फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The meaning of this peace deal with America, Mahendra Ved is telling from the point of view of history

अमेरिका के साथ इस शांति समझौते का मतलब, इतिहास की नजर से बता रहे हैं महेंद्र वेद

Mon, 24 Aug 2020 05:14 AM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Mon, 24 Aug 2020 05:14 AM IST
विज्ञापन
The meaning of this peace deal with America, Mahendra Ved is telling from the point of view of history
दोहा में अमेरिका के शांति दूत जल्मय खालिजाद और तालिबान नेता मुल्लाह अब्दुल गनी बारादर हाथ मिलाते - फोटो : PTI

अमेरिका द्वारा 13 अगस्त को शांति समझौते (जिसने पहले ही इस्राइल और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच संबंधों के 'पूर्ण सामान्यीकरण' की प्रक्रिया शुरू कर दी थी) की मध्यस्थता का स्वागत करते हुए भारत ने कहा है कि पश्चिम एशिया क्षेत्र उसका 'विस्तृत पड़ोसी' है।


loader

यह उस क्षेत्र में और उससे परे बदलती गतिशीलता का हिस्सा बनने की भारत की इच्छा को रेखांकित करता है। ऐसे वक्त में, जब सभी देश अपने-अपने हित में काम कर रहे हैं, तब भारत ने भी अपने फायदे के लिए कार्ड खेला है। बेशक इसका मतलब अतीत में विकसित हुए पुराने आदर्शों एवं सिद्धांतों का त्याग करना है।

इतिहास का पहिया बहुत क्रूरता से घूम रहा है। सच कहें, तो यह फलस्तीन की चिंताओं और पिछली शताब्दी की बहुचर्चित इंतिफादा (विद्रोह) को प्रभावी ढंग से खत्म करता है। यह एक नई वास्तविकता है। भारतीय प्रतिक्रिया निश्चित रूप से फलस्तीन मुद्दे को ध्यान में रखकर दी गई है, जिसका यह चैंपियन रहा है।

हालांकि, इसकी तीव्रता समय के साथ कम हो गई है, क्योंकि पिछली सदी के अंत में शीतयुद्ध समाप्त हो गया था। इसने दो राष्ट्र समाधान का समर्थन किया और इस्राइल व फलस्तीनियों को एक व्यापक शांति समझौते के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन हर किसी की तरह भारत भी जानता है कि यह धार्मिक उपदेश भर है।

भारत ने अतीत में जो किया, वही अब खाड़ी देश कर रहे हैं। वे धीरे-धीरे इस्राइल के साथ अपने संबंधों को सामान्य बना रहे हैं। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में इस्राइल के सैन्य नायक और लंबे समय तक रक्षा मंत्री रहे जनरल मोसे दायन ने चुपके से तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को फोन किया था। हालांकि इस्राइल को फिर से मान्यता देने की प्रक्रिया पीवी नरसिंह राव ने शुरू की थी।

इस शांति समझौते पर पूर्व भारतीय राजनयिक पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, 'इस क्षेत्र के साथ फिर से संबंध विकसित करने की संभावनाओं पर से कोहरा छंट गया है। इस्राइल, सऊदी अरब और यूएई के साथ रणनीतिक साझेदारी पश्चिम एशियाई क्षेत्र के साथ भारत के संबंधों का एक प्रमुख स्तंभ है। इस साझेदारी को मजबूत किया जाएगा।'

इस समझौते पर भारत की टिप्पणी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले सभी तीनों राष्ट्र मोदी सरकार के करीबी भागीदार बन गए हैं। भारत के इस्राइल और यूएई के साथ घनिष्ठ रणनीतिक संबंध हैं। इस्राइल सैन्य हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, तो अमीरात का भारत में काफी कुछ दांव पर लगा है तथा वहां तीस लाख भारतीय हैं, जिन्होंने उसकी अर्थव्यवस्था के निर्माण में मदद की है।

खाड़ी क्षेत्र के सबसे बड़े खिलाड़ी सऊदी अरब ने कम से कम फौरी तौर पर समझौते का विरोध किया है। भारत ने पिछले 15 वर्षों में अपने इस सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता के साथ करीबी संबंध बनाए हैं और उसने हाल में भारत की तेल रिफाइनरियों में बड़ी हिस्सेदारी की है।

