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गांव लौटी महिलाओं के हित में

Sat, 04 Jul 2020 10:01 AM IST
manisha singh मनीषा सिंह
Updated Sat, 04 Jul 2020 10:01 AM IST
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The village returned in the interest of women
छत्तीसगढ़ से पैदल चलकर परिवार के साथ लखनऊ जाता प्रवासी मजदूर। - फोटो : PTI

लॉकडाउन के समय गांव लौटे, और वहां से अब शहर लौट रहे प्रवासी मजदूरों के पूरे प्रसंग में महिला श्रमिकों की चिंता लगभग नदारद है। वे महिलाएं जो मजदूरों के संग गोद में बच्चों को उठाए पैदल चलकर और कई समस्याएं झेलकर गांवों में अपनी ससुराल लौटी हैं और वे महिलाएं जो पहले से गांवों में थीं, दोनों के जीवन में नई त्रासदियां पैदा हो गई हैं।


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सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए मुफ्त राशन का प्रबंध किया है। इसके अलावा सरकार ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान नाम से एक अल्पकालीन रोजगार योजना शुरू की है, जिसमें प्रवासी मजदूरों को क्षमता और जरूरतों के अनुसार काम दिलाने का प्रबंध किया जा रहा है।

ऐसी ही एक योजना गांव-देहात लौटी उन महिलाओं के लिए भी हो, जिनके लिए गांवों में अब कोई आसरा नहीं बचा है। इन मजदूरों में वे महिलाएं भी हैं, जो घरों में आया (मेड) के रूप में या फिर कारखानों में होजरी जैसे पेशों में नौकरी और निर्माण स्थलों पर ईंट-बोझा उठाने आदि के काम करती रही हैं।

अनुमानत: दो करोड़ ऐसी महिलाओं ने भी इधर घर (ससुराल) वापसी की होगी। ध्यान रहे कि हमारे देश में पुरुषों के पोषणकर्ता होने की भूमिका को श्रमिक महिलाओं ने चुनौती दी है। पर इन महिलाओं की ससुराल-वापसी कई नए सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा करेगी, जिस पर न सरकार और न समाजशास्त्रियों की ही नजर है। ऐसी महिलाओं की शहर से ससुराल वापसी जो समस्याएं पैदा कर रही हैं, उनमें एक यह है कि क्या वे बिना आय वाले ग्रामीण जीवन से सामंजस्य बिठा पाएंगी।

शहरों में अपना अलग परिवार और कमाई करने का मौका ग्रामीण महिलाओं में भी जो आत्मविश्वास भरता है, वह गांव लौटते ही डगमगा जाता है। ध्यान रहे कि ये महिलाएं मायके नहीं, ससुराल लौटी हैं, जहां उनके लिए घरों में ही स्पेस खत्म हो चुका था, क्योंकि उन्होंने काफी पहले विवशता में ही सही, शहर-कूच का रास्ता चुना था। वापसी पर घर के किसी कोने में यदि जगह मिल भी जाए, तो गांव-देहात में उन्हें कोई ऐसा काम मिलना असंभव ही है, जिससे उन्हें आमदनी हो। 

शहरों में इन महिलाओं को कामकाज के अलावा सिर्फ अपने परिवार के भरण-पोषण का प्रबंध करना पड़ रहा था, पर गांव में उन्हें पूरे कुनबे और बड़े-बूढ़ों आदि सभी की सेवा बिना किसी दाम-दमड़ी की अपेक्षा के साथ करनी होगी। अशांति का एक छोर और है।

जो कभी शहर नहीं गईं, गांवों में ऐसी महिलाओं को अब अपनी उन रिश्तेदार महिलाओं के साथ संतुलन बिठाना होगा, जो लॉकडाउन के कारण लौटी हैं। उन्हें अपने घर में रहने को जगह देनी होगी और सम्मान भी, क्योंकि अगर घर लौटने वाली ये श्रमिक महिलाएं पारिवारिक ओहदे में बड़ी हुईं, तो ग्रामीण घरों की बहुओं पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे अपने परिवार के साथ इन मेहमानों के भोजन-पानी की व्यवस्था फिलहाल स्थायी प्रबंध के रूप में करें। ये बातें ग्रामीण जीवन में नई कलह का कारण बन सकती हैं।

सच यह है कि अब ग्रामीण और कस्बाई जीवन महिलाओं के लिए ज्यादा उपयुक्त नहीं रह गया है। पिछले एक-दो दशकों में गांव-कस्बों की लड़कियों में शहर जाकर पढ़ाई करने और कुछ बनने का जो जुनून सवार हुआ है, उसके पीछे यही तथ्य काम कर रहा है कि खेतों में बुवाई करने, मवेशियों की देखभाल करने और घर की चक्की में पिसते रहने से बेहतर है कि शहर का रास्ता पकड़ा जाए, जहां काम करने और एक आत्मनिर्भर जिंदगी जीने का कुछ तो मौका मिल सकता है। इसलिए शहर आकर घरों में मेड से लेकर ईंट-गारा ढोने और थोड़ा-बहुत पढ़ लिख गए तो दुकानों-शॉपिंग मॉल में सेल्स गर्ल तक का काम करके भी अपना जीवन धन्य मानती हैं।

सरकार ने लॉकडाउन के असर से ग्रामीण मजदूरों को राहत दिलाने के संबंध में जिस तरह कुछ योजनाएं बनाई हैं, उसी तरह यदि वह इन ग्रामीण महिलाओं की दुविधाओं और समस्याओं को भी ध्यान में रखकर कोई योजना लाती है, तो अच्छा होगा। उल्लेखनीय है कि देश के विकास में महिला योगदान की अब तक उपेक्षा ही हुई है। पर यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है, तो इससे देश के आर्थिक विकास का चक्का डगमगा सकता है। सरकारों और संस्थाओं को नहीं भूलना चाहिए कि हर किस्म के पलायन और विस्थापन की सबसे बड़ी मार महिलाओं पर ही पड़ती है।

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