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मुद्दा: हिंसक भाषा बोध के बीच सहिष्णुता की बात, लेकिन अराजक-उद्दंडियों को कौन समझाए
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विस्तार
आमची मराठी बोध को लेकर जारी सियासी खींचतान के बीच आए राज्यपाल के बयान को लेकर विवाद नहीं होता, तो आश्चर्य ही होता। मराठी स्वाभिमान के बहाने हिंदीभाषियों से हिंसा का समर्थक रही महाराष्ट्र नव निर्माण सेना यानी मनसे हो या फिर शिवसेना-उद्धव ठाकरे, दोनों के नेता राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन के विरोध में उतर आए हैं। कहा गया है कि राज्यपाल को मराठी स्वाभिमान और मराठी भाषा के अपमान में अंतर समझना चाहिए। महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन भले ही तमिलभाषी हों, लेकिन मराठी गौरवबोध के बहाने जारी भाषा विवाद में हस्तक्षेप करके उन्होंने एक तरह से अपने दायित्वबोध को ही जाहिर किया है।वह मानते रहे हैं कि राजनीति में अखिल भारतीय व्याप्ति के लिए हिंदी का सहयोग जरूरी है। 1968 में तमिलनाडु में हिंदी को राजभाषा बनाने के खिलाफ हिंसक आंदोलन हो चुका है। राधाकृष्णन ने उस आंदोलन की हिंसक तपिश महसूस की है। फिर भी, हिंदी सीखना उनकी चाहत रही है। हिंदी विरोध की आंच में पली-बढ़ी तमिलनाडु की एक पूरी पीढ़ी आपसी बातचीत में मानती है कि उसने क्या खोया है। वह मानती है कि अगर हिंदी विरोध की आंच से झुलसने का उसे अंदाजा होता, तो हिंदी के विरोध में वह अपनी जिंदगी और अपने सपनों को होम नहीं करती। राज्यपाल ने सिर्फ यह कहा है कि किसी को पीटने के बाद क्या वह तत्काल मराठी बोलने लगेगा। निश्चित तौर पर इसका जवाब न में है।
सीपी राधाकृष्णन 1998 और 1999 में लगातार दो बार कोयंबटूर से चुने गए थे। उन दिनों वह तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष भी रहे। उसी दौर की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा है कि एक बार वह तमिलनाडु में कहीं जा रहे थे, तो तमिल न बोलने के चलते स्थानीय भाषा आंदोलनकारी कुछ हिंदी भाषी लोगों को पीट रहे थे। इसके लिए उन्होंने हिंदीभाषियों से माफी मांगी और तमिल बोलने की जिद करने वाले लोगों से कहा था कि क्या उनके हाथों पिट जाने के बाद कोई तत्काल तमिल बोल पाएगा। भारत की हर भाषा और उसे बोलने वालों का सम्मान हो, इस सोच को बढ़ावा देने की जरूरत है। भारत की भाषाएं आपस में बहनें हैं। इनके बहनापे को बढ़ावा देने की जरूरत है।
बहुभाषी भारत में कहावत है कि कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी, यानी कुछ ही दूरी पर भाषा का स्वरूप बदल जाता है। लेकिन क्या व्यक्ति इसका व्यवहार करना छोड़ देता है, क्या कुछ दूरी पर बदली भाषा से वह घृणा करने लगता है। भाषाओं की दुनिया किसी राष्ट्र की चौहद्दी नहीं है कि बाड़ लगाकर उन्हें रोक दिया जाएगा, भाषाओं का समाज नदी के पाट की तरह भी नहीं है कि उनके किनारों को बांध बनाकर रोक दिया जाएगा और उसके पानी को नियंत्रित कर लिया जाएगा। दरअसल, भाषाएं नदी के प्रवाह की तरह हैं। जिस तरह हर नदी का अपना प्रवाह है, उसके प्रवाह की अपनी ध्वनि है, कुछ ऐसा ही हाल हर भाषा का है। राज्यपाल के बयान का मकसद भाषाओं की दुनिया की इसी खूबसूरती और उनके गौरवबोध से लोगों का परिचय कराना है। महाराष्ट्र में मराठी बोली जाए या तमिलनाडु में तमिल का व्यवहार बाकी भाषाओं की तुलना में बेहतर हो, इससे भला किसी को क्यों इन्कार होगा। लेकिन मराठी और तमिल को बेहतर बताने और हिंदी या अन्य दूसरी भाषा को कमतर बताने की सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अपनी भाषा के कथित गौरवबोध के नाम पर हिंसा का सहारा लेना कतई उचित नहीं है। ऐसा करना एक तरह से कानून-व्यवस्था का मामला बन जाता है। ऐसे में राज्यपाल का यह कहना उचित ही है कि कानून-व्यवस्था ठीक नहीं रहेगी, तो निवेशक राज्य में आने से बचेंगे, निवेश घटेगा तो राज्य में उत्पादक इकाइयां कम होंगी, इससे रोजगार घटेगा और राज्य का राजस्व भी। भाषा की राजनीति को इन तथ्यों को भी समझना होगा। उसे देखना होगा कि भाषा के प्रति प्यार अराजकता का जरिया न बने। भाषा को लेकर आक्रामक राजनीति करने वालों को सोचना चाहिए कि अगर हर भाषा-भाषी अराजक ढंग से अपने भाषाई गौरवबोध को उभारने और उसे अभिव्यक्ति देने लगे, तो क्या होगा? अराजकता का तीव्र विस्फोट होगा और उससे अंतत: राष्ट्र की नींव में सुराख हो जाएंगे, जिसकी बुनियाद पर राष्ट्र का खड़े रह पाना कठिन होगा।
राज्यपाल ने ठीक ही कहा है कि हमें ज्यादा से ज्यादा भाषाएं सीखनी चाहिए, अपनी मातृभाषा पर गर्व भी करना चाहिए। भाषा के नाम पर अराजक होने के बजाय जरूरत इस बात की है कि हम एक-दूसरे की भाषा ही नहीं, उसके समूचे अस्तित्व के प्रति सहिष्णु होें। तुच्छ व तात्कालिक राजनीतिक फायदे के लिए भाषा के नाम पर सहिष्णुता का यह पुल एक बार टूटा, तो उसे फिर से स्थापित कर पाना बेहद कठिन होगा। महाराष्ट्र के राज्यपाल के बयान को इन्हीं संदर्भों में देखा, परखा और समझा जाना चाहिए।