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अधिक संवेदनशील होना जरूरी: सैन्य कर्मियों की सेहत और खुशी सरकार के साथ समाज की भी जवाबदेही, कई मुद्दे अनसुलझे
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पंजाब से लगती पाक सीमा पर तैनात महिला प्रहरी। (फाइल)
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संवाद
विस्तार
जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों में पिछले छह महीने के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में कार्यरत व सेवानिवृत्त कई कार्मिकों से मिलने का मौका मिला। इनमें पंजाब, हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक समेत देश के अन्य हिस्सों के वीर व उनके सम्मानित परिजन शामिल थे। इनसे मिलते वक्त मन में कई सवाल थे। मसलन, देश के लिए जीने-बलिदान होने का जज्बा लेकर डटे इन वीरों और उनके परिजन में सेवा को लेकर संतुष्टि का स्तर क्या है? ये सरकार को लेकर क्या सोचते हैं? जम्मू-कश्मीर में कितना बदलाव नजर आता है? लेकिन, सबसे बड़ी जिज्ञासा मन में यह थी कि सेवा में रहते हुए बल छोड़ने वाले कार्मिकों की संख्या बढ़ क्यों रही है?
इस जिज्ञासा की बड़ी वजह थी एक रिपोर्ट, जिसके मुताबिक, वर्ष 2020 से 2024 तक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों, राष्ट्रीय सुरक्षा गारद (एनएसजी) व असम राइफल्स (एआर) के 55 हजार से ज्यादा कार्मिकों ने नौकरी छोड़ दी है। इनमें 47,891 ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली, जबकि 7,664 ने त्यागपत्र दे दिया।
पहली बात, सशस्त्र बलों व उनके परिवारों में कई अपेक्षाओं व उलाहनों के बावजूद सरकारों के प्रति सकारात्मक भाव बढ़ा है। बल के कार्मिकों से लेकर परिजन तक यह मानते हैं कि उनसे जुड़े मुद्दों पर पहले से बेहतर सुनवाई शुरू हुई है। पिछले कुछ वर्षों में उनके निजी हितों की ओर भी सरकार संवेदनशील हुई है। अगर वे अपने पारिवारिक विवाद, जमीन-जायदाद, सामाजिक मुद्दों को अपने गृह जिले व क्षेत्र में उठाते हैं, तो स्थानीय प्रशासन उस पर तत्परता से ध्यान देने लगा है। आम लोगों के बीच भी सम्मान का भाव बढ़ा है। ‘भारत के वीर ट्रस्ट’ बनने से वीरगति को प्राप्त कार्मिकों के निकट संबंधियों को सहायता मिलनी सहज हुई है।
दूसरी अहम बात, वीरगति के बाद परिवार व सेवानिवृत्ति के बाद भविष्य की चिंता से जुड़ी है। इनमें सेवा संबंधी लाभ, सुविधाएं, सेहत व उनकी मनोदशा जैसे विषय सबसे ऊपर हैं। इनमें टीस है कि दंगा, बवाल से लेकर सीमा व नक्सल प्रभावित उच्चतम संवेदनशील क्षेत्रों में अग्रिम मोर्चों पर वे तैनात होते हैं। पुलवामा व दंतेवाड़ा जैसा बलिदान देते हैं। लेकिन, सेना के समान सम्मान व सुविधाएं अब तक नहीं मिल पा रही हैं। इनमें पेंशन लाभ, कैंटीन से जुड़ी विसंगति, बच्चों की शिक्षा में आरक्षण, बल की भर्तियों में रक्त संबंधियों को रियायत से लेकर शहीद का दर्जा देने जैसे कई मुद्दे शामिल हैं।
परिजन में टीस है कि बल में शामिल उनके घर का प्रिय सदस्य परिवार की आवश्यकता के ज्यादातर अवसरों पर उपलब्ध नहीं हो पाता है। बलों में कार्यरत कार्मिकों के बच्चे चाहते हैं कि दूसरे बच्चों के मां-बाप की तरह उनके माता-पिता भी जन्मदिन व मैरिज एनिवर्सरी जैसे जीवंत पलों पर उनके साथ हों। घर में बुजुर्ग चाहते हैं कि वर्ष में उनके बेटे/बेटी का जन्मदिन, तो कम से कम उनकी आंखों के सामने मनाया जाए। घर में कोई महत्वपूर्ण अवसर हो, तो वे भी शामिल हों। लेकिन, अक्सर होता है कि बल के कार्मिक इन अनमोल पलों का भी हिस्सा नहीं बन पाते। परिवार से दूर बलों के कई कार्मिक और उनके परिजन इन खास मौकों पर अनुपस्थिति को सह नहीं पाते हैं। बल से वापसी का यह भी एक बड़ा कारण बनता जा रहा है।
इसी तरह कार्मिकों की सेहत व उनकी मनोदशा परिवारों में चिंता का विषय बन रही है। परिजन कहते हैं कि अर्धसैनिक बलों में सेवा के अवसर को कार्मिक के निरोगी और बलवान होने की निशानी के तौर पर लिया जाता था। लेकिन, इधर बीमारी या अवसाद से जान गंवाने वाले कार्मिकों की संख्या बढ़ी है। खास मौकों पर भी छुट्टी मिलने में कठिनाई अलग-अलग पृष्ठभूमि व समझ वाले परिवारों में कई बार कलह और विवाद की वजह बन जाती है, जो जान गंवाने तक पहुंच जाती है। सरकारी आंकड़े परिवारों की इस चिंता की तस्दीक करते हैं।
वर्ष 2019 में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कार्यरत सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के 84 कार्मिकों की मौत हार्ट अटैक या अन्य बीमारियों से हुई थी। यह संख्या अब हर साल 100 पार कर रही है। इसी तरह हर वर्ष 100 से ज्यादा कार्मिक आत्महत्या कर रहे हैं। चिंता वाली बात है कि अगस्त 2024 में लोकसभा में प्रश्नोत्तर में दिए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से 2023 तक अर्धसैनिक बलों के 577 जवानों की हार्ट अटैक या अन्य बीमारियों से मृत्यु हुई। वहीं, गत वर्ष चार दिसंबर को राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2020 से 2024 के बीच 730 कार्मिकों ने खुदकुशी की। ये आंकड़े विचलित करने वाले हैं। ऐसे में देश के केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के कार्मिकों और इनके परिवार को स्वस्थ व प्रसन्न रखना सरकार व समाज की बड़ी जिम्मेदारी है। इस ओर हमें और अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है।