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बदलाव के लिए सामाजिक चेतना चाहिए: आजादी के 75 साल बाद भी धार्मिक क्रियाकलाप... समाज वहीं 150 साल पीछे खड़ा...

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Tue, 09 Sep 2025 01:29 AM IST
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सार
इटावा के कथा प्रकरण से तो यही लगता है कि आजादी के 75 साल बाद भी धार्मिक क्रियाकलापों की दृष्टि से समाज वहीं डेढ़ सौ साल पीछे खड़ा है।
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Social consciousness vital for change Religious acts after 75 years of independence Society 150 years behind
इटावा प्रकरण में जमकर हुआ बवाल - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

विगत जून माह में इटावा के दादरपुर गांव में हुए कथा प्रकरण की अनुगूंजें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। यथार्थ यह है कि भारतीय समाज में पेशों को लेकर कोई स्वतंत्रता मूलक व्यवस्था व्यवहृत नहीं हो सकी है। कथा, व्यथा के पीछे राजतंत्र की सामाजिक जड़ता बड़ी समस्या है। स्वभाव और संस्कारों में समय सापेक्ष गत्यात्मकता नहीं है। नगरीय जीवन की अपेक्षा ग्रामीण जीवन ठहर सा गया है। यद्यपि संविधान ने पेशे की पाबंदियों से नागरिकों को आजाद कर दिया है। 



सेवा संस्कार किसी जाति की बपौती नहीं हैं, कोई भी पेशा योग्यता और क्षमता के अधीन है, तदनुसार किसी भी नागरिक को कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता है। वंशानुगत आधार मानकर एक बार महात्मा गांधी ने परामर्श दिया था कि व्यक्ति को माता-पिता के पैतृक पेशे को अपनाना चाहिए। इससे उसे विरासत के अनुभव का लाभ मिलेगा। परंतु डॉ. बीआर आंबेडकर को लगा, पेशों के भेदभाव के साथ जातिगत भेदभाव की जड़ें भी पुष्ट होती रहेंगी, और स्वतंत्रता सापेक्ष समतामूलक समाज निर्माण का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। 


कथा-वाचन का पेशा परंपरा से एक जाति विशेष तक सीमित होने के कारण उत्तर प्रदेश के इटावा क्षेत्र में दो यादवों द्वारा कथा-वाचन करने पर कथा-वाचक ब्राह्मणों गैर-यादव व उनके समर्थकों की प्रतिक्रिया गंभीर थी। 

कथा वाचकों को लगा यह उनके पेशे का उनका एकाधिकार उनसे छीना जा रहा है। पेशों की यह पेचीदगी सामंती युग की याद दिलाती है। घटनाएं हमें अतीत में ले जाती हैं। डेढ़ सौ साल पहले जब ज्योतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज के तहत शूद्रों के विवाह, कथा आदि पढ़ने के अनुष्ठानों को ब्राह्मणों द्वारा बहिष्कार किए जाने पर पढ़े-लिखे शूद्रों से पंडिताई का पेशा कराना आरंभ किया, तो ब्राह्मणों ने ब्रिटिश अधिकारियों से शिकायत की, कि हमें दान दक्षिणा से होने वाली आय समाप्त हो गई है। हमसे पूजा कराएं, न कराएं दान हमें दिलाइए। 

लगता है आजादी के 75 साल बाद भी धार्मिक सांस्कृतिक क्रियाकलापों की दृष्टि से समाज वहीं डेढ़ सौ साल पीछे खड़ा है। स्वतंत्रता के समानता मूलक व्यवहार जाति भेद के अभ्यस्त लोग युगीन मूल्यों को आत्मसात ही नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि शूद्रों के साथ ही ऐसा होता है। खुद शूद्र दलितों का अपमान करते हैं। 2017 में जब सपा की सरकार थी। दलित उत्पीड़न का ग्राफ बढ़ गया था। हाल यह है कि राजनीतिक लोकतंत्र सामाजिक लोकतंत्र की जमीन पर उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। दरअसल, उपेक्षित, दलित और कथित नीची जातियों की सरकारों ने भी पहचान की वास्तविक चेतना का विस्तार नहीं किया।

इस घटना से सामाजिक सुधार आंदोलन की अहमियत का पता चलता है। संविधान प्रदत्त व्यक्ति की गरिमा कानूनी दबाव से अमल में स्थायी रूप नहीं पा सकती। व्यक्तियों के स्वाभिमान और संस्कारों में आधुनिक और सभ्य बनाने की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। ‘जाति तोड़ो’, ‘समाज जोड़ो’ रोटी बंदी बेटी बंदी जैसे नारे निर्जीव कैसे हो रहे हैं? 

उत्तर प्रदेश में जातियों का यह रूप चिंताजनक इसलिए भी है कि यहां दलितों-पिछड़ों की सरकारें पिछले तीन दशक तक रही हैं। तो जाहिर है राजनीति में उनकी जो भी हैसियत बनती रही हो, सामाजिक नजरिये में वह बदलाव नहीं आया है। यह एकमात्र घटना नहीं है। अन्य रूपों में भी जाति अपमान की घटनाएं प्रकट हो रही हैं। मसलन, जब यह टिप्पणी लिखी जा रही है बरात चढ़ने से रोकना, प्रेम विवाह पर पिटाई और बहिष्कार आम खबरें हैं। जब तक सामाजिक चेतना का विस्तार नहीं होता, वास्तविक लक्ष्य को पाना मुश्किल है।    

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष और सीनियर प्रोफेसर हैं)

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