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ग्रामीण कौशल बन सकता है आधार
अनिल प्रकाश जोशी
Updated Mon, 16 Jul 2018 06:39 PM IST
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अनिल प्रकाश जोशी
दुनिया में बढ़ती बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है। इसकी चपेट से दुनिया का कोई भी देश नहीं बचा। अगर विकसित देशों की तरफ देख लें, तो वहां भी इसने पैर पसार रखे हैं। मसलन, विकसित देशों में शुमार अमेरिका में बेरोजगारी दर चार फीसदी है, वहीं चीन की आक्रामक आर्थिकी भी बेरोजगारी पर पूरा अंकुश नहीं लगा सकी।
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अपने देश के हालात तो कई मामलों में गंभीर हैं। देश की वर्तमान आबादी का 35 फीसदी हिस्सा युवा है। देश में लगभग 4.5 करोड़ पढ़े-लिखे पंजीकृत बेरोजगार हैं, जिनमें 20 फीसदी युवा हैं। विश्व बैंक की रपट के अनुसार, तीस फीसदी युवा, जिनकी उम्र 15 से 24 वर्ष के बीच है, किसी भी रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण के दायरे में नहीं हैं। देश-दुनिया में कौशल विकास को मिशन मोड में लाने के पीछे बेरोजगारी दूर करना ही मुख्य उद्देश्य रहा है। लेकिन यह इसकी समीक्षा का भी समय है, क्योंकि अपने देश में गत चार वर्षों में यह मिशन कितना अपने लक्ष्य तक पहुंच सका यह भी देखना है। बात मात्र कौशल विकास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि किस्सा इसके बाद का है कि हम कितनों को खपा पाए। इस बात पर कोई बहस की गुंजाइश नहीं कि अपने देश में इस तरह के मिशन की आवश्यकता हमेशा से रही है। पर इसका लक्ष्य सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जैसा कि अक्सर हुआ है कि हम मात्र आंकड़ों को छूने तक सफलता पा लेते हैं।
दूसरा बड़ा सवाल, यह कि हमारे कौशल की दिशा क्या है। अगर यह फिर एक बार उन्हीं मुद्दों तक अटक जाएगी, जो हमेशा से रही है, तो हम कुछ नया नहीं कर पाएंगे, क्योंकि मिशन 2022 तक 40 करोड़ लोगों को हमें इसके तहत तैयार करना है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि कौशल भारत मिशन का मकसद मात्र आंकड़ों का नया भ्रम पैदा करना नहीं, बल्कि पिछड़ों में आत्मविश्वास पैदा करना है।
इस मिशन की अहम बात यह है कि इस योजना में बड़ी भागीदारी महिलाओं की रही है। योजना के पहले ही साल में 20 लाख लोगों को इसके तहत जोड़ा गया था, जिसमें 40 फीसदी महिलाएं थी। वर्ष 2017 में भी करीब 30 लाख लोग इससे जुड़े। यह बात दूसरी है कि मात्र तीन लाख लोगों को ही नौकरी मिल पाई। यह एक ऐसे अंतर की तरफ भी इशारा करता है, जो खपत और आपूर्ति के बीच पैदा होता है।
सबसे बड़ा सवाल जो आज खड़ा है, वह इस देश के ग्रामीण कौशल व आर्थिकी का है। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि गांव मात्र उत्पादक के रूप में जाने जाते हैं और देश के किसान सही और अपने उत्पादों के मूल्य के लिए रोजाना सड़कों पर हैं। ऐसे में सरकारों की सीमाएं भी समझी जा सकती हैं, क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य को ताबड़तोड़ ज्यादा बढ़ा देना मुद्रास्फीति को जन्म दे सकता है। वहीं दूसरी तरफ ये गांव के ही उत्पाद हैं, जिनकी मूल्य वृद्धि के बाद देश की आर्थिकी चलती है। पर उस मूल्य वृद्धि के हिस्से में गांव नहीं आते, क्योंकि ये कहीं न कहीं उनके कौशल विकास से जुड़ा है, जो उन्हें बेहतर उत्पादन से लेकर बाजार नियंत्रण के तरीकों को भी सिखा सके। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि धान और गेहूं किसान पैदा करते हैं, पर आटा और चावल के बाजार में बड़े घरानों की भागीदारी है। मसाले हों या बाजार में बिकने वाले अन्य उत्पाद सबका स्रोत गांव ही है। अब कौशल विकास की दिशा ग्रामोन्मुखी भी होनी चाहिए, क्योंकि बेरोजगारी गांव से ही चलकर शहरों में पहुंचती है।
इस कौशल विकास से अगर स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार खड़े करने की कोशिशें होंगी, तो एक तरफ पलायन पर अंकुश लगेगा और फिर संसाधनों की बढ़ोतरी भी होगी।