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धर्म के नाम पर: कर्नाटक सरकार कटघरे में? तुष्टीकरण की राजनीति छोड़ सबके लिए समान अवसर सुनिश्चित करना जरूरी

Mon, 17 Mar 2025 08:06 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 17 Mar 2025 08:06 AM IST
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सार
सरकारी ठेकों में मुस्लिम समुदाय को चार फीसदी आरक्षण देने संबंधी कर्नाटक सरकार के फैसले के पीछे उसकी राजनीतिक मंशा अधिक दिखती है। सरकारी नौकरियों में कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण तो दिया जाता रहा है, लेकिन सरकारी ठेकों में आरक्षण अपने-आप में एक अनोखी बात है।
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religion based quota in tender Karnataka govt in dock leave appeasement politics ensure equal opportunities
सिद्धारमैया, सीएम, कर्नाटक - फोटो : ANI

विस्तार

अभी होली में देश के विभिन्न संप्रदायों के लोगों ने आपसी सद्भाव और सौहार्द का जो रंग जमाया, वह छूटा भी नहीं है कि कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने कर्नाटक सार्वजनिक खरीद पारदर्शिता (केटीपीपी) अधिनियम में संशोधन को कैबिनेट में मंजूरी देकर मुस्लिम समुदाय के लिए सरकारी ठेकों में चार फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर अनेक सवालों और विवादों को जन्म दे दिया है। संशोधन विधेयक विधानसभा में इसी बजट सत्र में पेश किया जाएगा, जिसके पारित होने पर सरकारी ठेकों में मुस्लिमों को आरक्षण का रास्ता साफ हो जाएगा।


शिक्षा एवं नौकरी के लिए आरक्षण का प्रावधान है, ठेकों के लिए नहीं
यह फैसला सांविधानिक समरसता को चुनौती देता है, जिसके दूरगामी सामाजिक व आर्थिक प्रभाव हो सकते हैं। हालांकि राज्य सरकार तर्क दे रही है कि यह कदम ‘पिछड़े वर्गों’ के सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया है, लेकिन यह नीति धर्म के आधार पर नागरिकों के साथ भेदभाव करती है, जो संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जिसकी नींव समानता, न्याय और अवसरों की निष्पक्षता पर आधारित है। धार्मिक आधार पर आरक्षण देना इन मूल्यों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। विशेषज्ञों के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में शिक्षा एवं नौकरी के लिए आरक्षण का प्रावधान है, ठेकों के लिए नहीं।


समान अवसर की अवधारणा कमजोर होगी
यह समाज में एक खतरनाक विभाजनकारी प्रवृत्ति को जन्म देता है, जिसके पीछे की राजनीति और संभावित दुष्परिणामों पर गंभीर विचार करना आवश्यक है। ऐसे फैसले वोट-बैंक की राजनीति के तहत किए जाते हैं, जो समाज में ध्रुवीकरण पैदा कर असमानता बढ़ाते हैं। सरकार को समझना चाहिए कि ठेका प्रणाली में योग्यता, पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा का होना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा इससे भ्रष्टाचार और पक्षपात के नए रास्ते खुल सकते हैं। किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए आरक्षित कोटा लागू करने से सार्वजनिक सेवा की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है, और यह समान अवसर की अवधारणा को कमजोर करता है।

आरक्षण की अवधारणा का राजनीतिक दुरुपयोग
बेशक सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने हेतु विशेष अवसर देने की आवश्यकता है, लेकिन यह ‘आर्थिक स्थिति’ या ‘शैक्षिक पिछड़ापन’ के आधार पर होना चाहिए, न कि धार्मिक पहचान के आधार पर। यदि प्रत्येक धर्म विशेष को इसी प्रकार रियायत दी जाने लगी, तो यह आरक्षण की अवधारणा का राजनीतिक दुरुपयोग होकर रह जाएगा। धर्म आधारित आरक्षण समाज को बांटने का ही कार्य करेगा, जो राष्ट्रहित में नहीं है।

सभी के लिए बेहतर क्या?
राज्य सरकार अगर तुष्टीकरण की राजनीति छोड़कर सबके लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य करे, तो यह सभी के लिए बेहतर होगा और यही उससे अपेक्षित भी है।
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