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परिदृश्य: पाकिस्तान में संविधान की स्वर्ण जयंती पर सियासी संकट, केंद्र में सर्वोच्च न्यायपालिका
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पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट
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विस्तार
जैसा कि वे कहते हैं-देर आए दुरुस्त आए। हाल ही में पाकिस्तान के हिंदू समुदाय के लिए एक अच्छी खबर आई, जिसकी वे वर्षों से मांग कर रहे थे। इस्लामाबाद प्रशासन ने 2017 के हिंदू विवाह अधिनियम के नियमों और प्रक्रियाओं की घोषणा करते हुए एक अधिसूचना जारी की है। यह एक ऐसा कानून है, जो पाकिस्तानी हिंदू को अपनी शादी और सभी प्रासंगिक अनुष्ठानों का जश्न मनाने का अधिकार देता है, जो सार्वजनिक रूप से विवाह समारोह से जुड़े हैं। यह एक बुनियादी स्वतंत्रता है, जिसका हर किसी को आनंद लेना चाहिए। यह दुखद है कि इस सांविधानिक अधिकार को मूर्त रूप देने में इतना समय लगा।
हालांकि खुद हिंदू समुदाय और सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह कानून पूरे देश में, विशेष रूप से सिंध में लागू हो, जहां सबसे अधिक संख्या में हिंदू रहते हैं। कानून अब हिंदू जोड़े को विवाह प्रमाणपत्र प्राप्त करने का अधिकार देता है, ताकि विवाह को पंजीकृत किया जा सके और वैध समझा जाए।
पाकिस्तानी महिलाओं के लिए यह घोषणा भी अच्छी खबर है कि ऑस्कर विजेता निर्देशक शरमीन ओबैद-चिनॉय को ‘स्टार वार्स’ फ्रेंचाइजी में फिल्म निर्देशित करने के लिए नामित किया गया है, जो न सिर्फ यह उपलब्धि हासिल करने वाली पहली महिला हैं, बल्कि पहली अश्वेत भी हैं। वह पहले ही डिज्नी टीवी शो के कई एपिसोड और कई वृत्तचित्र निर्देशित कर चुकी हैं। लेकिन जैसा कि हम इस क्षेत्र में एक अन्य पाकिस्तानी महिला और उनकी अनेक बहनों की सफलता का जश्न मना रहे हैं, मैं अफगानिस्तान की बहनों के बारे में सोचने से खुद को नहीं रोक पा रही हूं। क्रूर तालिबानी शासन द्वारा दिन-ब-दिन उनका दमन किया जा रहा है और हालांकि दुनिया के हर देश में आवाज उठाई गई है, लेकिन इससे तालिबान को कोई फर्क नहीं पड़ता है, जिन्होंने इस सप्ताह उनके पार्कों और रेस्तरांओं में जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया।
पाकिस्तान इस हफ्ते अपने संविधान की स्वर्ण जयंती मनाने में व्यस्त है, जो सभी राजनीतिक दलों द्वारा आम सहमति का दस्तावेज है, और जो लंबे समय तक सैन्य शासन एवं स्वयं सांसदों द्वारा इसे बार-बार संशोधित करने के बावजूद बरकरार है। लेकिन एक बहुत ही कमजोर लोकतंत्र वाले देश में यही एकमात्र दस्तावेज है, जो संघ और प्रांतों की संरचना को एक साथ जोड़े हुए है। हालांकि ये उत्सव ऐसे समय में हो रहे हैं, जब सबसे बड़े सांविधानिक संकटों में से एक महीने भर से ज्यादा समय से सुर्खियों में है।
परंपरागत रूप से पाकिस्तान में राजनीतिक या सांविधानिक संकट में हमेशा सुरक्षा प्रतिष्ठान शामिल रहता है, क्योंकि वह हमेशा राजनीतिक दखल देने और अपनी शक्ति का दुररुपयोग करने की कोशिश करता है और वह भी व्यापक राष्ट्रीय हित के नाम पर। लेकिन इस बार सांविधानिक संकट शाहबाज शरीफ सरकार और मुल्क के प्रधान न्यायाधीश उमर अता बंदियाल के बीच टकराव को लेकर है। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ के कई न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय में 'वन मैन शो' चलाने और अनगिनत स्वतः संज्ञान नोटिस द्वारा न्यायपालिका के अनावश्यक राजनीतिकरण करने के लिए प्रधान न्यायाधीश की आलोचना की है।
सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच टकराव का मुख्य बिंदु यह है कि सरकार अलग चुनाव नहीं कराना चाहती है, बल्कि देश में अक्तूबर में आम चुनाव कराना चाहती है। इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ की पंजाब प्रांत में सरकार है। पंजाब और खैबर पख्तुनख्वा सरकार ने कुछ समय पहले दोनों प्रांतों की विधानसभाएं भंग कर दी। और अब संविधान के अनुसार 90 दिनों के भीतर चुनाव होने हैं।
मामले-दर-मामले प्रधान न्यायाधीश का पक्षपात देखा जा सकता है, जहां वह पीटीआई प्रमुख इमरान खान को बार-बार राहत दे रहे हैं। इमरान खान के खिलाफ दर्जनों मामले दर्ज हैं, लेकिन उनमें से हरेक मामले में उन्हें जमानत मिल जाती है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। इसके अलावा, स्वत: संज्ञान लेकर कार्रवाई करके और पंजाब व खैबर पख्तूनख्वा में चुनाव कराने का आह्वान कर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टतः इमरान खान का समर्थन किया है।
सदन के नेता शाहबाज शरीफ इस मुद्दे को संसद में ले गए हैं और कहा है कि वर्तमान में नकदी की तंगी वाला कोई भी देश अलग चुनाव कराने का जोखिम नहीं उठा सकता है। सुरक्षा बलों ने भी कहा है कि वे आतंकवाद विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में व्यस्त हैं और अपने अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी के लिए नहीं छोड़ सकते। संसद ने एक प्रस्ताव के जरिये इस पर सहमति जताई और सर्वोच्च न्यायालय को संदेश दिया कि वह राजनीति में शामिल न हों और यह तय करना केवल मुख्य चुनाव आयुक्त का काम है कि चुनाव अलग से कराए जा सकते हैं या नहीं।
इस संदर्भ में राजनीतिक विश्लेषक एवं लेखक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'निश्चित रूप से हमारे सांविधानिक इतिहास के 50 साल जश्न मनाने लायक हैं, लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है संविधान का वास्तविक रूप से काम करना। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। मुल्क अब भी एक रास्ता तलाशने के लिए संघर्ष कर रहा है। शक्ति संघर्ष ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पहले की तुलना में बहुत कमजोर कर दिया है, जिससे संविधान के एक बार फिर पटरी से उतरने की आशंका बढ़ गई है।'
बेहद वैध आलोचना का एक और बिंदु यह है कि जब प्रधान न्यायाधीश किसी राजनीतिक मामले की सुनवाई के लिए पीठ का गठन करते हैं, तो अपने बाद के सबसे वरिष्ठतम न्यायाधीश को उसमें शामिल करने से बचते हैं, जो सितंबर में पदभार संभालेंगे, यानी जस्टिस फैज ईसा। प्रधान न्यायाधीश उन न्यायाधीशों को पीठ में शामिल करते हैं, जो पंजाब से हैं, जबकि छोटे प्रांतों के न्यायाधीशों को उससे बाहर रखते हैं।
पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति को इन शब्दों में बखूबी अभिव्यक्त किया गया है- 'सुप्रीम कोर्ट में प्रतिदिन होने वाले नाटक ने न केवल राज्य के तीसरे स्तंभ को विधायी और कार्यकारी अंगों के साथ सीधे टकराव की स्थिति में ला दिया है, बल्कि देश में व्याप्त अनिश्चितता और भ्रम को भी बढ़ा दिया है। अगर कुछ है, तो वह कि शेष समाज की तरह सर्वोच्च न्यायपालिका भी राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत और बंटी हुई है।'