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नए पख्तून आंदोलन का उभार

Thu, 20 Dec 2018 06:49 PM IST
Raman Singh मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Published by: Raman Singh Updated Thu, 20 Dec 2018 06:49 PM IST
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The emergence of the new Pashtoon movement
पीटीएम

पाकिस्तान में इन दिनों कड़ाके की ठंड पड़ रही है। रात में तापमान बहुत गिर जाता है और सूर्य के जल्द अस्त होने से दिन छोटे होने लगे हैं। यह तो हुई प्राकृतिक मौसम की बात, लेकिन सियासी माहौल सामान्य रूप से गर्म है और पाकिस्तान एक बेहतर राजनीतिक और सुरक्षा वातावरण में जीने की कोशिश कर रहा है, जो उम्मीदें जगाता है।


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सिख समुदाय के लिए करतारपुर गलियारा खोलने की चर्चा इन दिनों जोरों पर है, लेकिन हालिया चर्चा स्थानीय पर्यटन को लेकर है, क्योंकि गुरुद्वारा होने के साथ ही यह कटास राज मंदिर की तरह विरासत स्थल भी है। एक बार वहां तक पहुंचने की सड़क बन जाएगी, तो विदेशी पर्यटक भी उसे अपने दर्शनीय स्थल की सूची में रखेंगे। पाकिस्तान में बहुत से लोग करतारपुर गुरुद्वारे के महत्व से वाकिफ नहीं थे, लेकिन जब उन्होंने समारोह में भारतीय सिखों को भावुक होते देखा, तो हैरान रह गए। इससे ज्यादा लोग पंजा साहिब गुरुद्वारा को जानते थे, जो हसन अब्दल में स्थित है, क्योंकि वहां दुनिया भर के सिख नियमित आते हैं।
 
दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीजों पर नियंत्रण करने के लिए सुरक्षा प्रतिष्ठान की कोशिश निरंतर जारी है, इससे मीडिया उलझन में है, अंतरराष्ट्रीय स्वैच्छिक संगठनों को पाकिस्तान के भीतर काम करने से हतोत्साहित किया गया है और जो लोग अपने सांविधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें देश छोड़ने से रोका जा रहा है तथा उन्हें एक्जिट कंट्रोल लिस्ट में रखा जा रहा है।

लेकिन सबसे बड़ी खबर दिवंगत खान अब्दुल गफ्फार खान (सीमांत गांधी) की पार्टी अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) से आई, जब पार्टी नेता और गफ्फार खान के पोते ने पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निष्काषित कर दिया। अस्फांदयार वली खान ने प्रतिष्ठित पख्तून नेता अफ्रासियाब खटक और बुशरा गोहर को कारण बताओ नोटिस जारी किया। पिछले कुछ समय से ये दोनों नेता सोशल मीडिया पर सक्रिय थे और एएनपी की आलोचना कर रहे थे, जो इन दिनों पख्तून की समस्याओं की अनदेखी कर रही थी, और जिसे पख्तून तहाफुज आंदोलन (पीटीएम) नामक एक नए आंदोलन ने सुर्खियों में ला दिया है। अफ्रासियाब खटक कहते हैं, 'राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बेशक एक राजनीतिक पार्टी से निकाला जा सकता है, लेकिन उन्हें राजनीति से नहीं निकाला जा सकता। हम दृढ़ता से उत्पीड़न, दमन और शोषण के सभी रूपों के खिलाफ संघर्ष जारी रखेंगे।'

हाल ही में सेना के प्रवक्ता ने पीटीएम को चेतवनी दी थी कि लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करें, क्योंकि आंदोलन लगातार मजबूत होता जा रहा है और इसके नेता मंजूर पश्तिन पूरे पाकिस्तान में लोगों के पास पहुंच रहे हैं। युद्ध और अत्याचार के खिलाफ पीटीएम का अहिंसक आंदोलन लगतार जारी है। उत्तरी वजीरिस्तान, जहां से पीटीएम का उभार हुआ है, पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ सैन्य अभियानों का गवाह रहा है। पाकिस्तान तालिबान कमजोर हो गए हैं और अब अफगानिस्तान में शरण लिए हुए हैं। जैसे ही इलाके में शांति वापस लौटी, पीटीएम ने शेष पाकिस्तान की तरह वहां के लोगों के सांविधानिक अधिकार की मांग शुरू कर दी, खासकर इसलिए कि वे दशकों से पीड़ित हैं।
 
