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बदलाव: कर्जदारों के हित में है आरबीआई का मसौदा परिपत्र, दंड शुल्क वसूली पर लगेगी लगाम

Narayan Krishnamurthy नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Tue, 02 May 2023 07:15 AM IST
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सार
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी मसौदा परिपत्र में शुल्क के मानकीकरण के लिए कहा गया है और इस बात पर जोर दिया गया है कि जुर्माना उधारकर्ताओं को गलती का एहसास कराने के लिए है और इसे हालात के मौद्रीकरण के तरीके के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। यह कदम कर्जदारों, खासकर छोटे कर्जदारों के हित में है।
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RBI draft rules to regulate penal charges on loans Accounts Fair lending practices
आरबीआई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि वित्तीय सेवाओं में नियामक अक्सर बहुत देर से अपनी निष्पक्ष भूमिका निभाते हैं। बैंकिंग क्षेत्र के नियामक भारतीय रिजर्व बैंक ने एक मसौदा परिपत्र जारी किया है-निष्पक्ष ऋण व्यवस्थाः ऋण खातों में दंड। इस परिपत्र का मुख्य उद्देश्य ऋण देने वाली संस्थाओं, जैसे बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफसी) और अन्य संस्थाओं को प्रतिबंधित करना हैं, जिन्हें दिए गए ऋणों के देर से भुगतान पर दंडात्मक शुल्क लगाने की अनुमति दी गई है।



अभी इन सभी संस्थानों के पास कोई मानकीकृत नियम नहीं है कि उधारकर्ताओं द्वारा देरी या चूक के मामले में वे दंड स्वरूप कितना शुल्क ले सकते हैं। संस्थाओं को यह निर्धारित करने की स्वतंत्रता है कि जब तक ऐसी उधार देने वाली कंपनियों के बोर्ड द्वारा दंड को मंजूरी दी जाती है, तब तक वे जितना चाहे जुर्माना लगा सकते हैं। अक्सर, दंड शुल्क एक समान नहीं होता है, लेकिन ब्याज के रूप में लगाया जाता है, जो अक्सर एक उधारकर्ता के लिए बहुत कठोर होता है, जो पहले से ही ऋण चुकौती के लिए संघर्ष कर रहा होता है।


उदाहरण के लिए 1,000 रुपये की मासिक ईएमआई (किस्त) को लें, यदि ऋण पर ब्याज दर 10 फीसदी है और ब्याज की दंडात्मक दर एक फीसदी प्रति माह है, तो मूल रूप से देरी या चूक होने पर प्रति माह एक फीसदी जुर्माना कुल बकाया ऋण पर होगा, न कि सिर्फ ईएमआई पर, जो कि 1,000 रुपये है। यह व्यवस्था किसी भी उधारकर्ता के लिए बहुत महंगी साबित होती है और उनके लिए अनुचित है। जुर्माना एक निश्चित राशि होनी चाहिए और ईएमआई की मात्रा के आधार पर शुल्क बढ़ने के साथ ईएमआई रेंज के आधार पर अलग-अलग होनी चाहिए।

हालांकि देर हो चुकी है, लेकिन अंततः भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने परिपत्र में इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि ऋण देने वाली संस्थाएं लागू ब्याज दरों से बहुत ज्यादा ब्याज की दंडात्मक दर वसूलती हैं, अगर उधारकर्ता ऋण स्वीकृति के समय लागू शर्तों को पूरा करने में चूकते हैं या उनका गैर-अनुपालन करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक को उधारदाता वित्तीय संस्थाओं द्वारा लगाए गए इस तरह के किसी भी भारी जुर्माने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, यह एक रहस्य है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक निगरानीकर्ता है, जिसे ये संस्थाएं रिपोर्ट करती हैं और उसे इस तरह के अनाचार के बारे में पता होना चाहिए था।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी परिपत्र में शुल्क के मानकीकरण के लिए कहा गया है और इस बात पर जोर दिया गया है कि जुर्माना उधारकर्ताओं को गलती का एहसास कराने के लिए है और इसे हालात के मौद्रीकरण के तरीके के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। स्कूल फीस या फोन बिल के देर से भुगतान के लिए लगाए जाने वाले विलंब भुगतान शुल्क के बारे में सोचें, जो स्थिर प्रकृति के होते हैं और बीच में उनमें अंतर नहीं होता। इसके अलावा ये सभी के लिए एक समान होते हैं।
ऋण के मामले में दंड न केवल विभिन्न उधारकर्ताओं के लिए अलग-अलग होता है, बल्कि एक ऋणदाता से उधार लेने के आकार के अनुसार भी भिन्न होता है।

