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एक समझौते पर बिगड़ती बात: सबसे अधिक विवाद डाटा लोकलाइजेशन पर है

Sun, 20 Oct 2019 04:21 AM IST
Anant Mittal अनंत मित्तल
Updated Sun, 20 Oct 2019 04:21 AM IST
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Regional Comprehensive Economic Partnership agreement most of controversy is on data localization
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

देश के पशुपालकों, किसानों, उद्यमों एवं मजदूरों की धड़कनें बढ़ाने वाले क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते की अंतिम बातचीत के भारत की आपत्तियों पर टल जाने से ही इसके महत्व एवं पेचीदगियों का अंदाजा लग रहा है। अगली मंत्रिस्तरीय बैठक में अब बैंकाक में ही एक नवंबर को इस पर अंतिम बातचीत होगी तथा चार नवंबर को वहीं पर इसके 16 सदस्य देशों के मुखिया समझौते की सामूहिक घोषणा करेंगे। समझौते के तहत इन देशों के बीच मुक्त व्यापार संबंधी कुल 25 प्रावधानों पर चर्चा हुई जिनमें छह मुद्दों पर बातचीत अभी जारी है।


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देश के पशुपालकों, किसानों, उद्यमों एवं मजदूरों की धड़कनें बढ़ाने वाले क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते की अंतिम बातचीत के भारत की आपत्तियों पर टल जाने से ही इसके महत्व एवं पेचीदगियों का अंदाजा लग रहा है। अगली मंत्रिस्तरीय बैठक में अब बैंकाक में ही एक नवंबर को इस पर अंतिम बातचीत होगी तथा चार नवंबर को वहीं पर इसके 16 सदस्य देशों के मुखिया समझौते की सामूहिक घोषणा करेंगे। समझौते के तहत इन देशों के बीच मुक्त व्यापार संबंधी कुल 25 प्रावधानों पर चर्चा हुई जिनमें छह मुद्दों पर बातचीत अभी जारी है।

ये मुद्दे हैं : बाजार में दखल, निवेश, व्यापारिक उपचार, प्रतियोगिता, ई-कॉमर्स, मूल संबंधी नियम, आदि। भारत ने अपनी विशाल आबादी, देशवासियों के उद्यमशील मिजाज तथा घरेलू मंदी से परेशान कारोबारियों एवं किसानों के दबाव के कारण कड़ा रुख अपना रखा है पर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल बातचीत को बहुत आशाजनक बता रहे हैं। भारत एवं चीन सहित एशिया-प्रशांत क्षेत्र के जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण कोरिया    और आसियान सहित कुल 16 देश समझौते में शामिल है।

सबसे अधिक विवाद डाटा लोकलाइजेशन अर्थात ग्राहकों के निजी विवरण को सदस्य देशों से बाहर ले जाने संबंधी प्रावधान पर है। ई-कॉमर्स में इसका 16 में से 14 सदस्य देशों ने विरोध किया है। इसलिए आसियान के डाटा संबंधी समझौता प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है। अलबत्ता इस प्रावधान को वित्तीय सेवाओं के संदर्भ में मंजूरी देने पर भारत राजी है। ई-कॉमर्स पर पेच फंसा हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से निजी सूचना सहित व्यापारिक सूचनाओं के सीमा पार अंतरण को भारत ने तभी रोकने को कहा है, जब यह वैधानिक सार्वजनिक नीति के उद्देश्य के लिए आवश्यक हो अथवा अपने आवश्यक सुरक्षा हितों या देश के हितों के संदर्भ में संबद्ध देश की राय में जरूरी हो।

यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक ने अप्रैल 2018 को जारी आदेश के तहत सभी सिस्टम प्रदाताओं से अपने पेमेंट सिस्टम से संबंधित सभी डाटा भारत के भीतर ही संग्रहित करने को कहा है। बस सीमापार हुए लेनदेन के डाटा को ही विदेश स्थित सिस्टम में रखा जा सकता है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय भी ई-कॉमर्स नीति में डाटा के स्थानीयकरण पर कड़ी निगाह रख रहा है और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय इसी उद्देश्य के लिए निजी डाटा संरक्षण विधेयक तैयार कर रहा है।

दिक्कत यह है कि अब तक सभी मुक्त व्यापार समझौतों में भारत सालाना 105 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का व्यापार घाटा झेल रहा है। अर्थात हम अपनी क्षमता बढ़ाएं तथा उत्पाद सस्ते करें, तो उन 11 देशों को इतनी रकम के बराबर माल अथवा सेवाओं का निर्यात कर सकते हैं, जिनसे व्यापार घाटा खा रहे हैं। निर्यात बढ़ने पर शहरी, अर्धशहरी आबादी ही नहीं ग्रामीण कारीगरों को भी बड़े पैमाने पर रोजगार मिलने से देश में खुशहाली आएगी।

फिर भी श्रीलंका से 2000 में पहले मुक्त व्यापार समझौते के बाद से पिछले दो दशक तक हम ऐसा नहीं कर पाए। इसीलिए समझौते से सबसे अधिक आशंकित दूध उत्पादक पशुपालक, खाने-पीने की चीजों के उत्पादक एवं काली मिर्च एवं इलायची उत्पादक किसान तथा इस्पात, प्लास्टिक उद्योग एवं उनसे सामान बनाने वाले उद्यमी हैं। किसान संगठनों, अमूल जैसे देशव्यापी सहकारी दुग्ध संगठनों, नागर संगठनों एवं उद्योग-व्यापार संगठनों द्वारा आरसीईपी का विरोध किया जा रहा है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तो वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से भारत पर आरसीईपी के आसन्न प्रभाव पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की भी मांग की है। विरोधियों के अनुसार समझौते के बाद यह देश भारत की कृषि और वस्तुओं पर लगने वाले तटकर को एकमुश्त घटाने का दबाव बनाएंगे।

सत्तारूढ़ भाजपा के सहोदर स्वदेशी जागरण मंच के अनुसार न्यूजीलैंड वैसे तो अपने कुल दूध उत्पादन का महज पांच फीसद भारत को निर्यात करने का आश्वासन दे रहा है, मगर उसकी मात्रा हमारे कुल दूध उत्पादन की एक तिहाई होगी! तो फिर हमारे पशुपालक कहां जाएंगे जिनकी उत्पादन लागत यों भी बहुत ज्यादा है? ऐसा आरोप है कि पशु आहार में पशु प्रोटीन दिए जाने के कारण वहां प्रति मवेशी दूध उत्पादन ज्यादा है। इसी बिना पर केंद्रीय पशुपालन एवं डेरी उद्योग मंत्री गिरिराज सिंह विदेशी दूध का विरोध कर रहे हैं। भारत आज दुनिया में दूध उत्पादन में अव्वल है। गांवों में करीब आठ करोड़ परिवार पशुपालन में संलग्न हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि गरीबों और निम्न मध्यवर्ग की पोषण प्रणाली भी पशुपालन और दूध उत्पादन पर ही टिकी हुई है।    
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