फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Save The Deserts conservation of Desert Ecosystems important for geography and human life

Save The Desert: रेगिस्तान का संरक्षण मानव जीवन के लिए जरूरी, जानें इसके महत्व

Mon, 13 Feb 2023 05:54 AM IST
Ashwani Sharma Ashwani Sharma
Updated Mon, 13 Feb 2023 05:54 AM IST
विज्ञापन
सार
रेगिस्तान में मौजूद वनस्पति और जैव विविधता का संरक्षण न केवल भूगोल के लिए जरूरी है, बल्कि इंसान के जिंदा रहने की भी पहली शर्त है।
loader
Save The Deserts conservation of Desert Ecosystems important for geography and human life
Save The Desert - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

रेगिस्तान के कुछ स्थानीय लोगों, घुमंतू पशुचारकों, पर्यावरणविदों और पत्रकारों ने मिलकर 'सेव द डेजर्ट' नामक मुहिम की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य रेगिस्तान के मूल स्वरूप को बचाए रखना है। उस जीवन संस्कृति को सहेजना है, जो थार को दुनिया में सबसे नायाब बनाते हैं। पिछले कुछ वर्षों से रेगिस्तान के स्वरूप को बदलने का प्रयास किया जा रहा है। पर्यटन, आजीविका, सौंदर्यीकरण, जीवन की सुख-सुविधाएं और शहरी जीवन की नकल के कारण ऐसा हो रहा है, जिसमें कुछ पढ़े-लिखे एवं उच्च पदों पर आसीन लोगों की भूमिका है।



रेगिस्तान का मतलब केवल राजस्थान नहीं है, बल्कि गुजरात के कच्छ-भुज का हिस्सा, राजस्थान, दक्षिण हरियाणा और पंजाब का कुछ हिस्सा भी इसमें शामिल है। सभी रेगिस्तान शून्य डिग्री, भूमध्य रेखा से 30 डिग्री उत्तर और 30 डिग्री दक्षिण के मध्य स्थित हैं। यहां पर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, जिसकी वजह से तापमान वर्ष भर ज्यादा रहता है। यहां से हवाएं गर्म होकर ऊपर की तरफ उठती हैं, जिसकी वजह से यह निम्न दाब का क्षेत्र विकसित होता है।


थार का मरुस्थल जब गर्मी की वजह से तपने लगता है, तब हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और निम्न दाब का केंद्र थार रेगिस्तान बन जाता है। इसके विपरीत समुद्री क्षेत्र में उच्च दाब का केंद्र रहता है। हवाओं की यह प्रकृति रहती है कि वह उच्च दाब केंद्र से निम्न दाब की ओर चलती हैं। समुद्र की तरफ से हवाएं भारत में तभी दाखिल होती हैं, जब थार रेगिस्तान में निम्न दाब का क्षेत्र विकसित होता है। चूंकि इन हवाओं में नमी की मात्रा ज्यादा रहती है, इसलिए मध्य भारत और उत्तर भारत में बरसात का यह बड़ा कारण बनता है।

जब रेगिस्तान नहीं रहेगा, तब कम दबाव का क्षेत्र ज्यादा विकसित नहीं होगा, और समुद्र से आने वाली हवाओं को आकर्षित नहीं कर पाएगा, तो इसके फलस्वरूप मध्य और उत्तर भारत के क्षेत्र में बारिश कम होगी। नतीजतन वहां की वनस्पति और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। लंबे समय में वह रेगिस्तान का रूप ले लेगा। यही स्थिति थार रेगिस्तान की भी होगी, और वहां की जैव विविधता भी समाप्त हो जाएगी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी शुरुआत हो चुकी है। चित्तौड़गढ़ भीलवाड़ा की तरफ रेगिस्तान शिफ्ट कर रहा है। किंतु सरकार से जुड़ी तमाम संस्थाएं चुप हैं, उन्हें खतरे का कोई अनुमान नहीं है। इसका बड़ा प्रभाव तटीय क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ेगा। समुद्र में बड़े स्तर पर तीव्र गति के साथ अधिक बारंबारता वाले चक्रवातों का आगमन होगा, जो वहां की पारिस्थितिकी तंत्र को पूर्णतः नष्ट कर देगा। स्थानीय मछुआरों के जीवन को अलग तरह के संकट का सामना करना पड़ेगा।

रेगिस्तान में पिछले बीस वर्षों में 60 फीसदी जल के परंपरागत स्रोत समाप्त हो चुके हैं। रेगिस्तान की आत्मा लूणी नदी, जो पुष्कर से निकलकर पूरे मारवाड़ को अमृत प्रदान करती है, लुप्त होने के कगार पर है। हम स्थानीय वनस्पति-खेजड़ी, केर, कुमटी, फॉग, धामन घास, बोर, पीलू, रोहिड़ा, साटी, बुरठ के बजाय अन्य पेड़-पौधे लगाने में लगे हैं, जो यहां के अनुकूल नहीं हैं। ज्वार, बाजरे के स्थान पर व्यापारिक फसलें अनार, फूल, गेहूं लगा रहे हैं, जिनके लिए यह भूगोल नहीं हैं। टिड्डियों के आक्रमण ने स्थानीय वनस्पति के बजाय बाहरी वनस्पतियों को ज्यादा समाप्त किया है। यहां के भूगोल के हिसाब से भेड़, बकरी और ऊंट ज्यादा अनुकूल जानवर हैं, किंतु आजकल डेयरी फार्म खोलकर व्यापारिक पशुपालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका प्रभाव दिख रहा है, लंपी बीमारी में वही गायें मरीं, जो गौशालाओं में थीं।

जलवायु परिवर्तन को मापने के लिए स्थानीय वनस्पति और जीव जंतुओं को देखा जाता है। जब स्थानीय वनस्पतियों की जगह दूसरी वनस्पतियां आ जाएंगी, तो कैसे पता चलेगा कि जलवायु परिवर्तन से कैसा प्रभाव पड़ रहा है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed