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भारत में दुनिया की बढ़ती दिलचस्पी

देवेश कपूर Updated Fri, 13 Jul 2018 07:33 PM IST
विज्ञान और भारत
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भारत की आजादी से पहले अमेरिका में भारत से संबंधित अध्ययन मामूली था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इस क्षेत्र में सैन्य अभियानों के लिए अमेरिकी सेना की जरूरतों के मद्देनजर इस इलाके के अध्ययन के क्षेत्र में कूदा गया, जो आगे 1950 और 1960 के दशक में बढ़ा, जब शीतयुद्ध की अनिवार्यताओं ने अमेरिका को विभिन्न विश्वविद्यालयों में विभिन्न वैश्विक क्षेत्रों का अध्ययन करने और छात्रों को उनकी भाषा में प्रशिक्षित करने के लिए केंद्र स्थापित करने के लिए प्रेरित किया।
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भारत इस अवधि के दौरान अमेरिकी सहायता पाने वाला एक प्रमुख देश था। एक समय जब भारत बहुत गरीब था, संसाधन बहुत सीमित थे और संचार के साधन बहुत धीमे थे, बहुत से अमेरिकी शिक्षाविद भारत में रहना, सिखाना और सहयोगी अनुसंधान करना चाहते थे, जो आज की तुलना में खास तौर पर महत्वपूर्ण था। 

यह सहयोग ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में था। आईआईटी, कानपुर अपने पहले दशक में इंडो-अमेरिकन कार्यक्रम से लाभान्वित हुआ, जहां नौ अमेरिकी विश्वविद्यालयों के एक संघ ने शोध प्रयोगशालाओं और अकादमिक कार्यक्रमों की स्थापना में मदद की। आईआईएम, अहमदाबाद और कलकत्ता प्रतिष्ठित अमेरिकी बिजनेस स्कूल के सहयोग से विकसित हुए। 

बीती सदी के 60 और 70 के दशक में भारत में कृषि से संबंधित उच्च शिक्षा संस्थानों के विकास में भी अमेरिका का समान रूप से सहयोग था। अमेरिकी भूमि अनुदान विश्वविद्यालयों के मॉडल पर पांच अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने नौ नवस्थापित राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के साथ भागीदारी की और इन विश्वविद्यालयों में दो या तीन साल के कार्य पर करीब तीन हजार प्रोफेसरों को भेजा।

हालांकि 1970 और 80 के दशक के दौरान भारत-अमेरिकी संबंधों के ठंडा पड़ने से अमेरिकी शिक्षाविदों के लिए इस देश में अनुसंधान करना मुश्किल हो गया, नतीजतन अमेरिकी अकादमिक जगत में भारत अध्ययन का मामूली क्षेत्र बन गया। पिछले पच्चीस साल में हालांकि अमेरिका में भारत से संबंधित छात्रवृत्तियों की संख्या बढ़ी है।

कोई देश जब आर्थिक और सुरक्षा कारणों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, तो अमेरिकी शिक्षाविदों की दिलचस्पी भी उसमें बढ़ जाती है। लेकिन भारत के मामले में अमेरिकी दिलचस्पी दो अतिरिक्त कारणों से भी बढ़ी है : अमेरिका में पढ़ने वाले प्रवासी भारतीय छात्रों के नामांकन में वृद्धि, और भारत पर पाठ्यक्रम की उनकी मांग, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है धन का नया स्रोत। पहले के विपरीत अब अमीर भारतीय वित्तपोषण के नए स्रोत के रूप में उभर रहे हैं-चाहे वे भारत में हों, ब्रिटेन में हों, सिंगापुर, दुबई या अमेरिका में हों। अमेरिका में भारत से संबंधित ज्यादातर अनुसंधान विज्ञान में है, न कि मानविकी या समाज विज्ञान में।

