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पाकिस्तान : इमरान पर मेहरबान, न्याय के सर्वोच्च मंदिर में बजीं सवालों की घंटियां

Sat, 01 Apr 2023 06:37 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Sat, 01 Apr 2023 06:37 AM IST
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सार
इमरान खान के खिलाफ कई मजबूत मामले हैं, जिनमें उन्हें आसानी से अयोग्य घोषित किया जा सकता है, लेकिन पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका उनके प्रति नरम है। वास्तव में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश खुद सवालों के घेरे में हैं, जिनकी आलोचना उनके साथी जजों ने भी की है।
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Strong cases against Imran Khan he can be easily disqualified, but Pakistan Supreme Judiciary soft on him
इमरान खान। - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पाकिस्तान में अब भी अखबार व्यापक रूप से पढ़े जाते हैं, न केवल अंग्रेजी भाषा में, बल्कि अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी और उन सबके बीच सबसे प्रगतिशील और गतिशील अखबार पाकिस्तान के सुदूर दक्षिणी प्रांत सिंध से सिंधी भाषा में प्रकाशित होता है। लेकिन जैसे-जैसे अखबार की कीमत बढ़ती जा रही है, और ई-पेपर हर जगह उपलब्ध होते जा रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं कि पाठक उन्हें ऑनलाइन पढ़ रहे हैं और सबसे लोकप्रिय रूप मोबाइल पर भी, क्योंकि अब बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों के हाथ में इसे देखा जा सकता है। लेकिन यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि पाकिस्तान में साक्षरता दर बहुत कम है और अखबारों की तुलना में लोग समाचार के लिए टेलीविजन अधिक देखते हैं, जिसके दर्शक साक्षर न होते हुए भी समाचारों को देख-सुन और समझ सकते हैं। छोटे गांवों में भी टेलीविजन सेट में एक छोटा सौर पैनल जुड़ा हुआ देखना आम बात है।



भारत में हाल ही में राजनीतिक क्षितिज पर जो कुछ घटा उसी के कारण मैं अखबार जैसे नीरस विषय से इस लेख की शुरुआत कर रही हूं। समाचार उद्योग, चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या ऑनलाइन ब्रेकिंग न्यूज परोसने वाला, फिर भी पाकिस्तानी अखबारों की सुर्खियों ने हाल में अधिकांश पाठकों को चौंका दिया। यहां के कई अखबारों में यह सुर्खियां थीं कि भारत के मुख्य विपक्षी दल के 52 वर्षीय नेता राहुल गांधी को एक अदालत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई टिप्पणियों के लिए मानहानि का दोषी ठहराया और संसद की मौजूदा सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया। यदि यह किसी दूसरे देश में हुआ होता, तो कोई हैरानी नहीं होती, लेकिन हमारे पूर्वी पड़ोसी देश भारत से ऐसी खबर आना अप्रत्याशित था।


संसद के दो जीवंत सदनों वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने विपक्ष के नेता को अयोग्य घोषित कर दिया था, यह अविश्वसनीय था। जिस किसी से भी मैंने बात की, सबने हैरानी जताई, खासकर इसलिए कि पाकिस्तान के मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी मुख्य विपक्षी दल तहरीक-ए इंसाफ के नेता इमरान खान को राजनीति में भाग लेने से अयोग्य घोषित करने का प्रयास किया था और यदि वह अयोग्य घोषित हो जाते, तो आगामी चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकते थे। इमरान खान ने पहले ही संसद से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि इमरान खान के खिलाफ कई मजबूत मामले हैं, जिनमें उन्हें आसानी से अयोग्य घोषित किया जा सकता है, जैसा कि पाकिस्तान में अतीत में पैटर्न रहा है, लेकिन पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका उनके प्रति नरम है और पीटीआई नेता को हर अदालत में पेशी से जमानत मिलती रही है। राहुल गांधी और इमरान खान के मामले जहां यह दिखाते हैं कि विपक्षी नेताओं को अयोग्य घोषित करके राजनीति से बाहर किया जा सकता है। यह दर्शाता है कि दक्षिण एशियाई देशों की सरकारें कैसे राजनीतिक संकटों को हल करने के लिए 'अकल्पनीय समाधान' लेकर आती हैं।

