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पर्यावरण: नदियों में बढ़ती गाद से गहराता संकट, जरूरी है इसका प्रबंधन

Thu, 11 Jan 2024 06:57 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Thu, 11 Jan 2024 06:57 AM IST
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सार
नदियों में बढ़ती गाद से सतलुज, गंगा और हिंडन जैसी नदियां सूख रही हैं। गाद का भली-भांति प्रबंधन न होने से ही मुश्किलें बढ़ रही हैं।
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River Environments Sutlej, Ganga and Hindon drying due to Silting in Rivers and poor management of silt
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पिछले महीने संपन्न सतलुज-यमुना जोड़ की बैठक में पंजाब सरकार ने स्पष्ट किया कि उनके राज्य में सतलुज नदी अभी से सूख रही है। दिल्ली में यमुना हो या फिर गाजियाबाद-शामली में हिंडन, ये भी सिकुड़ रही हैं। दो महीने पहले बरसात में तबाही मचाने वाली बिहार के गोपालगंज जिले से गुजरने वाली घोघारी, धमई व स्याही नदियों ने भी सूखने के लिए गर्मी का इंतजार नहीं किया। विगत जुलाई में सी-गंगा यानी सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट ऐंड स्टडीज द्वारा जल शक्ति मंत्रालय को सौंपी गई रिपोर्ट बताती है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और झारखंड की 65 नदियां बढ़ती गाद से हांफ रही हैं।



हालांकि गाद नदियों के प्रवाह का नैसर्गिक उत्पाद है और देश के कई बड़े तीर्थ व प्राचीन शहर इसी गाद पर विकसित हुए हैं। पर नदी के साथ बहकर आई गाद को जब किनारों पर माकूल जगह नहीं मिलती, तो वह जलधारा के मार्ग में व्यवधान बन जाती है। गाद नदी के प्रवाह मार्ग में जमती रहती है और इससे नदियां उथली होती हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसी 36 नदियां हैं, जिनकी कोख में इतनी गाद है कि न केवल उनकी गति मंथर हुई है, बल्कि कुछ ने अपना मार्ग बदला और उनका पाट संकरा हो गया। रही-सही कसर अंधाधुंध बालू उत्खनन ने पूरी कर दी। नतीजतन इनमें से कई नदियों का अस्तित्व खतरे में है। प्रयागराज के फाफामऊ, दारागंज, संगम, छतनाग और लीलापुर के पास टापू बनते हैं। संगम के आसपास गंगा नदी में चार मिलीमीटर की दर से हर साल गाद जमा हो रही है।


गंगा की गहराई कम होने से उसकी धारा में भी परिवर्तन हो रहा है। आने वाले दिनों में गंगा की धारा और तेजी से परिवर्तित होगी, क्योंकि जब नदी की गहराई कम हो जाएगी, तो नदी का स्वाभाविक बहाव रुक जाएगा। ऐसे में बाढ़ का खतरा स्वाभाविक है। यह बात सरकारी रिकॉर्ड में है कि आज जहां पर संगम है, वहां यमुना की गहराई करीब 80 फीट है, लेकिन गंगा की गहराई इतनी कम है कि संगम के किनारे नदी में खड़े होकर कोई भी स्नान कर सकता है। पर यमुना की अधिक गहराई के चलते असंतुलन उत्पन्न हो रहा है। तभी संगम पूरब की तरफ बढ़ रहा है और उसका झुकाव अकबर के किले तक खिसक चुका है, जबकि संगम कभी सरस्वती घाट के पास हुआ करता था।

आजादी के बाद भी गढ़मुक्तेश्वर से कोलकाता तक जहाज चला करते थे। गाद के चलते बीते पांच दशक में वहां गंगा की धारा आठ किलोमीटर दूर खिसक गई है। बिजनौर के गंगा बैराज पर गाद की आठ मीटर मोटी परत है। आगरा व मथुरा में यमुना गाद से भर गई है। आजमगढ़ में घाघरा और तमसा के बीच गाद के कारण कई मीटर ऊंचे टापू बन गए हैं। घाघरा, कर्मनाशा, बेसो, मंगई, चंद्रप्रभा, गरई, तमसा, वरुणा और असि नदियां गाद से बेहाल हैं।

बिहार में तो उथली हो रही नदियों में गंगा सहित 29 नदियों का दर्द है। जो नदियां तेज बहाव से आ रही हैं, उनके साथ आए मलबे से भूमि कटाव भी हो रहा है और कई जगह नदी के बीच टापू बन गए हैं। अकेले फरक्का से होकर गंगा नदी पर हर साल 73.6 करोड़ टन गाद आती है, जिसमें से 32.8 करोड़ टन गाद इस बैराज के प्रति प्रवाह में ठहर जाती है। झारखंड के साहिबगंज में गंगा अपने पारंपरिक घाट से पांच किलोमीटर दूर चली गई है। वर्ष 2016 में केंद्र सरकार द्वारा गठित चितले कमेटी ने साफ कहा था कि नदी में बढ़ती गाद का एकमात्र निराकरण यही है कि नदी के पानी को फैलने का पर्याप्त स्थान मिले, तटबंध और नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण न हो और अत्यधिक गाद वाली नदियों के संगम क्षेत्र से नियमित गाद निकालने का काम हो। पर ये सिफारिशें ठंडे बस्ते में बंद हो गईं।

यह दुर्भाग्य है कि विकास के नाम पर नदियों के कछार को सर्वाधिक हड़पा गया। भूमि के लालच में कछार और उसकी गाद लुप्त हो गई। गाद हर नदी का स्वाभाविक उत्पाद है, पर उसका भली-भांति प्रबंधन अनिवार्य है। गाद जैसे ही नदी के बीच जमती है, तो नदी का प्रवाह बदल जाता है। यदि गाद किनारे से बाहर नहीं फैली, तो नदी के मैदान का उपजाऊपन और ऊंचाई, दोनों घटने लग जाते हैं, जिससे बाढ़ का दुष्प्रभाव अधिक होता है।

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