पीटीआई सरकार कितनी असहिष्णु हो गई है, इसे जानने के लिए एक ट्वीट का उदाहरण देखना काफी होगा, जो एक वरिष्ठ पत्रकार ने की थी, जिसे हाल ही में एक न्यूज चैनल से निकाल दिया गया। वरिष्ठ पत्रकार मुर्तजा सोलांगी ने ट्वीट किया कि जब मंजूर पश्तिन कराची से क्वेटा लोगों से मिलने के लिए जाना चाहते थे, तो उन्हें हवाई अड्डे पर क्वेटा जाने से रोक दिया गया। वहां जिन लोगों के परिजन गायब हैं, उन्होंने एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। जिस दिन दुनिया मानवाधिकार दिवस मना रही थी, उसी दिन पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश क्वेटा में मौजूद थे। तत्काल सरकार ने ट्विटर प्रबंधन से पत्र लिखकर शिकायत की कि मुर्तजा सोलांगी का ट्वीट पाकिस्तान के कानून का उल्लंघन कर रहा है। उसके बाद सोलांगी को ट्विटर की तरफ से सरकार के रुख के बारे में एक पत्र लिखा गया, हालांकि सोलांगी के समर्थकों ने ट्वीट किया कि वह बस एक खबर थी, न कि कानून के खिलाफ कोई कदम।
 
पख्तूनों के सभी महत्वपूर्ण और अहम मुद्दों को पीटीएम उठा रहा है, 2018 के चुनाव में बुरी तरह हार का मुंह देखने वाली एएनपी के लिए अस्तित्व बचाना मुश्किल है। चुनाव के दौरान इमरान खान की पीटीआई ने एएनपी को कड़ी टक्कर दी, अस्फांदयार खान को अपनी सीट गंवानी पड़ी, जो हमेशा एएनपी के पास रहती थी। अब पार्टी को लगता है कि जब तक वह सत्ता प्रतिष्ठान को नाराज नहीं करेगी, तभी तक वह बच सकती है। अपने दो वरिष्ठ नेताओं को पार्टी ने इसलिए निकाल दिया, क्योंकि उन्होंने सत्ता के साथ सहज नहीं होने का संकेत दिया था।
 
यहां तक कि विदेश नीति के मामले में भी एएनपी और खटक व गोहर जैसे लोगों के बीच भारी मतभेद हैं। हाल ही में पाकिस्तान ने अफगान तालिबान को अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर लाया और अमेरिका से उम्मीद की कि वे काबुल सरकार से भी बात करेंगे। खटक ने इस कदम का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मुल्क में मजहबी चरमपंथ और आतंकवाद के उदय ने पाकिस्तान की आंतरिक एवं विदेश नीति को बुरी तरह पटरी से उतार दिया है। उन्होंने कहा, 'जो तालिबान को बातचीत की मेज पर लाने में पाकिस्तान की भूमिका पर चहक रहे हैं, वे इस तथ्य को नहीं देखते कि ऐसा करके पाकिस्तान ने औपचारिक रूप से तालिबान का संरक्षक बनने की भूमिका स्वीकार कर ली है, जो सबसे खतरनाक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क की मेजबानी के लिए जाने जाते हैं।'

क्या पीटीएम एक आंदोलन से उभर कर राजनीतिक पार्टी बनेगी? इसके बारे में अभी कुछ भी कहना मुश्किल है, लेकिन जब पांच वर्ष बाद अगला चुनाव होगा, तो उन्हें इसका फैसला करना होगा। फिलहाल खटक और गोहर लगातार पीटीएम का समर्थन करते रहेंगे, लेकिन जब यह आंदोलन एक राजनीतिक पार्टी बनेगी, तो निश्चित रूप से ये दोनों नेता उसका नेतृत्व करेंगें। 

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