वास्तव में पाकिस्तान की अदालतें भी हर सुबह सुर्खियों में रहती हैं और हर कोई यह सवाल पूछ रहा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश उमर अता बांदियाल इस्तीफा देंगे, क्योंकि उनके अपने साथी न्यायाधीशों ने एक लिखित बयान में न्यायिक कार्यवाही के संचालन के उनके तरीके की आलोचना की है? एक तो यह कि वह लगातार स्वत: संज्ञान लेकर न्यायपालिका का राजनीतिकरण करना चाहते हैं। उनके अपने न्यायाधीशों की दूसरी आलोचना यह है कि वह विभिन्न पीठों में चुन-चुनकर जज रखते हैं और विशेष पीठ के लिए स्वतंत्र दिमाग वाले न्यायाधीशों को नियुक्त करते हैं, जिसे वह स्वयं किसी राजनीतिक मामले की सुनवाई के लिए गठित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जिन दो वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपनी असहमति सार्वजनिक की है, वे हैं जस्टिस मंसूर अली शाह और जमाल मंडोखैल। सुप्रीम कोर्ट के साथी न्यायाधीशों की असहमति की भाषा इतनी कठोर थी कि उन्होंने चौंकाने वाली सुर्खियां बटोरीं। जैसा कि एक पर्यवेक्षक ने बताया, ढहती लोकतांत्रिक प्रक्रिया और बढ़ते राजनीतिक टकराव ने अदालत को दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के लिए युद्ध का मैदान बना दिया है।

उन दो असहमत न्यायधीशों ने अपने बयान में कहा कि 'हमें 'वन-मैन शो' की ताकत पर दोबारा गौर करना होगा! जब जजों की सनक और सुविधा हावी हो जाती है, तो हम शाही सुप्रीम कोर्ट के युग में प्रवेश कर जाते हैं। जब एक व्यक्ति के पास बहुत अधिक शक्ति हो, तो न्यायालय एक व्यक्ति के अकेले निर्णय पर निर्भर नहीं रह सकता है। इससे संस्था निरंकुश हो सकती है।'

शाहबाज शरीफ सरकार, जो प्रधान न्यायाधीश के निरंतर स्वत: संज्ञान से परेशान थी, असंतुष्ट न्यायाधीशों की मांगों से काफी खुश दिखाई दी और तुरंत एक कैबिनेट बैठक बुलाकर संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में एक विधेयक पेश किया, जिसमें प्रधान न्यायाधीश के पंख कतरने की बात है। नेशनल असेंबली में न्यायपालिका पर गुस्सा उबल पड़ा और कहा गया कि यह राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रही है।

मौजूदा सरकार आम चुनावों को इस साल अक्तूबर तक टालना चाह रही है और मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी इससे सहमति जताते हुए कहा है कि मुल्क में बहुत बड़ा वित्तीय संकट है, आतंकवाद का भारी खतरा है, जो देश भर में चुनाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की अनुमति नहीं देता। लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त से सवाल पूछा, जिससे असंतुष्ट न्यायाधीशों ने सख्त असहमति जताई।

अब पूरे देश भर से मांग उठ रही है और पाकिस्तान बार काउंसिल ने भी मांग की है कि आम चुनाव कराने के मामले की सुनवाई एक पूर्ण पीठ करे। जैसा कि एक राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, 'इन सबने सर्वोच्च न्यायपालिका की छवि को धूमिल किया है और न्यायिक प्रक्रिया में जनता के भरोसे और विश्वास को नुकसान पहुंचाया है। व्यवस्था में सुधार के लिए संस्थान के भीतर से आलोचना को चेतावनी समझनी चाहिए। कानूनी व्यवस्था में विश्वास बहाल करने के लिए दो न्यायाधीशों द्वारा उजागर की गई अराजकता और प्रणाली के भीतर की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।' 

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