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इतिहास का पैटर्न: आर्थिक संकट में लोकतांत्रिक व तानाशाह देशों का रवैया क्या, तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है?

Sun, 30 Aug 2026 08:24 AM IST
ज्योति भास्कर ब्रेट स्टीफंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स
ब्रेट स्टीफंस, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: ज्योति भास्कर Updated Sun, 30 Aug 2026 08:24 AM IST
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सार
आर्थिक संकट के समय, लोकतांत्रिक देश जोखिम लेने से बचते हैं, जबकि तानाशाह देश जोखिम उठाते हैं। इतिहास का यह पैटर्न याद रखने लायक है। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जैसे हालात थे, कुछ-कुछ वैसे ही हालात इस समय बन गए हैं।
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Patterns of History How democratic and authoritarian nations respond to economic crises World War III on brink
दुनियाभर में महाशक्तियों का टकराव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

1930 और 40 के दशक की तरह ही, टकराव के दायरे बढ़ गए हैं और आपस में मिल रहे हैं। तानाशाह शासकों का गुट पूरी तरह से सक्रिय सैन्य गठबंधन बन गया है। पश्चिम की हालत बहुत खराब है। अमेरिका सैन्य रूप से तैयार नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तेजी से और अचानक गिरावट आने की चेतावनी वाले संकेत हर जगह दिख रहे हैं।



वर्ष 2022 में रूस के यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमले के कुछ ही समय बाद, मैंने दिस इज हाउ वर्ल्ड वॉर थर्ड बिगिंस शीर्षक से एक कॉलम लिखा था। चार साल से ज्यादा समय बीतने के बाद, मैं सोचता हूं कि मेरी बातें कितनी सही साबित हुईं।


मेरी बात दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत पर आधारित थी। यह युद्ध सिर्फ एक सितंबर, 1939 को जर्मनी के पोलैंड पर हमले से शुरू नहीं हुआ था, बल्कि कई क्षेत्रीय लड़ाइयों और संकटों का नतीजा था, जिसकी शुरुआत 1931 में जापान के मंचूरिया पर हमले से हुई थी। धीरे-धीरे ये सब मिलकर एक बड़े वैश्विक संघर्ष में बदल गए। तानाशाह देशों की मिलती-जुलती महत्वाकांक्षाओं और लोकतांत्रिक देशों में आपसी मतभेद और संकोच की वजह से जो हालात बने, वे एक बड़ी तबाही का कारण बने। सैन्य तकनीक और युद्ध की रणनीतियों में आए बदलावों ने तानाशाह देशों को हमले की कार्रवाई में शुरुआती बढ़त दिला दी। उन्हें एक और फायदा यह भी मिला कि वे क्रूरता व तकलीफ देने तथा सहने के लिए तैयार थे, जबकि उनके विरोधी शुरुआत में ऐसा करने से हिचकिचा रहे थे। वर्ष 2022 में, मैंने कुछ ऐसा ही होते देखा: दशकों तक पश्चिमी देशों द्वारा व्लादिमीर पुतिन को खुश करने की कोशिशों ने रूस के इस ताकतवर नेता को यह एहसास दिला दिया था कि वह कुछ भी कर सकते हैं और बच निकलेंगे। उत्तर कोरिया, ईरान और खासकर चीन के साथ उनके बढ़ते रिश्तों ने उनका आत्मविश्वास और बढ़ा दिया। ठीक छह महीने पहले अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के दौरान अमेरिकी कमजोरी ने भी उन्हें ऐसा ही महसूस कराया। लेकिन, जैसा कि मुझे डर था, यूक्रेन 1940 का फ्रांस साबित नहीं हुआ। यह ब्रिटेन जैसा था, जो लड़ने के लिए तैयार था-जैसा कि चर्चिल ने उस मई में कहा था, ‘चाहे रास्ता कितना भी लंबा और मुश्किल क्यों न हो।’

बाइडन प्रशासन ने, कीव को रूस के खिलाफ युद्ध की इजाजत देने में अपने संकोच के बावजूद, कम से कम यह पक्का करने में मदद की कि यूक्रेन हारे नहीं। यूक्रेन ने ऐसे उपकरण और रणनीतियां अपनाई हैं, जिनसे आखिरकार इस बात पर पुनर्विचार शुरू हो गया है कि भविष्य में युद्ध कैसे लड़े जाएंगे। यह अच्छी खबर है। मगर बुरी खबरें इससे कहीं ज्यादा हैं। सबसे पहले, 1930 और 40 के दशक की तरह ही, टकराव के दायरे बढ़ गए हैं और आपस में मिल रहे हैं। ऐसा लगता है कि युद्ध के मैदान में मिली हार से पुतिन का जोखिम लेने का उत्साह कम नहीं हुआ है; वह मोल्दोवा, पोलैंड व जर्मनी जैसे देशों के खिलाफ खुलेआम हमले और धमकियां देकर अपना अभियान बढ़ा रहे हैं, जबकि उनके राजनीतिक सहयोगी बार-बार यूरोप पर सीधे हमले और यूक्रेन के खिलाफ परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की मांग कर रहे हैं।

