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नजरिया: अग्रणी बनने की आकांक्षाओं के बीच भारत में एससीओ बैठक का मतलब

Thu, 04 May 2023 06:55 AM IST
K S Tomar केएस तोमर
Updated Thu, 04 May 2023 06:55 AM IST
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सार
चीन और पाकिस्तान पर अंकुश लगाने के अलावा, एशिया में अग्रणी भूमिका निभाने की भारत की आकांक्षा एससीओ के माध्यम से संभव हो सकती है, जिसकी एक बैठक आज गोवा में शुरू हो रही है।
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SCO meeting in India amid aspirations to become world leader pm modi s jaishankar
शंघाई सहयोग संगठन - फोटो : Social Media

विस्तार

मौजूदा यूक्रेन युद्ध में युद्धविराम या समाधान की जरा भी उम्मीद न होने की पृष्ठभूमि में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की दो दिवसीय बैठक आज से गोवा में शुरू हो रही है, जिसमें सदस्य देशों को सुरक्षा मुद्दे जैसे क्षेत्रीय अखंडता के लिए आपसी सम्मान, वैश्विक खाद्य और सुरक्षा मुद्दे से निपटने के लिए समन्वित प्रयासों पर विचार करने की कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो प्रत्येक सदस्य देश की संप्रभुता को बनाए रखने की खातिर संघर्षों को टालने के लिए सख्त जरूरी है।



भारत के नजरिये से पाकिस्तान के विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो की बैठक में उपस्थिति की पुष्टि सकारात्मक कदम है और यह घटना 2011 से आपस में न मिलने वाले दो सदस्य देशों के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने का काम कर सकती है। विदेश नीति विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान के रवैये में बदलाव के पीछे चीन का हाथ प्रतीत हो रहा है, क्योंकि चीन और रूस एससीओ के संस्थापक सदस्य हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के मुताबिक, हाल के वर्षों के घटनाक्रम के कारण वैश्विक सुरक्षा को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें लगता है कि एससीओ क्षेत्र भी इन चुनौतियों से प्रभावित है और एससीओ चार्टर सदस्य देशों से संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए परस्पर सम्मान का आह्वान करता है। यदि योजना के अनुसार सब कुछ ठीक रहा, तो पाक विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो की यात्रा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की भावी दिल्ली यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर सकती है, क्योंकि उन्हें निमंत्रण दिया गया था, जिसका जवाब नहीं आया है।


एससीओ एक यूरेशियाई राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संगठन है, जिसका गठन 18 जून, 2001 को किया गया था और जो सदस्य देशों के बीच आपसी विश्वास को मजबूत करता है। इसका उद्देश्य व्यापार, राजनीति, शोध, अर्थव्यवस्था, तकनीक, शिक्षा, परिवहन, ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण, संस्कृति आदि को बढ़ावा देना है।

एससीओ बैठक की तैयारी एक बोझिल कवायद है, जिसमें रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों और पर्यावरण मंत्रियों जैसे नौ देशों के अन्य मंत्रिस्तरीय प्रमुख भी व्यापक चर्चा करेंगे, जो एससीओ सम्मेलन के एजेंडे को अंतिम रूप देने के लिए मार्च, 2023 से शुरू हुई थी। विश्लेषकों का कहना है कि एससीओ सदस्य सितंबर, 2022 की बैठक के प्रस्तावों को आगे बढ़ाएंगे और क्षेत्र एवं दुनिया के सामने मौजूद ज्वलंत मुद्दों पर विचार करेंगे। यह निश्चित है कि सदस्य देश नशीले पदार्थों के खतरे, कट्टरवाद, मानव संकट और तालिबान शासन की महिला विरोधी मानसिकता, अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण ट्रांजिट कॉरिडोर और तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे।