इसलिए, एक आवास ऋण लेने वाले छोटे स्तर के उधारकर्ता की तुलना में एक कॉरपोरेट संस्था पर ऋण चुकाने में देरी करने पर अपेक्षाकृत कम दंड (उनके बकाया ऋण के आधार पर) लगाया जाता है। यह विसंगति अनुचित प्रथाओं के समान है और बड़े कर्जदारों को भुगतान में चूक करने के लिए प्रोत्साहित करती है, क्योंकि उन्हें सख्त कार्रवाई या भारी मौद्रिक दंड का सामना नहीं करना पड़ता है। ऐसे में कोई भी अनुमान लगा सकता है कि विजय माल्या जैसे बड़े कॉरपोरेट कर्जदारों ने किस तरह न केवल बैंक का भारी-भरकम कर्ज नहीं चुकाया; बल्कि वे विदेश में भी आरामदायक जीवन जी रहे हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि ब्याज दरों के पुनर्गठन के लिए शर्तों सहित ऋण सुविधाओं पर ब्याज दरें, जारी किए गए प्रासंगिक नियामक निर्देशों द्वारा सख्ती से नियंत्रित होंगी और ऋण देने वाली संस्थाएं ब्याज दर के लिए कोई अतिरिक्त घटक पेश नहीं कर सकती हैं। इसका मतलब यह है कि देरी और चूक दंड ब्याज का हिस्सा नहीं होगा। इसके अलावा, सभी उधारकर्ताओं के लिए नियम समान होंगे और उन्हें कोई तरजीह नहीं दी जाएगी। भारतीय रिजर्व बैंक के रवैये में यह बदलाव वाकई खुशी की बात है, लेकिन समय आ गया है कि सभी वित्तीय उत्पादों के नियामक इस बात की जमीनी हकीकत जानें कि उनके नियामक दायरे में आने वाली संस्थाएं वास्तव में कैसे काम करती हैं।

मसौदा परिपत्र फिलहाल टिप्पणियों और सुझावों के लिए तैयार है, जिसे खिलाड़ियों के किसी भी पहलू के बारे में सोचने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है, जो उनके कामकाज के तरीकों को प्रभावित कर सकता है। मसौदा परिपत्र का एक बहुत ही दिलचस्प पहलू मुख्य तथ्य विवरण (केएफएस) है, जिसे विभिन्न ब्याज दरों और सेवा शुल्कों का विवरण देते हुए संस्थाओं की वेबसाइट पर प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, व्यक्तिगत उधारकर्ताओं को गैर-व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ऋण पर दंड शुल्क, कंपनियों और संगठनों पर लागू दंडात्मक शुल्क से अधिक नहीं हो सकता है। ऐसे सभी दंडात्मक शुल्कों का विवरण उधारकर्ताओं को ऋण समझौते में ही प्रकट किया जाना चाहिए।

भारतीय रिजर्व बैंक का यह कदम अनुकूल है और कर्जदारों, खासकर छोटे कर्जदारों के हित में है। रिजर्व बैंक और अन्य नियामकों को इसमें अधिक संलिप्त होने और अपने विनियमन के तहत आने वाली संस्थाओं द्वारा अपनाई जाने वाली प्रथाओं के बारे में जागरूक होने के साथ अपने कार्य को सही करने की आवश्यकता है।

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