भारत से संबंधित विज्ञान के कार्य कई वैज्ञानिक विषयों में है और इसकी दो प्रमुख विशेषताएं हैं-पहला, यह अक्सर भारत में शोधकर्ताओं के साथ सहयोगी होता है और दूसरा, ज्यादातर वैज्ञानिक शोध की मीडिया में कोई खबर नहीं होती, जाति के अनुवांशिक संबंध या भारतीय मानसून का अध्ययन इसके अपवाद हैं। अमेरिका में भारत से संबंधित शोध के दो अन्य क्षेत्र हैं-मानविकी और समाज विज्ञान। मानविकी पर प्रवासी भारतीयों का प्रभुत्व है। इसके विपरीत, सामाजिक विज्ञान क्षेत्र में भारत से संबंधित काम में काफी वृद्धि हुई है।

यह क्षेत्र ज्यादा अनुभवजन्य बन गया है और भारत एक शोधकर्ता के लिए कई तरह के फायदे प्रदान करता है-विशाल सैंपल साइज, कई आयामों में विषमता, आंकड़ा जुटाने में कम लागत, और कमजोर आधिकारिक निरीक्षण। अमेरिका या चीन में इस तरह के कई परीक्षण करना मुश्किल है। 

नतीजतन, कस्टम डिजाइन किए गए घरेलू सर्वेक्षण और यादृच्छिक नियंत्रण परीक्षणों (आरसीटीज) में वृद्धि हुई है, जो बाहरी वित्तपोषण द्वारा समर्थित हैं, और जिसने देश के बारे में नई समझ पैदा की है। लेकिन इस काम का नीतिगत प्रभाव क्या रहा है? यह कहना पर्याप्त है कि भारत के मुकाबले अमेरिकी शोधकर्ताओं के करियर के लिए इसके प्रभाव अधिक सकारात्मक रहे हैं।

जब हमने पूछा कि इनमें से कितने महंगे आरसीटीज ने भारत में नीतिगत मानकों को प्रभावित किया है, तो भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम को एक भी ऐसा उदाहरण ढूंढने में काफी मेहनत करनी पड़ी, जो उनकी मेज पर आने वाले दर्जनों तनावपूर्ण सवालों का समाधान करने में मददगार हो।

इसके विपरीत, भारतीय गैर सरकारी संगठन, प्रथम द्वारा सीखने के परिणामों पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के संकलन का शिक्षा में नीतिगत चर्चाओं पर बड़ा प्रभाव पड़ा है, क्योंकि यह विशिष्ट ज्ञान और सहभागिता से समर्थित है, इसलिए ज्यादा विश्वसनीय और प्रेरक है। 


पिछले कुछ दशकों में भारत ने अपने विश्वविद्यालयों और बौद्धिक संस्कृति को खुद कमजोर किया है। दरअसल, व्यक्तिगत रूप से सरकारी विभागों के बारे में लोगों को पता है कि वे भारतीय स्नातक छात्रों को आंकड़े देने से इन्कार करते हैं, भले ही वे विदेशी शोधकर्ताओं को वही आंकड़ा देते हैं, जो विचित्र है। लेकिन चीजें बदल रही हैं, खासकर विज्ञान के क्षेत्र में, जहां भारत वैज्ञानिक प्रकाशन के स्रोत के रूप में चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। 2006-16 तक वैश्विक विज्ञान एवं इंजीनियरिंग संबंधी लेखों का भारत का हिस्सा लगभग दोगुना हो गया (2.45 प्रतिशत से 4.8 प्रतिशत), जबकि प्रकाशनों की संपूर्ण संख्या तीन गुना बढ़ी है। माना जाता है कि इनमें से कई मामूली गुणवत्ता वाले हैं, पर यह ठहराव या गिरावट नहीं है।

ऐसा समाजिक विज्ञान में नहीं है, जो सार्वजनिक धारणाओं और सार्वजनिक नीति को सीधे-सीधे प्रभावित करने के कारण महत्वपूर्ण है। देश में सामाजिक विज्ञान शोध की सामग्री को विनियमित करने की भारत की कोशिश गंभीर गलती होगी। बल्कि उसे इसका तुलनात्मक लाभ उठाना चाहिए और भारतीय शोधकर्ताओं के साथ अमेरिकी शोधकर्ताओं के बेहतर संबंधों पर जोर देना चाहिए और भारत के अधिक से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित करना चाहिए।

 -लेखक सीएएसआई के निदेशक हैं। 

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