौतिक रूप लेती है, वहां गंदगी फैलती है; जहां व्यवहार में उतरती है, वहां अशांति। समाज की परिपक्वता इससे तय होती है कि नागरिक तब कैसा व्यवहार करता है, जब उसे कोई देख नहीं रहा। इसे केवल नागरिक के नैतिक बोध पर छोड़ना एकतरफा होगा। क्या हर मोहल्ले में चार अलग कूड़ेदान हैं? क्या कचरा गाड़ी समय पर आती है? क्या कचरा बीनने वाले अनौपचारिक सफाईकर्मी, जो रीसाइक्लिंग की रीढ़ हैं, उन्हें औपचारिक व्यवस्था में सम्मान मिला है?

इंदौर की सफलता केवल संस्कार नहीं। 2016 से लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति, रात में सफाई, जीपीएस से निगरानी वाली गाड़ियां, वार्ड स्तर पर जुर्माना व स्वच्छता दीदियों की भागीदारी ने उसे सात बार स्वच्छ सर्वेक्षण में प्रथम बनाया। मेघालय का मावलिननॉन्ग गांव 2003 में डिस्कवर इंडिया  पत्रिका द्वारा एशिया का सबसे स्वच्छ गांव घोषित होने से पहले ही बांस की टोकरियों, प्लास्टिक प्रतिबंध व सामुदायिक जुर्माने की परंपरा जी रहा था। देश भर में युवा समूह घाटों व बाजारों की सफाई में जुटे हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि आदतें बदली जा सकती हैं, यदि सामूहिक इच्छा हो। कानून दिशानिर्देशक हैं, आदत स्थायी समाधान।

भारत विरासत से दुनिया को आकर्षित करता है, पर पर्यटन केवल स्मारक देखने से नहीं, अनुभव से बनता है। किले की भव्यता के साथ बाहर बिखरा कूड़ा दिखे, तो चमक कड़वे अनुभव को ढक नहीं पाती। अतिथि देवो भवः तभी सार्थक है, जब स्वच्छ व अनुशासित सार्वजनिक परिवेश दें। विश्व स्वच्छता दिवस व शांति दिवस हमें यही याद दिलाते हैं। शांत समाज केवल बड़े टकरावों के न होने का नाम नहीं है।

स्वच्छ शहर केवल झाड़ू लगाने से नहीं बनता। जेब में एक रैपर रख लेने का संयम, बिना हॉर्न अपनी बारी का इंतजार करने का धैर्य और सार्वजनिक जगह पर दूसरे की सुविधा का ख्याल-यही वह चेतना है, जहां स्वच्छता शांति में बदलती है। शहर केवल नगर निगमों की व्यवस्था से नहीं, बल्कि नागरिकों के विवेक से संवरते हैं; और समाज केवल कानूनी बंदिशों से नहीं, परस्पर सम्मान की आदतों से शांत और सुसंस्कृत बनता है।

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