मुफ्ती के रास्ते पर
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कई हफ्ते की ऊहापोह के बाद पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद और भाजपा ने जब 2015 में साझा सरकार बनाने का निश्चय किया था, तब भारत के व्यापक हित में इसका कोई विकल्प नहीं था। मुफ्ती के इंतकाल के बाद उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती ने लंबी झिझक के बाद पिता के फैसले को जारी रखने की हिम्मत जुटाई, तब भी कोई रास्ता नहीं था। रसाना कांड के नतीजतन सरकार गिर जाती, तो अब भी शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने की भरोसेमंद तजबीज नहीं थी। राष्ट्रपति शासन लगता। इतिहास गवाह है, कश्मीर में जब कभी प्रतिनिधि सरकार की जगह नौकरशाही की हुकूमत कायम हुई, हालत बद से बदतर हुई। उम्मीदों पर खरा न उतरने वाला जनप्रतिनिधियों का शासन अपेक्षाकृत बेहतर इसलिए होता है कि वह कम से कम आम आदमी की भावनाओं से सीधे जुड़ा हुआ और जवाबदेह भी होता है।
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पीडीपी और भाजपा के नेतृत्व ने दलगत राजनीति से ऊपर उठते हुए संयुक्त सरकार के जीवन में पैदा हुए अभूतपूर्व संकट को देर से सही, कुशलतापूर्वक दूर कर लिया। महबूबा ने अपनी पार्टी के अंदर उठ रहे बगावत के शोलों को ठंडा करने में कामयाबी पाई। हाथ से बाहर हो रही स्थिति का अंदाजा महबूबा के ही भाई, पर्यटन मंत्री तसद्दुक के तल्ख बयान से लगाया जा सकता है। रसाना कांड और उसके बाद बने माहौल पर तसद्दुक की टिप्पणी थी कि पीडीपी और भाजपा एक बड़े पाप में भागीदार हैं। राज्य के अलगाववादियों को इस वक्तव्य से जरूर बल मिला होगा। भाजपा महासचिव राम माधव ने 2015 की तरह इस बार भी परिपक्व राजनीति का परिचय देते हुए 14 अप्रैल को मुसीबत दूर होने के दो दिन पहले यह कहकर महबूबा का मार्ग सुगम किया कि रसाना के अभियुक्तों को भाजपा द्वारा बचाने का सवाल ही नहीं उठता और मसले को सांप्रदायिक रंग दिया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह जम्मू में पार्टी के एक बड़े वर्ग की घोषित अवस्थिति का स्पष्ट नकार था।
सरकार बच गई है, मगर बीमारी के जानलेवा जरासीम के खत्म हो जाने की गलतफहमी शायद ही किसी को हो। रोग की जड़ तक जाने के लिए रसाना दुष्कर्म-हत्या केस की खास-खास बातों पर गौर जरूरी है। पिछले 12 जनवरी को एक व्यक्ति ने कठुआ के हीरानगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई कि उनकी आठ साल की बेटी 10 जनवरी से गायब है। 17 जनवरी को पुलिस ने बालिका का शव बरामद किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि नींद की दवा का गहरा डोज देने के बाद उसके साथ गैंगरेप किया गया और फिर हत्या कर दी गई। 22 जनवरी को केस जम्मू-कश्मीर पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंपा गया। क्राइम ब्रांच ने दो स्पेशल पुलिस अफसरों, दीपक खजूरिया और सुरेंद्र कुमार सहित अन्य छह को प्रथमदृष्टया दोषी पाया। इनमें मुजफ्फरनगर के एक कॉलेज का छात्र विशाल जंगोत्रा भी है। नाम सार्वजनिक होते ही माहौल गरमाने लगा। जम्मू के वकीलों ने नौ अप्रैल को क्राइम ब्रांच को कठुआ के मुख्य जुडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में चार्जशीट दायर करने से रोका, पर अंततः वह दायर हो गई।
एक विकसित और स्वस्थ लोकतंत्र में सिर्फ नागरिक और नागरिक अधिकार सर्वोपरि होते हैं और पीड़ित व अभियुक्त के धर्म को नहीं देखा जाता। लेकिन दुनिया के 'सबसे बड़े लोकतंत्र' में कठुआ की घटना ने तुरंत सांप्रदायिक रंग ले लिया। क्राइम ब्रांच के निष्कर्षों को रद्द कराने के लिए रातोंरात 'हिंदू एकता मंच' नामक एक संगठन खड़ा हो गया। भाजपा के दो मंत्री चौधरी लाल सिंह और चंद्र प्रकाश गंगा भी सक्रिय हो गए, सरकार बचाने की कोशिश में, जिन्हें पद से हाथ धोना पड़ा। जम्मू बार एसोसिएशन को सुप्रीम कोर्ट से नोटिस मिल चुकी है, क्योंकि उसने कानून की प्रक्रिया को अवरुद्ध करने का प्रयास किया। 14 अप्रैल तक भाजपा की ओर से मिश्रित प्रतिक्रियाएं आती रहीं। सरकार बच जाने के बाद महबूबा ने आगाह किया कि घाटी के युवकों को अनसुना किया गया, तो अराजकता पैदा हो सकती है।
कठुआ की घटना के दो चिंताजनक और दुखद पहलू हैं। एक, उस लड़की के पिता बकरवाल समुदाय से हैं। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में कबायली समुदायों, बकरवाल और गुज्जर का योगदान स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। 1947, 1965 और कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों की घुसपैठ का अलर्ट इनके बगैर संभव न होता। जिस तरह उस बच्ची के पूरे समुदाय को बस्ती छोड़कर भागना पड़ा (अपुष्ट रिपोर्टों के मुताबिक, उन्हें अपनी पसंद की जगह पर बेटी को सुपुर्दे खाक भी नहीं करने दिया गया), उनका सामान्य रह पाना बहुत कठिन होगा। हिंदू-मुस्लिम विमर्श से कभी वास्ता न रखने वाले घुमंतुओं को उनकी मुस्लिम पहचान की याद दिला दी गई। यह भुला दिया गया कि नई पहचान की तलाश और उसकी रक्षा नए विस्फोटक मुद्दों को जन्म देती है।
दूसरा दुखद पहलू यह है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की कर्तव्यनिष्ठा और निष्पक्षता पर बार-बार उंगली उठाई गई। हालत यह हो गई कि महानिदेशक शेषपाल वैद को सार्वजनिक हस्तक्षेप के लिए बाध्य होना पड़ा। उन्होंने राज्य के प्रधान सचिव (गृह) को लिखा कि दो सिख अधिकारियों, भूपिंदर सिंह और हरमिंदर सिंह को विशेष अभियोजन अधिकारी नियुक्त किया जाए। यह रेखांकित करना पड़ा कि जांच अधिकारी एक कश्मीरी पंडित है। पहली बार जम्मू-कश्मीर पुलिस को हिंदू-मुस्लिम चश्मे से देखा गया। यह वही सुरक्षा बल है, जो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ फैसलाकुन जंग में हिरावल दस्ते की भूमिका अदा करता रहा है। इस फोर्स के सिपाहियों ने अपने धर्म को भारतीय राष्ट्र-राज्य की सेवा में कभी बाधक नहीं बनने दिया। यह फोर्स तो पूरे देश की सलामी की पात्र है। अब संयुक्त सरकार का टास्क इन दरारों को जल्द से जल्द पाटने से शुरू होता है। कठुआ का पैगाम यह है कि एजेंडा ऑफ अलायंस से जरा भी दाएं-बाएं हुए कि विभाजनकारी शक्तियां फण फैलाकर खड़ी हो जाएंगी।