हाल ही में, यूक्रेन ने रूस को ईरान से होने वाली सैन्य आपूर्ति में रुकावट डालने के लिए कैस्पियन सागर में लंबी दूरी के हमले किए हैं। पश्चिम एशिया में मिसाइल इंटरसेप्टर के इस्तेमाल का मतलब है कि अब यूक्रेन के लिए बहुत कम इंटरसेप्टर ही बचेंगे। दूसरी बात, तानाशाह शासकों का गुट पूरी तरह से सक्रिय सैन्य गठबंधन बन गया है। रूस, उत्तर कोरिया को अपनी सेना को आधुनिक बनाने में मदद कर रहा है। बदले में, उत्तर कोरिया ने लाखों आर्टिलरी राउंड भेजे हैं और खबर है कि अब वह यूक्रेन में रूस की तरफ से लड़ने के लिए हजारों और सैनिक भेजने को भी तैयार है। रूस ने ईरान को मध्य पूर्व में अमेरिकी बेस और जहाजों पर हमला करने के लिए जरूरी लक्ष्य से जुड़ी खुफिया जानकारी दी है। ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो बीजिंग रूस के ताकतवर पैसिफिक सबमरीन बेड़े की मदद लेकर मॉस्को से अपने पुराने एहसान का बदला चुका सकता है। तीसरी बात, पश्चिम की हालत बहुत खराब है। ट्रंप सहयोगियों की कमजोरी की शिकायत करते हैं। वहीं सहयोगी ट्रंप की दादागीरी, मनमौजीपन, अपरिपक्वता, झूठ बोलने की आदत और अयोग्यता की शिकायत करते हैं। दोनों ही पक्ष सही हैं। कनाडा पर हाल ही में लगाया गया टैरिफ इसका एक उदाहरण है। फिर भी, यह तथ्य नहीं बदलता कि व्यापार पर निर्भर कनाडा, जिसकी समुद्री सीमा दुनिया में सबसे लंबी है, के पास बेहद सीमित नौसैनिक क्षमता है। चीन के साथ उसकी ‘नई रणनीतिक साझेदारी’ भी सवालों के घेरे में है, जब तक कि प्रधानमंत्री मार्क कार्नी यह न मानते हों कि ट्रंप की बयानबाजी, चीन की सुनियोजित रणनीति से कनाडा और पश्चिमी दुनिया के लिए बड़ा खतरा है। चौथी बात, अमेरिका सैन्य रूप से तैयार नहीं है। ईरान के खिलाफ युद्ध से न सिर्फ हथियारों की कमी का पता चला, बल्कि यह भी साफ हुआ कि अमेरिका सैनिकों की मौत और आर्थिक नुकसान को लेकर कितना संवेदनशील है। यूक्रेन युद्ध ने यह दिखा दिया है कि एआई वाले ड्रोन युद्ध के आने से अमेरिका के सबसे आधुनिक सैन्य उपकरण भी अब पुराने पड़ रहे हैं। द टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बाइडन प्रशासन के दौरान अमेरिका व उसके सहयोगियों ने कीव को जो टैंक दिए थे, वे अब ज्यादातर बेकार पड़े हैं, जंगलों में छिपे हुए हैं और उन पर जाले लग रहे हैं।

फिर भी, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पिछले हफ्ते सेना की एक ड्रोन यूनिट को धीरे-धीरे बंद करने का फैसला किया, क्योंकि इसे उन जनरलों ने शुरू किया था, जिन्हें वह पसंद नहीं करते थे। लंबे समय तक तैनात रहने के दौरान अमेरिकी सबमरीन अब्राहम लिंकन को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा, वह राष्ट्रीय शर्म की बात है। लेकिन इससे बेड़े के ऐतिहासिक रूप से छोटे आकार और कमजोर इंडस्ट्रियल बेस की ओर ध्यान जाना चाहिए, जिसे जहाज बनाने और उनकी देखभाल करने में जूझना पड़ता है। डेमोक्रेट्स का रक्षा बजट बिल को रोकना भी हालात को बेहतर नहीं बना रहा है। पांचवीं बात, हो सकता है कि अमेरिका आर्थिक संकट के कगार पर हो। 1930 के दशक और आज के समय में एक बड़ा फर्क यह है कि उस समय की तरह हम अभी दुनियाभर में फैली मंदी के दौर से नहीं गुजर रहे हैं, लेकिन तेजी से और अचानक गिरावट आने की चेतावनी वाले संकेत हर जगह दिख रहे हैं। क्या होगा अगर एआई का बूम (तेजी) उसी तरह कमजोर पड़ने लगे, जैसे सदी की शुरुआत में डॉट-कॉम बूम के साथ हुआ था? या अगर जापान में मुद्रा संकट की वजह से उसे अपने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बेचने पड़ें?

मशहूर निवेशक स्टेनली ड्रकनमिलर ने हाल ही में द वॉल स्ट्रीट जर्नल  में चेतावनी दी कि ट्रेजरी डिपार्टमेंट के बॉन्ड बायबैक का फेल होना लगभग तय है: आखिरकार, 400 खरब डॉलर के राष्ट्रीय कर्ज की कीमत बहुत ज्यादा ब्याज दरों के रूप में चुकानी होगी। साथ ही, इससे अर्थव्यवस्था के हर उस क्षेत्र के लिए जोखिम पैदा होगा, जो लंबे समय से सस्ते क्रेडिट पर निर्भर रहा है। अमेरिका में गहरी मंदी या दुनियाभर में आर्थिक घबराहट से ऊपर बताई गई हर स्थिति और भी खराब हो जाएगी। आर्थिक संकट के समय, लोकतंत्र वाले देश अक्सर जोखिम लेने से बचते हैं, जबकि तानाशाही वाले देश जोखिम उठाने लगते हैं। इतिहास का यह पैटर्न याद रखने लायक है, क्योंकि हम बिना पूरी तरह समझे ही आने वाले बड़े संकट की ओर बढ़ रहे हैं।

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