जीवन धारा: स्वयं का भान होते ही संघर्ष समाप्त... दिल की सुनें, अपनी राय भी दूसरों के विचारों का ही अंश...
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विस्तार
खोजबीन की जिस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं, उस ओर हमें कुछ और आगे जाना है। संभव है, यह थोड़ा जटिल और सूक्ष्म है। जब मैं आपके बारे में या किसी भी चीज के बारे में एक प्रतिमा बना लेता हूं, तो मैं उस प्रतिमा को देख सकता हूं। इस तरह एक ओर यह प्रतिमा है और दूसरी तरफ इसको देखने वाला यानी इसका द्रष्टा। मान लीजिए, मैं किसी व्यक्ति को लाल कमीज पहने देखता हूं और मेरी तत्काल प्रतिक्रिया होती है कि यह मुझे पसंद है या यह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। तो मेरी यह पसंद या नापसंदगी जिन चीजों का नतीजा है वह है मेरी संस्कृति, मेरी शिक्षा-दीक्षा, मेरी संगति, मेरे संबंध, मेरा झुकाव, मेरे अर्जित तथा वंशानुगत लक्षण। इनके जोड़ से बने केंद्र से ही देखता हूं तथा अपना निर्णय बनाता हूं। इस तरह द्रष्टा जिस चीज को भी देखता है, उससे अपने को अलग कर लेता है।
द्रष्टा अपने भीतर एक नहीं हजारों प्रतिमाओं को देखता है, जो सबकी-सब वस्तुत: उसी की कृतियां हैं। द्रष्टा एक स्थिर और जड़ वस्तु नहीं है। वह जो कुछ है, उसमें सदा कुछ-न-कुछ जोड़ता और घटाता रहता है। यह जीवित द्रष्टा अपने भीतर और बाहरी जगत के दबाव के कारण हर समय विभिन्न चीजों के बीच तुलना कर रहा है, उनकी नाप-तौल कर रहा है, उन पर अपनी धारणा और राय बना रहा है, उनमें हेर-फेर और बदलाव ला रहा है। यह द्रष्टा चेतना के उस जगत में जी रहा है, जिसका निर्माण उसके अपने प्रभाव, ज्ञान और असंख्य लेखों-जोखों से हुआ है। अगर आप कभी इस द्रष्टा पर दृष्टि डालें-द्रष्टा यानी जो आप स्वयं हैं-तो आप पाएंगे कि यह अनेक स्मृतियों, अनुभवों, प्रभावों, परंपराओं और अनंत प्रकार के दुखों से मिलकर बना है, जो सबके सब अतीत के हैं। यह द्रष्टा अतीत और वर्तमान दोनों है, और आनेवाले जिस कल की यह प्रतीक्षा कर रहा है, वह भी इसी का हिस्सा है। इस तरह द्रष्टा पेड़ के उस पत्ते के समान है, जिसका आधा भाग हरा है और आधा भाग पीला पड़ चुका है।
अर्थात द्रष्टा में जीवन और मृत्यु दोनों मौजूद हैं और इन्हीं के सहारे वह देखता है, तो समय के आयाम में स्थित चेतना और मन की इसी दशा में द्रष्टा यानी ‘आप’ भय को, ईष्या को, युद्ध को, अपने परिवार को देखते हैं और इनसे उत्पन्न समस्या को हल करने की कोशिश करते हैं, जो हर बार आपके सामने एक ‘नई’ चुनौती के रूप में आती है। लेकिन जो भी नया है, उसका सीधा सामना करने के बदले आप उसे पहले पुराने सांचे में ढालने की चेष्टा करते हैं, इसलिए आप हमेशा संघर्ष में जीते हैं। द्रष्टा ही दृश्य है-अगर यह बोध द्रष्टा को अभी नहीं हुआ है, तो उसकी ओर से की गई कोई भी गतिविधि प्रतिमाओं की एक नई शृंखला को ही जन्म देगी और इसमें पुन: वह उलझ जाएगा। लेकिन जब द्रष्टा समझ लेता है कि जिस चीज पर उसकी सारी शक्ति कार्य कर रही है, वह चीज तो वह स्वयं है, तो तत्काल द्रष्टा और प्रतिमा के बीच संघर्ष समाप्त हो जाता है। और उसकी पसंद-नापसंदगी विदा हो जाती है और इस तरह सारा तनाव और संघर्ष भी समाप्त हो जाता है।
सूत्र- दिल की सुनें
हम सभी को कुछ-न-कुछ कहना है, लेकिन हम अक्सर जो राय बनाते हैं, हमें लगता है कि वे हमारे विचार हैं, लेकिन ध्यान से देखें तो वह दूसरों के विचारों का ही अंश है। हम अपने ही विचारों को पहचानने में भूल करते हैं। अपनी राय को उभारने के लिए जरूरी है कि हमेशा दिल की सुनें और दयालु बनें।