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सिर्फ पुरुष ही नहीं
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क्षमा शर्मा
उच्चतम न्यायालय में 497 जैसी धारा, जिसमें व्यभिचार पर पति को सजा मिलती है, इस बारे में सरकार ने कहा कि इसे खत्म नहीं करना चाहिए। इसे खत्म करने से विवाह संस्था कमजोर होगी। व्यभिचार को अपराध ही बना रहने देना चाहिए। यह कानून मुख्यतः महिलाओं को संरक्षण देने और विवाह संस्था की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया है। अगर इस कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाएगा, तो यह भारतीय मूल्यों के खिलाफ होगा। इसके खिलाफ दी गई याचिका को खारिज कर देना चाहिए।
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केरल निवासी जोसेफ शिन ने इस कानून को भेदभावपूर्ण बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि इस कानून के तहत न तो महिला को व्यभिचारी माना जाता है, न ही उकसाने वाला। उसे हर परिस्थिति में पीड़ित ही माना जाता है। इसलिए यह कानून भेदभावपूर्ण है।
जोसेफ का कहना सही है। न्याय की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही कानूनन किसी को दोषी मान लेना और किसी को निरपराध, यह मनुष्य के सामान्य नागरिक सिद्धांतों के ही नहीं, लोकतंत्र के विरुद्ध भी है। कानून के जरिये न्याय पाने का हक सबको है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। आज के जमाने में औरतों को बेचारी और पीड़ित मानना भी एक तरह से उनका अपमान करना है।
फिर यह मान लेना भी कि व्यभिचार के दायरे में सिर्फ पुरुष ही आते हैं, ठीक नहीं है। फिर तो सरकार को 498 ए जैसी धारा में उस प्रक्रिया को बने रहने देना चाहिए था, जिसमें किसी औरत की शिकायत भर से दहेज निरोधी धारा के अंतर्गत पति और उसके दूर के नाते-रिश्तेदारों तक को पकड़ लिया जाता था, क्योंकि दहेज अक्सर पति के परिवार वालों द्वारा ही मांगा जाता है और दहेज के लिए आम तौर पर औरतें ही सताई जाती हैं। मगर जिस तरह से इस धारा का दुरुपयोग बढ़ा, उसके कारण सरकार ने इसमें बदलाव के बारे में सोचा।
पति या पुरुष हर हाल में दोषी है और पत्नी या स्त्री हमेशा दोष रहित है, यह कहां की परिभाषा है? किसने इसे बनाया? यह ठीक है कि अपने समाज में औरतें बड़ी संख्या में सताई जाती हैं, मगर वे किसी को नहीं सतातीं, यह मान लेना भी ठीक नहीं है। जन्मना किसी को दोषी मान लेना और किसी को देवत्व प्रदान करना, इस सदी का न्याय तो नहीं ही हो सकता। आखिर पुरुष भी सताए जाते हैं। जनगणना की रिपोर्ट्स और एनसीआरबी के आंकड़ों पर गौर करें, तो वे महिलाओं के मुकाबले बहुत बड़ी संख्या में हर साल आत्महत्या कर लेते हैं। महिलाओं की रक्षा के लिए जो कानून बनाए गए हैं, वहां अक्सर आरोप लगते ही पुरुष को अपराधी साबित कर दिया जाता है। जांच-पड़ताल से पहले ही किसी को दोषी मान लेना न्याय और बराबरी के विरूद्ध है।
आज के दौर में जब लोग लिव इन में रहते हैं, एक संबंध के अलावा बहुत से संबंध भी रखते हैं, उसमें क्या सिर्फ आदमी ही ऐसा करते हैं? शायद नहीं। कोई आंकड़ें भी इस बात की गवाही नहीं दे सकते।
इसलिए होना तो यह चाहिए कि कानून हर उस व्यक्ति को न्याय दे, जो सताया गया है। परेशान है। कानून पर किसी एक वर्ग या एक लिंग की इजारेदारी न हो। जब हम समाज में स्त्री –पुरुष की बराबरी की बात करते हैं तो कानून की तुला पर भी दोनों को बराबर होना चाहिए। इन दिनों अक्सर जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। जो कानून लैंगिक आधार पर भेदभाव करते हैं, उन्हें बदलने की जरूरत है। विवाह की पवित्रता सिर्फ पुरुष को ही सजा देकर नहीं बनी रह सकती।