फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   promises made to Kashmir should be fulfilled

नजरिया: कश्मीर से जो वादे किए वे पूरे हों, भारत गणराज्य का सम्मान देने के लिए करना होगा बहुत कुछ

Sun, 27 Jul 2025 07:00 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 27 Jul 2025 07:00 AM IST
विज्ञापन
सार
अब समय आ गया है कि जम्मू कश्मीर के लोगों से सरकार ने जो वादे किए हैं, वे पूरे हों। साथ ही हमें कश्मीर को भारत गणराज्य का उचित और सम्मानजनक हिस्सा महसूस कराने के लिए और भी बहुत कुछ करना होगा।
loader
promises made to Kashmir should be fulfilled
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : बासित जरगर

विस्तार

आज से दस साल पहले, अगस्त 2015 में मैंने कश्मीर घाटी का दौरा किया था। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों से बातें हुई थीं, उनमें से एक पत्रकार शुजात बुखारी भी थे। उनसे मेरी मुलाकात जनवरी, 2015 में दिल्ली में हुई थी और उन्होंने मुझे अपने गृह राज्य आने का आग्रह किया था। उसी साल कुछ समय बाद जब मैं श्रीनगर पहुंचा, तो हमारे बीच कश्मीर के अतीत और वर्तमान के बारे में लंबी और शिक्षाप्रद चर्चा हुई। जब मैं आने लगा तो बुखारी ने मजाक में कहा था कि भारत सरकार ने तो दशकों से कश्मीरियों से किए गए वादों को पूरा नहीं किया, लेकिन आपने अपना वादा निभाया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं।



जून 2018 में शुजात की निर्मम हत्या कर दी गई। इसके पीछे क्या मकसद था, यह आज तक पता नहीं चल पाया है। अगले साल भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार, एक पूर्ण राज्य को एक केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया और गृह मंत्रालय ने  उपराज्यपाल नियुक्त कर दिया।


अनुच्छेद 370 को निरस्त करना जम्मू कश्मीर के लोगों से किए गए सांविधानिक वादे के साथ विश्वासघात था। हालांकि यह पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं था, क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस नहीं, बल्कि भाजपा सत्ता में थी, जो लंबे समय से अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की वकालत करती रही थी। गौर करने वाली बात यह है कि अनुच्छेद को रद्द करते समय भारत सरकार ने संसद में वादा किया था कि वह जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करेगी। उस   वादे को किए हुए अब लगभग छह साल हो गए हैं  और अभी उसके पूरे होने के कोई संकेत दिखाई नहीं दे रहे हैं।

यह देरी नौकरशाही की उदासीनता का नहीं, बल्कि  मंशा का है। मोदी सरकार ने बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के लिए मात्र एक महीना का समय दिया और जम्मू कश्मीर, जिसकी आबादी बिहार की आबादी का दसवां हिस्सा है, वहां चुनाव कराने में उन्हें पांच साल लग गए। विधानसभा क्षेत्रों का पुनः आवंटन किया गया, जिससे मुस्लिम बहुल कश्मीर की कीमत पर हिंदू बहुल जम्मू को लाभ हुआ। कश्मीर में ही भाजपा ने नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के विकल्प के रूप में अन्य पार्टी को भी बढ़ावा देने की कोशिश की।

हालांकि भाजपा की चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित कर लाभ लेने के सभी प्रयास विफल हो गए। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। चुनाव से कई महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर के लिए राज्य का दर्जा बहाल करने का आह्वान किया था, लेकिन चुनाव के परिणाम आने के बाद जब भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा तो केंद्र ने ध्यान नहीं दिया।

नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला अब जम्मू कश्मीर के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं, लेकिन सभी प्रभावी निर्णय लेने की प्रक्रिया एक अनिर्वाचित उपराज्यपाल के हाथों में होने के कारण मुख्यमंत्री और उनका मंत्रिमंडल कुछ नहीं कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद से ही उमर अब्दुल्ला ने टकराव के बजाय सुलह का रास्ता चुना है। उन्होंने उपराज्यपाल की सीधी आलोचना से परहेज किया, जबकि केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा बहाल करने की विनम्रता से अपील की। हालांकि इस महीने की शुरुआत में अब्दुल्ला को लेफ्टिनेंट गवर्नर से सीधे भिड़ना पड़ा।
13 जुलाई, 1931 को महाराजा हरि सिंह के निरंकुश शासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लगभग इक्कीस कश्मीरियों को महाराजा की पुलिस ने मार डाला था। तभी से 13 जुलाई को घाटी में ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, ठीक उसी तरह जैसे 1948 में 30 जनवरी को महात्मा गांधी की हत्या   वाले दिन को भारत में ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