इस्राइल-यूएई सौदे के प्रति सऊदी अरब का विरोध केवल तभी तक है, जब तक कि मोहम्मद बिन सलमान अपने बीमार पिता की पूरी जिम्मेदारी नहीं संभालते। शक्तिशाली राजकुमार सलमान डोनाल्ड ट्रंप के दामाद, जेयर्ड कुशनर के करीबी दोस्त और व्यवसायिक साझेदार हैं, जिसने इस सौदे में मध्यस्थता की है।

इस समझौते का तात्कालिक लाभ ट्रंप को मिल सकता है, जो दूसरी बार राष्ट्रपति बनना चाह रहे हैं। सऊदी राजकुमार और इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंन्यामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि ट्रंप जीतें। वाशिंगटन में चाहे कोई भी शासन करे, लेकिन पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्रभाव बहुत ज्यादा है।

राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जॉय बिडेन ने, जो ओबामा प्रशासन में उप-राष्ट्रपति रहे थे, समझौते का स्वागत करते हुए कहा है कि यह 'मध्य पूर्व के गहरे विभाजन को पाटने के लिए ऐतिहासिक कदम' है। ट्रंप को उम्मीद है कि इससे चुनाव में शक्तिशाली यहूदी वोट मजबूत होगा। वैसे, यहूदी वोट भारतीय-अमेरिकियों के वोट से ज्यादा हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के फरवरी दौरे में एकजुट करने की बात कही थी।

प्रमुख वैश्विक प्रवृत्ति के अनुसार सभी राष्ट्रवादी, जो सबसे योग्य और ताकतवर हैं, निरंतर संघर्षरत और विभाजित मुस्लिम जगत से बड़ा फायदा उठाना चाहते हैं। 'विश्वासघात' का रोना रोने के अलावा फलस्तीन के पास कुछ नहीं बचा है। फलस्तीनी नेतृत्व ने तुरंत इस समझौते की निंदा करते हुए इसे 'विश्वासघात' बताया और वहां के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने यूएई के राजदूत को तलब किया। सच कहें, तो फलस्तीन को एक ऐसी दुनिया से मदद नहीं मिल सकती है, जिसने शीतयुद्ध खत्म होने के बाद गुटनिरपेक्षता के अपने सिद्धांत को पीछे छोड़ दिया है। मुस्लिम जगत आने वाले दिनों में और भी विभाजन देख सकती है।

फलस्तीन की कीमत पर इस्राइल का निर्माण करने वाले पश्चिम ने वैश्विक प्रारूप में अपनी श्रेष्ठता और वर्चस्व को मजबूत किया है। ईरान एक अन्य कारक है, जो कई अरब देशों को इस्राइल के साथ खड़े होने को प्रेरित करता है। पश्चिम एशिया में समर्थन हासिल करने के लिए तेहरान के आक्रामक रवैये ने कई देशों को नाराज किया है। परमाणु बम बनाने के तेहरान के स्पष्ट निर्णय से खासकर सऊदी अरब में बड़ी चिंता पैदा हुई।

पाकिस्तान दुविधा की स्थिति में है, और उसकी दुविधा और बढ़ेगी, क्योंकि सऊदी अरब के साथ अपना संबंध बढ़ाने के लिए वह अधीर है, जबकि कश्मीर मुद्दे पर रियाद भारत पर आक्रामक नहीं होना चाहता। पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के कूटनीतिक धमाके के बाद सेना प्रमुख जनरल बाजवा की सऊदी यात्रा नुकसान की भरपाई करने में सक्षम नहीं हो सकी।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात, दोनों ने इस्लामिक सहयोग संगठन में कश्मीर मुद्दे पर चर्चा करने के पाकिस्तान के आग्रह की अनदेखी कर दी। कुल मिलाकर हर देश के अपने-अपने दांव हैं। जब कोई गतिरोध पैदा होता है, तब आम तौर पर मजबूत पक्ष बदलाव लाता है। इस राजनीतिक-सैनिक खेल में कोई नैतिकता और न्याय नहीं है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed