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विमर्श: समय का पाबंद होना अच्छा, लेकिन घड़ी के चक्कर में जिंदगी न फिसल जाए

Sun, 03 Aug 2025 05:46 AM IST
दीपक कुमार शर्मा एमिली लेबर-वॉरेन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
एमिली लेबर-वॉरेन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 03 Aug 2025 05:46 AM IST
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सार
समय का पाबंद होना अच्छा है, लेकिन हर स्थिति में घड़ी की सुइयों पर जीवन चलाने की सनक कभी-कभी घातक भी हो सकती है।
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Punctuality is good but obsession to run life according to clock in every situation can prove fatal sometimes
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

शादी के बाद के शुरुआती दिनों में ऐनी वर्क फ्रॉम होम के चलते अपने घर से काम करती थी और अपने पार्टनर के लिए खाना बनाती थी, जिसे वह ‘घरेलू काम का मजा’ कहती थी। पति ने उससे कहा था कि वह शाम छह बजे घर पहुंचकर खाना खाएगा। ऐनी के लिए यह थोड़ा जल्दी था, फिर भी वह खाना बनाने के लिए तैयार थीं-लेकिन वह ऐसी कठोरता को नहीं समझ पाई। समय की पाबंदी दोनों के बीच लगातार झगड़े का कारण बन रही थी। ऐनी, जो जीवन भर समय पर काम निपटाने के लिए संघर्ष करती रही, अक्सर कहती थीं, ‘मैंने तुमसे शादी की है, सेना में भर्ती नहीं हुई’, जबकि उसके पति कहीं भी समय पर न पहुंच पाने के चलते परेशान रहते थे, जिसे वह असभ्यता मानते थे। समय की पाबंदी को लेकर बहस आम बात है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये अक्सर समय के साथ हमारे जुड़ाव के अलग-अलग तरीके पर आधारित होते हैं। 



1950 के दशक में, मानवविज्ञानी एडवर्ड टी. हॉल ने समय प्रबंधन के प्रति अलग-अलग सांस्कृतिक नजरियों को दर्शाने के लिए ‘मोनोक्रोनिक’ और ‘पॉलीक्रोनिक’ शब्द गढ़े थे। उत्तरी यूरोप और अमेरिका में, जिन्हें डॉ. हॉल ने ‘मोनोक्रोनिक’ समाज कहा था, लोग समय-सीमा पर जोर देते थे और क्रमवार काम करते थे, एक काम पूरा करने के बाद ही अगला काम शुरू करते थे।


लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और पश्चिम एशिया में, जिसे  ‘पॉलीक्रोनिक’ समाज बताया, उन्होंने देखा कि लोग काम के बीच में ही मन बदल लेते थे और तय शेड्यूल पर टिके रहने को लेकर उतने दृढ़ नहीं थे। इसके अलावा लोगों की व्यक्तिगत समय-उपयोग की शैलियां भी काफी भिन्न होती हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि समय के साथ अपने रिश्ते के बारे में भी जागरूक होने से जीवन आसान हो सकता है और आपको अपने आस-पास के लोगों के साथ विवादों को सुलझाने में मदद मिल सकती है। 

ऑस्टिन स्थित टेक्सास विश्वविद्यालय की क्रोनोमिक्स विशेषज्ञ डॉना बैलार्ड कहती हैं, जो लोग अपने समय को पहले से तय कार्यों की एक शृंखला के रूप में प्रबंधित करते हैं, वे आमतौर पर समय के हिसाब से जीते हैं और काम के घंटों के दौरान, रिश्तों के ऊपर दायित्वों को प्राथमिकता देने के लिए तैयार रहते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए व्यवधान परेशान करने वाला होता है। पॉलीक्रोनिक लोग उन अनुभवों और रिश्तों को प्राथमिकता देते हैं, जो हमेशा पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों में ठीक से फिट नहीं बैठते। हर समय-शैली के अपने फायदे और नुकसान होते हैं। जो लोग आसानी से कामों के बीच बदलाव कर लेते हैं, उन्हें जिंदगी की उलझनों से निपटने में भी फायदा होता है।

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