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सियासत: एक राष्ट्र, एक चुनाव, एक विपक्ष, कैसे वास्तविकता में बदलेगा पीएम मोदी को बाहर करने का नारा
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इंडिया गठबंधन की बैठक में विपक्ष के नेता।
- फोटो :
PTI
विस्तार
विपक्ष की पार्टियों के रवैये का विश्लेषण बेहद दिलचस्प और प्रासंगिक है। विपक्षी राजनेता अक्सर यह मानते हैं कि सत्ता में लौटना हवाई अड्डों पर मुसाफिरों का अपने वे सामान वापस पाने जैसा है, जो कई बार मूविंग बेल्ट पर बहुत तेजी से उनके पास से निकल जाते हैं। विपक्षी नेता आश्वस्त रहते हैं कि सत्ताधारी पार्टी कोई गलती जरूर करेगी और सत्ता उन्हें मिल जाएगी, जैसे मुसाफिरों का सामान दोबारा मूविंग बेल्ट पर आ जाता है। इस भ्रामक सोच ने अनेक राजनीतिक पार्टियों को सत्ता की विपरीत दिशा में बनाए रखा है।
अपना अस्तित्व खो देने का डर राजनीति में बहुत ज्यादा है। पटना में हुई बैठक के बाद से विपक्षी पार्टियां अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए इकट्ठा हो रही हैं। पिछले सप्ताह मोदी सरकार ने विपक्ष की आशंका बढ़ाते हुए 18 सितंबर से संसद का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा की, साथ में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में एक कमेटी गठित करने का भी एलान किया, जो एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव आयोजित कराने की संभावना पर विचार करेगी।
एक साथ चुनाव कराने का तात्कालिक रास्ता तो राजनीतिक ही हो सकता है। संभव है कि जिन राज्यों में इस वर्ष और अगले साल के प्रारंभ में चुनाव होने वाले हैं, वहां जल्दी चुनाव कराए जाएं। यह भी संभव है कि भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा भंग कर दी जाए और वहां चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हों। दूसरी तरफ इसका विधायी रास्ता कई स्तरीय और जटिल है, क्योंकि इसमें अनेक मौजूदा कानूनों की समीक्षा की जरूरत पड़ेगी।
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83 (2) तथा अनुच्छेद 171 (1) में, जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 और जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में तथा अविश्वास प्रस्ताव और दलबदल कानून की प्रक्रियाओं में संशोधन करना होगा। कमेटी को इन सबका विश्लेषण करने और संभावित समाधान प्रस्तावित करने के लिए कहा गया है। विपक्ष के फौरी आक्रोश का कारण वस्तुत: यह अनुमान है कि लोकसभा का चुनाव समय से पूर्व भी हो सकता है।
विगत शुक्रवार को विपक्ष ने एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के 'एक देश-एक चुनाव' अभियान का मुकाबला एकजुट विपक्ष के नारे के साथ किया। 28 विपक्षी दलों ने एक स्वर में संकल्प लिया, 'हम 'इंडिया' के दल यह संकल्प लेते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव एक साथ मिलकर लड़ेंगे।' इन दलों ने यह भी संकल्प लिया कि विभिन्न मुद्दों पर पूरे देश में एक साथ रैलियां करेंगे तथा संवादों, मीडिया रणनीतियों और चुनाव अभियानों के दौरान विभिन्न भाषाओं में थीम तैयार करने के मामले में एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगे।
विपक्ष का यह गठबंधन राजनीति के अंकगणित के आधार पर बना है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें जीती थी और उसका वोट प्रतिशत 37. 76 था। पिछले लोकसभा चुनाव में 142 सीटें जीतने का दावा करने वाले विपक्षी गठबंधन का कहना है कि भाजपा को तब विपक्ष के बिखरे रहने का लाभ मिला था। इस गठबंधन की सोच यह है कि अगर भाजपा से लड़ने वाली पार्टियां एक विपक्ष के तौर पर एकजुट होकर लड़ें, तो उनका वोट शेयर भी बढ़ेगा और सीटें भी बढ़ेंगी।
विपक्षी एकता की बात सिद्धांतत: सही लगती है। लेकिन अगर भाजपा को चुनाव में 50 फीसदी से अधिक वोट मिलते हैं, तो विपक्षी एकता का शिराजा बिखर जाएगा। सच यह है कि चुनावी मोर्चे पर 'इंडिया' के सामने विकट चुनौती है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने जो 282 सीटें जीती थी, उनमें से 136 में उसे 50 फीसदी से अधिक वोट मिले थे। ऐसे ही, 2019 में भाजपा ने 303 सीटें जीती, जिनमें से 224 सीटों पर उसे 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे। पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन को बेअसर कर 80 में से 64 सीटें जीती थी, और इनमें से 50 सीटों पर उसे 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे।
विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व पर बात तो बहुत हुई, लेकिन इस पर सर्वसम्मति नहीं है। नेतृत्व तो मायने रखता ही है, जमीनी स्तर पर किया जाने वाला समझौता ज्यादा महत्व रखता है। सीटें साझा करने का समझौता बेहद जटिल है, इसका पता मुंबई में भी चला, जहां कहा गया कि 'समझौता जितनी जल्दी संभव हो, किया जाएगा।' पश्चिम बंगाल में समझौता कैसे होगा, जहां वाम मोर्चे और कांग्रेस की लड़ाई तृणमूल से है? केरल में क्या होगा, जहां वाम मोर्चे और कांग्रेस के बीच लड़ाई है? दिल्ली और पंजाब में क्या करेंगे, जहां आप ने कांग्रेस को विस्थापित कर दिया है? वस्तुत: आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। पिछले लोकसभा चुनाव में 186 सीटों पर भाजपा से उसका सीधा मुकाबला था, जिसने 170 सीटें जीती थी।
यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा पिछले कुछ दशकों में देखी गई सबसे मजबूत पार्टी है। यह भी सच है कि क्षेत्रीय पार्टियों को परास्त करने और अनेक राज्यों में अपनी पैठ बनाने में भाजपा को संघर्ष करना पड़ा है। बीती सदी के 60 के दशक के अंत में कहा जाता था कि दिल्ली से कलकत्ता जाते हुए कहीं भी कांग्रेस की सरकार के दर्शन नहीं होंगे। आज का विपक्ष इसे इस तरह से कह सकता है कि कोई तिरूवनंतपुरम से कोलकाता तक जाए, तो रास्ते में उसे भाजपा की सरकार किसी राज्य में नहीं दिखेगी।
अलबत्ता 'इंडिया' गठबंधन की सफलता के रास्ते की बड़ी चुनौती यह है कि वह मोदी को बाहर करने के नारे को वास्तविकता में कैसे बदले। गठबंधन के सदस्य मुखर होकर यह तो कह रहे हैं कि इस बार भाजपा जीत नहीं पाएगी। लेकिन वे यह नहीं कह रहे कि ऐसा होगा कैसे। मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, कृषि समस्या, जाति जनगणना, स्त्री सशक्तीकरण और आर्थिक विकास पर सिर्फ सवाल करना सही नहीं है। गठबंधन को इन मुद्दों पर ऐसा वैकल्पिक समाधान भी पेश करना होगा, जो मतदाताओं को आकर्षित कर सके। भारतीय लोकतंत्र प्रतिस्पर्धी विचारों का आकांक्षी है। युवा भारत बदलाव चाहता है। युवा मतदाता पहले की तरह आगे भी आलसी राजनीति को खारिज कर देंगे, और ऐसे राजनेता सत्ता की उल्टी दिशा में खड़े मिलेंगे।