जानना जरूरी है: भारतीय सभ्यता में गहरी हैं गणतंत्र की जड़ें, वैदिक काल में भी ऐसे शासन के प्रमाण
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
‘गण’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘गण’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है गिनना या गिनती करना। यदि हम ‘गण’ शब्द के शाब्दिक अर्थ पर विचार करें, तो इसका वास्तविक अर्थ ‘समूह’ है न कि ‘जनजाति’। यद्यपि वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर ‘गण’ शब्द जनजातीय संगठन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। गण शब्द का प्राचीनतम उल्लेख हमें ऋग्वेद में प्राप्त होता है। ऋग्वेद के पांचवें मंडल में इकसठवें सूक्त के तेरहवें मंत्र में ऋषि कहता है ‘युवा स मरूतो गणस्त्वेषस्थो अनेद्यः शुभं यावाप्रतिष्कुतः।’ तथा चौथे मंडल में पैंतीसवें सूक्त के तीसरे मंत्र में ‘गणदेवानां ऋभवः सुहस्ताः’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लगभग छियालीस बार गण शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में तथा अथर्ववेद में नौ बार मिलता है। तैत्तिरीय तथा शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रंथों में अनेक बार गण शब्द का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल के लोगों के जातीय संगठन के सादृश्य के आधार पर कहा जा सकता है कि गण अपनी इच्छानुसार काम करने वाला सशस्त्र संगठन था, जिसका प्रत्येक सदस्य शस्त्र धारण करता था। वैदिक गण की विशिष्टता थी कि इसमें वर्गभेद नहीं था। जहां तक भारत में गणतंत्रात्मक राज्य की प्राचीनता का संबंध है, इसके पर्याप्त संदर्भ हमें वैदिक काल में मिलते हैं। ऋग्वेद के दसवें मंडल की एक ऋचा 10.9.16 ‘जिस प्रकार राजा लोग समितियों में एकत्र होते हैं, उसी प्रकार औषधियां उसमें एकत्र होती हैं, जो भिषज कहलाता है, जो व्याधि को दूर करता है’ का संदर्भ लेते हुए जिम्मर महोदय कहते हैं कि इस ऋचा में शासन की उस पद्धति का उल्लेख है, जिसमें राज्य पर एक राजा शासन नहीं करता, अपितु राज परिवार के अनेक सदस्य संयुक्त रूप से राज्य करते हैं।
काशी प्रसाद जायसवाल वैदिक काल में शासन के गणतंत्रात्मक रूप के अस्तित्व के पक्ष में ऐतरेय ब्राह्मण (7.3.14) के एक वचन के संदर्भ से एक दूसरा महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, जिसमें कहा गया है कि उत्तरकुरुओं और उत्तरमदों में शासन के लिए समस्त समुदाय का अभिषेक किया जाता था।
उनकी संस्थाएं ‘वैराज्य अथवा गणतंत्रात्मक राज्य’ कहलाती थीं। काल दृष्टि से पाणिनि का व्याकरण ग्रंथ प्राचीनतम है, जिसमें राजनीतिक संघों के चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं। ‘सङ्घ चानौत्तरार्ध्ये’ सूत्र से स्पष्ट होता है कि पाणिनि के समय में संघ का स्वरूप अच्छी तरह ज्ञात था। आरसी मजूमदार ने इन्हें नियमों और कानूनों द्वारा बंधी निश्चित संस्था के अर्थ में लिया है। परंतु काशीप्रसाद जायसवाल पाणिनि तथा पालि कृतियों के संदर्भों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मूलतः संघ और गण का प्रयोग गणतंत्रात्मक राज्यों के लिए हुआ था तथा धार्मिक संघों के लिए इनका प्रयोग बाद में हुआ। बौद्ध साहित्य विशेषकर जातकों में ‘गण’ का अर्थ एक ऐसी संस्था या समिति से है, जिसमें सदस्यगण मिलकर एक हो जाते थे। इसका दूसरा अर्थ गणराज्य भी है। बौद्धकाल में ‘गण’ शब्द का प्रयोग स्पष्ट रूप से जनतंत्रात्मक राज्यों के लिए होने लगा था। बौद्ध साहित्य में इस बात के सबल अंत:साक्ष्य हैं कि बुद्ध के आविर्भाव-काल में अनेक स्वतंत्र कबीले विद्यमान थे, जो अपना प्रशासन या तो प्रजातांत्रिक या कुलीन तंत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत चलाते थे। काशीप्रसाद जायसवाल ने जैन ग्रंथ आचारांग सूत्र के आधार पर ‘गण’ के अस्तित्व का उल्लेख किया है। ‘गण’ का अर्थ है-संख्या, अतः गणराज्य का अर्थ हुआ-‘संख्या का शासन।’ मज्झिम निकाय में ‘संघ’ और ‘गण’ साथ-साथ व्यवहृत हुए हैं। त्रिपिटक से ज्ञात होता है कि बुद्ध के काल में मल्ल, लिच्छवी, विदेह आदि राज्य गणतंत्र थे। उनके कई पड़ोसी मगध और कौशल के राजा उन्हें बार-बार जीतने के उद्देश्य से चढ़ाई करने का यत्न करते रहते थे, इसलिए अपनी सुरक्षा के कारण ये गणतंत्र अपना एक संयुक्त राज्य (संघ) बीच-बीच में बनाते थे। स्पष्ट है कि ‘गण’ का अर्थ समूह से है। अतः गणतंत्र का अर्थ है-समूह संचालित राज्य प्रणाली।