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क्या कहता है गर्व का मनोविज्ञान: यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने बताया ‘सद्गुणों का ताज’; अहंकार अकेलेपन का साथी
Sun, 26 Jan 2025 07:11 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
नील मैकलैची, व्याख्याता, मनोविज्ञान लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी
नील मैकलैची, व्याख्याता, मनोविज्ञान लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Sun, 26 Jan 2025 07:11 AM IST
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विस्तार
यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने गर्व को ‘सद्गुणों का ताज’ बताया है। कुल मिलाकर यह एक भावना है, जिसका एहसास हमें तब होता है, जब हम कुछ बड़ा हासिल करते हैं या हमारे किसी करीबी ने कोई उपलब्धि हासिल की हो। ज्यादा उच्चस्तरीय गर्व देश की उपलब्धियों पर होता है। यह अमूमन हल्की मुस्कान, सिर उठाकर पीछे ले जाना, सीना चौड़ा करना, हाथ उठाना या कमर पर हाथ रखना या ऐसी ही कोई आसानी से पहचानी जाने वाली शारीरिक अभिव्यक्ति है। लेकिन कभी-कभी गर्व एक बुराई भी बन जाता है, जब यह अहंकार का रूप ले लेता है और हमें आत्मकेंद्रित बना देता है। तो, क्या हमें गर्व नहीं करना चाहिए?
आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, गर्व और अहंकार एक चीज बिल्कुल नहीं हैं। अहंकार हमें आत्ममुग्धता की ओर ले जाता है, जबकि गर्व आत्मविश्वास व पूर्णता के पथ पर ले जाता है। हालांकि चाहे आदमी अहंकारी हो या निरहंकारी, गर्व दोनों तरह के लोगों को हो सकता है। अहंकार का पता इससे चलता है कि व्यक्ति गर्व की अपनी भावना को दूसरों तक कैसे पहुंचाता है, और यही वह पल होता है, जब गर्व अहंकार में बदल सकता है। मेरा शोध यह कहता है कि जब लोग अपने गर्व को अहंकार के रूप में अभिव्यक्त करते हैं, वह दरअसल आत्ममुग्धता का चरम होता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर ही गौर करें, जिन पर आत्ममुग्धता के आरोप लगते हैं। कहा जाता है कि वह अपने विरोधियों पर निशाना साधते वक्त अहंकारी लगते हैं। लेकिन जब वही यह कहते हैं कि उन्हें अपनी पार्टी की जीत पर गर्व है, तो उसमें काफी हद तक विनम्रता ही झलकती है। गर्व के मूल में एक नैतिक भावना होती है, जो सद्भाव को प्रेरित करती है।
जीन नाकामुरा द्वारा प्रयोगशाला के बाहर किए गए अध्ययन के अनुसार, उच्च स्तर के गर्व की भावना समाज से जुड़ी होती है। जैसे सभी अपने देश पर गर्व करते हैं या अगर आपके किसी कार्य को सामाजिक सराहना मिलती है और इससे दूसरे लोग गौरवान्वित होते हैं, तब भी गर्व पैदा होता है। लेकिन उसके आगे की राह मुश्किल होती है। दरअसल, गर्व और अहंकार के बीच एक महीन रेखा होती है। जैसे-जब हम खेल में जीत दर्ज कर हाथ उठाकर खुशी का इजहार करते हैं, तो यह गर्व की श्रेणी में आएगा। दूसरी ओर, तर्क-वितर्क में जब हम किसी को पराजित कर उसे चिढ़ाते हुए विजयी होने का दंभ भरते हैं, तो यह अहंकार को इंगित करता है। गर्व लोगों को बांधता है, जबकि अहंकार अकेलेपन का साथी होता है।