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सरहद पर सख्ती की जरूरत

Mon, 01 Jan 2018 10:16 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Mon, 01 Jan 2018 10:16 AM IST
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The need for strictness on the border
भारतीय सेना

जब भी भारत पाकिस्तान की उपेक्षा करता है, या उसके साथ बातचीत नहीं करता है, तो पाकिस्तान को यह बहुत बुरा लगता है। उसकी हमेशा से कोशिश रही है कि हर फोरम पर उसे भारत के बराबर गिना जाए। लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने उसे अछूत बनाकर छोड़ दिया है, जिसका उसे बहुत दुख हो रहा है। इसलिए वह ऐसी-ऐसी चीजें करने की कोशिश कर रहा है कि भारत उसके दबाव में आए और फिर उसके साथ बातचीत प्रारंभ करे।


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नियंत्रण रेखा पर सत्तर साल से गोलाबारी चल रही है। नियंत्रण रेखा पर भारतीय सैनिकों की शहादत का बदला लेने के लिए छोटे-मोटे हमले तो पहले से होते रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद उड़ी हमले के बाद जो सर्जिकल स्ट्राइक हुई, या अभी सीमा पार जाकर जो हमला किया गया, वह अपने प्रभाव में काफी व्यापक है। सवाल यह है कि क्या नियंत्रण रेखा पर हालात और भी बिगड़ सकते हैं। मुझे तो ऐसा ही लगता है, क्योंकि पाकिस्तान सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि उसके तीन जवान मारे गए। जाहिर है, पाकिस्तान की सरकार पर अब वहां के लोगों का दबाव बढ़ेगा और वह फिर से नियंत्रण रेखा पर अपनी गतिविधि बढ़ाने की कोशिश करेगा। पाकिस्तान की यह भी कोशिश होगी कि वह इस बात को हवा दे कि भारत के हमले में बलूची जवान मारे गए। लेकिन वास्तविकता यह है कि वे बलूची जवान नहीं थे, क्योंकि बलूची रेजीमेंट में कोई बलूची जवान तैनात नहीं है।

पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने हाल ही में वहां की सरकार से कहा है कि वह भारत सरकार के साथ बातचीत आगे बढ़ाए। यह पाकिस्तान का ढोंग है, क्योंकि बातचीत में जब तक वहां के सेना प्रमुख आकर नहीं बैठेंगे, तब तक कोई सार्थक नतीजा नहीं निकलेगा। वहां की सेना जब तक बातचीत में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करेगी कि नियंत्रण रेखा पर वह संघर्ष विराम का उल्लंघन करती है, भारत के खिलाफ आतंकियों को प्रोत्साहित करती है और कुलभूषण जाधव जैसे लोगों को उसने नाजायज मामले में फंसा रखा है, तब तक पाकिस्तान से बातचीत करने का कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तान की नागरिक सरकार तो इतनी कमजोर हो गई है कि उसे सड़क पर से धरना खत्म करवाने के लिए कानून मंत्री को हटाना पड़ा। वहां की सुप्रीम कोर्ट ने सड़क पर से धरना हटवाने के लिए सरकार को आदेश दिया था। सरकार ने सेना को सड़क पर से लोगों को हटाने के लिए कहा, लेकिन सेना ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। इसलिए वहां की सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांग मानते हुए अपने कानून मंत्री को हटाना पड़ा। तो कहने का मतलब यह कि जिस देश की सरकार की बात वहां की सेना नहीं मानती है, उसकी बातों पर क्यों भरोसा किया जाए और उसके साथ बातचीत में सेना को क्यों नहीं शामिल किया जाए।

जहां तक कुलभूषण जाधव की मां और उनकी पत्नी को मिलने देने की बात है, तो यह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए था कि पाकिस्तान ने मानवीयता दिखाते हुए ऐसा कदम उठाया। जबकि हकीकत यह है कि कुलभूषण जाधव की मां और पत्नी को उनकी मातृभाषा में बात नहीं करने दिया गया। उनकी मां तो अंग्रेजी में बात ही नहीं कर सकती थी, तो फिर कैसी बात हुई होगी। इसके अलावा इन लोगों की बातचीत में इतने तरह के अवरोध खड़े किए गए, जिससे साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तान ने दुनिया की नजरों में अपनी बेहतर छवि बनाने के लिए यह ड्रामा किया।

इन सब चीजों को देखते हुए कहा जा सकता है कि पाकिस्तान भारत को नीचा दिखाने और अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए तरह-तरह के ढोंग कर रहा है। कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने साफ निर्देश दे रखा है कि उसकी अनुमति के बगैर जाधव को सजा नहीं दी जा सकती। इसलिए वह यह दिखाना चाहता है कि वह तो दोनों देशों के रिश्ते बेहतर बनाने की दिशा में प्रयत्नशील है, लेकिन भारत ही आगे बढ़ना नहीं चाहता। पिछले डेढ़-दो साल में एक बात तो स्पष्ट नजर आई है कि भारत का विदेश मंत्रालय पाकिस्तान और चीन के साथ बेहद होशियारी के साथ निपट रहा है। पहले पाकिस्तान जो भी रास्ते खोलता था, हम कूदकर उससे हाथ मिलाने के लिए खड़े हो जाते थे, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि हरेक चाल में भारत की भी अपनी एक चाल है। भारत के कूटनीतिक पाकिस्तान की हर चाल पर नजर रख रहे हैं और उसकी चाल के बाद हमें क्या करना है, उस पर भी आगे बढ़कर सोच रहे हैं।

अगर नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी जारी रहती है, तो भारत को इसी बहाने नियंत्रण रेखा पर पूरी ताकत के साथ पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे पाकिस्तान की हालत खराब हो जाए। अगर कुछ लोगों को यह आशंका हो कि दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने पर परमाणु हमले हो सकते हैं, तो यह केवल कहने की बातें हैं। अब तक जितने भी अंतरराष्ट्रीय सामरिक विश्लेषकों के अध्ययन सामने आए हैं, उसके अनुसार परमाणु हमले का जोखिम पाकिस्तान या भारत, कोई भी देश नहीं उठाना चाहेगा। अगर कुछ लोग यह भी सोचते हों कि पाकिस्तान के खिलाफ यदि हमने ज्यादा सख्ती बरती, तो अमेरिका नाराज हो जाएगा या उसे बचाने आ जाएगा, उन्हें भी यह ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिका के पास अभी इतनी फुरसत नहीं है कि वह बार-बार पाकिस्तान के मसले सुलझाए। दूसरे अपनी नई अफगान नीति में उसने पाकिस्तान को कड़ी फटकार लगाई ही है। अमेरिका ने तो दबाव बनाया हुआ ही है, भारत को भी दबाव बनाना चाहिए और पाक अधिकृत कश्मीर पीओके के अंदर आतंकी शिविरों पर ड्रोन से हमले करने चाहिए।

इसके अलावा बलूची नेता को भारत में रहकर पाकिस्तान के खिलाफ दुष्प्रचार करने की अनुमति देनी चाहिए। सिंधु नदी जल बंटवारे को भी अंतरराष्ट्रीय फोरम पर ले जाना चाहिए, ताकि पाकिस्तान पर और दबाव बने। इस तरह कई मोर्चों पर दबाव बनाने से ही पाकिस्तान सीधे रास्ते पर आ सकेगा।

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