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भरोसे का ताला, जो खोला नहीं गया

Fri, 03 Jul 2020 04:28 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 03 Jul 2020 04:28 AM IST
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pakistan : Lock of trust that was not opened
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (फाइल फोटो) - फोटो : Twitter

विभाजन के समय जब हिंदुओं ने खैबर पख्तुनख्वा छोड़ा, तब सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान ने सख्त निर्देश दिया था कि इन सभी हिंदुओं को जाने के लिए एक सुरक्षित मार्ग प्रदान किया जाना चाहिए और इनका बाल भी बांका नहीं होना चाहिए।


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इतिहास गवाह है कि पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्रों से जाने वाले सभी हिंदू सुरक्षित ढंग से पंजाब पहुंच गए। इसके बाद जब हिंदू और मुस्लिम पैदल और ट्रेन से सीमा पार कर रहे थे, दुर्भाग्य से भीषण नरसंहार हुआ। तब से लेकर आज तक न केवल हिंदुओं, बल्कि खैबर पख्तुनख्वा में रहने वाले सिखों और दूसरे अल्पसंख्यकों ने मुझे बताया कि वे शांतिपूर्ण ढंग से रहते हैं।

स्वात में रहने वाले  अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों ने मुझे बताया कि वे और उनके परिवार के लोग तब भी सुरक्षित रहे, जब तालिबान ने इस क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया था। ऐसा पेशावर के निकट मेरे गांव पीर पाई में भी हुआ था, जहां मेरी बुआ और उनकी एक हिंदू स्कूली दोस्त ने एक दूसरे को अलविदा कहा था।

यह वही गांव है, जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मेजबानी की थी। इस गांव के एक बुजुर्ग चाचा ने ही उन्हें अफगानिस्तान पहुंचाया था। एक खास ताला था, जिसे केवल दो चाबियों से खोला जा सकता था। मेरी बुआ और उनकी हिंदू दोस्त ने ताला बंद करने के बाद वादा किया कि वे एक दिन फिर मिलेंगी और ताला खोलेंगी। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

मेरी बुआ दुर्भाग्य से बहुत पहले गुजर गईं और सीमा पार से उनकी हिंदू दोस्त की भी कोई खबर नहीं मिली। वह ताला अब भी खोले जाने के लिए दो चाबियों का इंतजार कर रहा है। लेकिन यहां इस्लामाबाद से एक खबर है, जो यहां के छोटे से हिंदू समुदाय के लिए अच्छी खबर साबित हुई, जब उन्हें पता चला कि उनका अपना मंदिर होगा।

यह एक हजार हिंदुओं और उनके परिजनों का एक समूह है। उनमें से कुछ यहां के लोकप्रिय दुकानदार हैं, जिनकी इस्लामाबाद के सबसे आधुनिक बाजारों में दुकानें हैं। जब मैं इस्लामाबाद के पॉश इलाके में कालीन बेचने वाले कुछ लोगों से मिली, तो उन्हें शिक्षित, बेहद विनम्र और हर कालीन के बारे में जानकारी देने के लिए उत्सुक पाया।

हालांकि पंजाब प्रांत के रावलपिंडी में हिंदू मंदिर हैं, लेकिन इस्लामाबाद के हिंदू लंबे समय से अपने लिए मंदिर की मांग कर रहे थे। इस्लामाबाद के बहुचर्चित सैदपुर गांव में एक धर्मशाला है, जो सैकड़ों साल पहले बनाई गई थी। यह अब एक पर्यटक स्थल है, जो हिंदुओं और गैर हिंदुओं को अपनी ऐतिहासिक सुंदरता के लिए आकर्षित करता है।

प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का विशेष ध्यान रखा है और कोई भी व्यक्ति इस धीमे बदलाव को देख सकता है, क्योंकि अल्पसंख्यकों की मांग को गंभीरता से लिया जाता है और करतारपुर कॉरिडोर जैसी परियोजना को देखने के लिए दुनिया भर के सिख पाकिस्तान आते हैं।

इमरान खान ने कृष्ण मंदिर के निर्माण के लिए भी एक भूखंड आवंटित किया है। मंदिर का उद्घाटन हाल ही में इस्लामाबाद के बाहरी इलाके के मौजूदा सांसद लाल माल्ही द्वारा किया गया। एक टिप्पणीकार ने कहा कि यह एक स्वागत योग्य कदम था, क्योंकि इस्लामाबाद एक आदर्श पर्यटन गलियारा है, जो ऐतिहासिक तक्षशिला क्षेत्र को मुर्री से जोड़ता है।

इस बात के दमदार सुबूत हैं कि इसके पहाड़ों पर कभी बौद्ध और हिंदू धर्मावलंबी रहते थे। ये सहिष्णुता, खुशमिजाजी और समाज के खुलेपन के प्रतीक हैं। सत्तर साल से ज्यादा समय के बाद भी पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत बलुचिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में आपको गलियों में मिट्टी की दुकानें मिलेंगी।

ये बंद दुकानें एक छोटे से शहर के असाधारण हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के स्मारकों के रूप में समय की कसौटी पर खड़ी हैं। मेखतर के एक हजार से अधिक पश्तून परिवार एक मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग के पास रहते हैं। मेखतर कभी एक छोटा-सा शहर था, जहां हिंदू और इस्लाम, दोनों धर्मों के लोग साथ-साथ रहते थे।

मेखतर इन दिनों सुर्खियों में है और विदेशी मीडिया भी बलूचिस्तान के इस छोटे से अनजाने इलाके के इतिहास को फिर से याद करने में दिलचस्पी ले रहा है। अगर आज कोई इसे देखने जाता है, तो उसे उन हिंदू परिवारों के बारे में बताया जाता है, जिन्हें विभाजन के दौरान इस जगह को छोड़कर सीमा पार जयपुर जाना पड़ा था।

ये पश्तून हिंदू थे, जो धाराप्रवाह पश्तो बोलते थे। ये हिंदू जब यह जगह छोड़कर जाने लगे, तब उन्होंने अन्य लोगों की तरह यह सोचकर अपनी दुकानों में ताला लगा दिया कि एक दिन वे लौटकर पाकिस्तान आएंगे। लेकिन जैसा कि इतिहास ने हमें दिखाया है कि कोई भी पक्ष अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त करने में सक्षम नहीं था।

मेखतर के हिंदुओं ने अपने घर व दुकानों की चाबी अपने मुस्लिम दोस्तों को सौंप दी थी। लेकिन आज अगर कोई मेखतर जाए, तो वह देख सकता है कि दुकानों सहित वे सभी संपत्तियां आज भी बंद हैं। हिंदू संपत्तियों की रक्षा के लिए ये चाबियां पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित की जाती हैं।

हिंदुओं की इन संपत्तियों पर किसी दूसरे समुदाय द्वारा दावा करने को परंपरा के खिलाफ माना गया है। इन्हें वैसे ही संरक्षित रखा गया है, जिस तरह छोड़ा गया था। सत्तर साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया, लेकिन इतिहास इस बात का सुबूत है कि इस उपमहाद्वीप के लोगों में शांति, प्रेम और सहिष्णुता बरकरार है।

हमारे क्षेत्र और हमारे दोनों देशों में नफरत की कहानियां आम हैं, लेकिन जब कोई इन उदाहरणों के जरिये इस उपमहाद्वीप के मिजाज को पढ़ता है, तो उसे यह जानकर खुशी होती है कि हमारे बीच इंसानियत अब भी मौजूद है।

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