भारत 'पड़ोसी पहले' की अपनी नीति को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान के साथ सामान्य पड़ोसी संबंध बनाए रखने का इच्छुक है। भारत हमेशा से यह कहता आ रहा है कि यदि भारत और पाकिस्तान के बीच में कोई मुद्दा है, तो उसे हिंसा और आतंकवाद से मुक्त वातावरण में द्विपक्षीय और शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जा सकता है। यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भारत राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी सुरक्षा व क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने के सभी प्रयासों से निपटने के लिए दृढ़ और निर्णायक कदम उठाएगा।

भारत दवारा गोवा में होने वाली एससीओ बैठक का निमंत्रण दिए जाने पर पाकिस्तान असमंजस में पड़ गया था, क्योंकि इसे अस्वीकार करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि खराब होती। इससे वह चीन भी नाराज हो सकता था, जो रूस के साथ एससीओ का संस्थापक सदस्य है। लेकिन बैठक में भाग लेने पर पाकिस्तान के वे कट्टरपंथी नाराज हो सकते हैं, जो कभी भी दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य नहीं होने देना चाहते। बारह वर्षों के अंतराल के बाद किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री का भारत दौरा हो रहा है।

विशेषज्ञों की राय है कि एससीओ को न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करने की जरूरत है, जो विवादों को दूर कर सके। एससीओ और ब्रिक्स के संयोजन से इंटरबैंक कंसोर्टियम (जो अभी परिकल्पना ही है) साझा वित्तीय निधियों की कमी की समस्या को दूर कर सकता है। एससीओ एकमात्र संगठन है, जो आंतरिक मतभेदों के बावजूद मौजूदा विश्व व्यवस्था में कुछ हद तक अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। यह उस मूल्य को प्रदर्शित करता है, जो प्रत्येक सदस्य संगठन में रखता है। और उनके हितों के टकराव को देखते हुए यह हाल के दिनों में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। ब्रेजिंस्की सिद्धांत के अनुसार, जो देश मध्य एशिया पर हावी है, वह यूरेशिया पर हावी है, और जो यूरेशिया पर हावी है, वह दुनिया पर हावी है। एससीओ के गठन के बाद से ही चीन और रूस ने इस पर ध्यान दिया है। शंघाई फाइव ने वास्तव में मानवीय आधार पर और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए अन्य देशों में हस्तक्षेप का विरोध किया।

विशेषज्ञों का कहना है कि एससीओ की सदस्यता क्षेत्रीय एकीकरण हासिल करने, कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने और सीमा पार स्थिरता को मजबूत करने में योगदान दे सकती है, जो पहले से ही खतरे में है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताएं बढ़ रही हैं और एससीओ कूटनीति के माध्यम से बढ़ती मांग पूरी की जा सकती है। एससीओ सदस्यों के साथ तापी, आईपीआई (ईरान-पाकिस्तान-भारत) जैसी रुकी हुई परियोजनाओं पर बातचीत से इसमें गति आ सकती है।

इसी तरह एससीओ मध्य-एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करता है, जिससे भारत और मध्य एशिया के बीच आने वाली व्यापार बाधाओं पर काबू पाया जा सकता है। आर्थिक मोर्चे पर भारत को दूरसंचार, आईटी, बैंकिंग, वित्त और दवा जैसे विभिन्न क्षेत्रों में मध्य एशियाई देशों में एक बड़ा बाजार बनाने का अवसर मिलता है। भू-राजनीतिक रूप से, एससीओ अपनी 'कनेक्ट सेंट्रल एशियन पॉलिसी' को लागू करने के लिए एक बाजार प्रदान करता है, क्योंकि मध्य एशिया विस्तारित पड़ोस का हिस्सा है।

चीन और पाकिस्तान पर अंकुश लगाने के अलावा एशिया में अग्रणी भूमिका निभाने की भारत की आकांक्षा एससीओ के माध्यम से संभव हो सकती है, क्योंकि इसमें एससीओ के सह-संस्थापक के रूप में भारत का एक पुराना भरोसेमंद दोस्त रूस शामिल है। 

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