5 अगस्त, 2019 तक 13 जुलाई को जम्मू कश्मीर में सार्वजनिक अवकाश रहा करता था। राज्य के केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद इस दिन को छुट्टियों की सूची से हटा दिया गया। महाराजा हरि सिंह के जन्मदिन को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया गया। हालांकि पिछली 13 जुलाई को उपराज्यपाल ने सभी राजनीतिक विचारधाराओं वाले कश्मीरियों को इस अवसर पर किसी भी प्रकार का स्मरणोत्सव मनाने से रोक दिया था। मुख्यमंत्री ने उपराज्यपाल की अवहेलना करते हुए बाड़ फांदकर उस कब्रिस्तान में जाकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जहां उन्हें दफनाया गया था।

कब्रिस्तान जाने की अनुमति न मिलने पर, उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया- “13 जुलाई का नरसंहार हमारा जलियांवाला बाग है। जिन लोगों ने अपनी जान कुर्बान की, उन्होंने ऐसा अंग्रेजों के खिलाफ किया। कश्मीर पर ब्रिटिश सर्वोच्चता का शासन था। यह कितनी शर्म की बात है कि सच्चे नायक, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उन्हें आज केवल इसलिए खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है, क्योंकि वे मुसलमान थे।” हालांकि अब्दुल्ला का पहला वाक्य कुछ हद तक अतिशयोक्तिपूर्ण है,   लेकिन अन्य वाक्य सही मालूम पड़ते हैं। 1857 और 1947 के बीच सभी महाराजा और नवाब अंग्रेजों के चाटुकार थे।

जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा देने से इनकार करना वादे के साथ विश्वासघात है। 12 अगस्त, 2019 को रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने वादा किया था कि उनका समूह जम्मू कश्मीर में निवेश के लिए एक ‘विशेष कार्यबल’ का गठन करेगा, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। न ही अन्य भारतीय कंपनियों ने इस दिशा में कोई कदम उठाया है। जम्मू कश्मीर में औद्योगिक निवेश बहुत कम है, जिसके कारण सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशाली लोगों का पलायन लगातार बढ़ रहा है, जैसा कि एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे कश्मीर के गांवों, कस्बों और शहरों में, युवा पेशेवर, स्नातक और यहां तक कि स्कूली छात्र न केवल अपने घर से, बल्कि उम्मीद से भी धीरे-धीरे दूर हो रहे हैं।

भारतीय मीडिया भी इसके लिए जिम्मेदार है। विशेषकर कश्मीर के मामले में। एक चैनल ने पुंछ में सीमा पार से हुई गोलाबारी में मारे गए एक शांतिप्रिय भारतीय नागरिक को ‘पाकिस्तानी आतंकवादी’ के रूप में दिखाया। 5 अगस्त, 2019 के बाद से केंद्र सरकार ने जो कुछ भी किया है, उससे यह स्पष्ट हो गया है कि वे कश्मीरियों को विनम्र और आज्ञाकारी प्रजा बनाना चाहते हैं, स्वतंत्र नागरिक नहीं।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह से कई राज्यों में कश्मीरी छात्रों के साथ दुर्व्यवहार किया गया और उन कश्मीरियों के प्रति कृतज्ञता का अभाव भी दिखा, जिन्होंने पर्यटकों को बचाने और उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए जी-जान से काम किया, वह अनुचित था।

सोशल मीडिया पर कश्मीरियों को लगातार शैतान के रूप में दिखाया जाना भी उस मानसिकता को दर्शाता है। अब समय आ गया है कि हम जम्मू कश्मीर के लोगों से वहां की सरकारों द्वारा किए गए वादों को पूरा करना शुरू करें। साथ ही हमें कश्मीर को भारत गणराज्य का उचित और सम्मानजनक हिस्सा महसूस कराने के लिए और भी बहुत कुछ करना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed