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जल्दबाजी की जरूरत नहीं
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पुलवामा हमला
वेलेंटाइन डे को पुलवामा जिले में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रही बस पर फिदायीन हमला हाल के समय का सबसे बड़ा आतंकवादी आक्रमण है। बेशक यह बेहद दुखद घटना है, लेकिन यह कई पहलुओं को खोलती है, जो विश्लेषण की मांग करते हैं।
पहला तो यही कि इतना बड़ा काफिला कभी भी अलक्षित नहीं हो सकता। जाहिर है, इसकी खबर फैल गई होगी। इसने आतंकी समूहों को आत्मघाती वाहन और हमलावर के चयन का मौका दे दिया होगा, जिसका वीडियो हमले के तुरंत बाद जारी किया गया। जाहिर है, यह हमला सुनियोजित था। आखिरकार विस्फोटकों से लदे एक वाहन को कम समय में तैयार नहीं किया जा सकता। इसलिए सीआरपीएफ की आसन्न गतिविधि की जानकारी लीक होने की पूरी आशंका है, जिसकी पड़ताल की जानी चाहिए।
इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक प्राप्त करने की आतंकियों की क्षमता की भी जांच होनी चाहिए। यह या तो नियंत्रण रेखा के माध्यम से सीमा पार से खरीदा गया होगा या उन संगठनों से हासिल किया गया होगा, जो इसका काम करते हैं। किसी भी मामले में इसकी जांच करने और खामियों को दूर करने की जरूरत है।
दूसरी बात यह है कि तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद ऐसा हुआ। ऐसे काफिले केवल एक बार सड़क खुलने के दौरान और अपनी सुरक्षा में आगे बढ़ते हैं। सड़क पर आने वाले वाहनों की जांच की जाती है, फिर भी विस्फोटक लदा वह वाहन अंदर घुसने में कैसे कामयाब रहा? इस पर चिंतन-मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता होगी। इससे संकेत मिलता है कि आतंकियों ने इलाके का सर्वे किया और व्यवस्था की खामियों का उन्हें पता था, जिसका उन्होंने फायदा उठाया।
हमले के साथ-साथ वाहनों पर गोलीबारी से पता चलता है कि आतंकवादियों ने सही समय पर अपने खुफिया तंत्र का संचालन किया था, जो सुरक्षा बलों की गतिविधियों से संबंधित जानकारियों के लीक होने की पुष्टि करता है। तीसरा मुद्दा यह है कि अपने आपमें यह आत्मघाती हमला ही है। सुरक्षा बलों के शिविरों पर अब तक जो आत्मघाती हमले हुए हैं, उनमें हमलावर ज्यादातर पाक नागरिक रहे हैं। शायद ही कभी कोई कश्मीरी उसमें शामिल रहा हो। यह हमला घाटी में आतंकवाद के पैटर्न में बदलाव का संकेत दे सकता है, इसलिए सुरक्षा बलों को अपनी मौजूदा रणनीति में बदलाव की आवश्यकता हो सकती है। ऐसी खबरें हैं कि आतंकवादियों को अफगानिस्तान में प्रशिक्षण दिया गया, जो एक चिंताजनक पहलू है।
चौथा मुद्दा हमले के समय से जुड़ा है। चूंकि लोकसभा का चुनाव करीब है, यह हमला भाजपा की छवि को धूमिल कर सकता है, जो कुछ समय पहले तक पाकिस्तान पर अपनी सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता और आतंकी घटनाओं पर रोक का दावा कर रही थी। अगर राजनीतिक दलों में पर्याप्त परिपक्वता होगी, तो इस घटना को चुनाव में मुद्दा नहीं बनना चाहिए। हालांकि, भारतीय राजनीतिक प्रणाली को जानने के बाद कोई भी विरोधी दल सरकार को तुरंत चुनौती नहीं देगा, क्योंकि यह भारतीय भावना की अनदेखी करने जैसा होगा। लेकिन कुछ समय बाद वे सरकार की कश्मीर और पाकिस्तान नीति पर सवाल उठा सकते हैं।
पाकिस्तान स्थित जैश-ए मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। उसने अपनी सेना के निर्देश पर ऐसा किया होगा, जिसका उद्देश्य गुप्त होगा। मुख्य रूप से उसने मौजूदा राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने और स्थानीय आतंकियों की शिथिलता दूर करने के लिए ऐसा किया होगा।
जैसा कि प्रधानमंत्री ने संसद में अपने अंतिम भाषण में कहा कि एक ही पार्टी की बहुमत के सरकार के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का सम्मान किया जाता है, जिसने राष्ट्र को निर्णायक रूप से कार्य करने की ताकत दी। इसलिए पाकिस्तान भारत में एक मजबूत पार्टी की सरकार के बजाय एक कमजोर गठबंधन की सरकार चाहता होगा। इससे उसे अधिक छूट पाने और अपनी शर्तों पर भारत को वार्ता में शामिल करने का मौका मिल सकता है। पर उसे कामयाब नहीं होने दिया जा सकता।
अगला पहलू घाटी में अलगाववादियों का रवैया है। सुरक्षा बलों ने जान गंवाई है और यह राष्ट्र के लिए त्रासदी है। दुख के इस क्षण में भी आतंकवादियों की आलोचना करने से इनकार करना, चुप्पी बनाए रखना और सुरक्षा बलों पर दूसरों की भावनाओं को समझे बिना ताकत का इस्तेमाल करने का आरोप लगाना राष्ट्र-द्रोह के समान है। सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के राष्ट्रीय निहितार्थ हैं। चूंकि सीआरपीए्रफ की भर्ती राष्ट्रीय स्तर पर होती है, इसलिए देश भर में शोक की लहर होगी, क्योंकि जिन लोगों ने अपनी जान गंवाई है या घायल हुए हैं, वे देश के लगभग सभी राज्यों से होंगे। इसके राजनीतिक निहितार्थ भी होंगे।
इससे इनकार नहीं कि अधिकांश आतंकी समूह सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं। हालांकि उन्हें खत्म नहीं किया जा सका है। यह आतंकी हमला अपने चुने हुए स्थान पर हमला करने की उनकी क्षमता को दर्शाता है। ऐसे हमले से उनका मनोबल बढ़ेगा और संभवतः भर्ती भी बढ़ेगी। आतंकवादी उम्मीद करते होंगे कि सुरक्षा बल स्थानीय आबादी के साथ निर्मम होंगे और उन पर संदेह करेंगे। पर ऐसी कार्रवाई दीर्घ काल के लिए नुकसानदेह होगी, इसलिए सुरक्षा बलों को सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय लोगों के प्रति उनका रवैया न बदले। उन्हें पहले की तरह ही आतंकियों पर हमला और उनके नेतृत्व को खत्म करना चाहिए।
पूरे देश से बदला लेने की मांग उठेगी। सरकार भी जानती है कि उसे कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि हमले का समय चुनावों के करीब है। सर्जिकल स्ट्राइक के प्रचार से संकेत मिलता है कि राष्ट्र एक कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद करेगा। बेशक पाकिस्तान के खिलाफ सरकार को कूटनीतिक कार्रवाई जारी रखनी चाहिए, पर अपने विकल्पों और कार्रवाई पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। जल्दबाजी में जवाब देने की जरूरत नहीं है।
एक परिपक्व सरकार सभी विकल्पों को तौलने के बाद अपने चुने हुए समय और स्थान पर तैयारी के साथ कार्रवाई करती है, जब सफलता सुनिश्चित होती है। वह कभी दबाव और अल्पकालिक नतीजे के लिए काम नहीं करती। सरकार का इरादा एक संदेश देना, निडरता पैदा करना और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का निर्माण होना चाहिए। संदेश यह भी होना चाहिए कि ऐसी कार्रवाइयां भारत को प्रभावित नहीं कर सकती हैं।
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पहला तो यही कि इतना बड़ा काफिला कभी भी अलक्षित नहीं हो सकता। जाहिर है, इसकी खबर फैल गई होगी। इसने आतंकी समूहों को आत्मघाती वाहन और हमलावर के चयन का मौका दे दिया होगा, जिसका वीडियो हमले के तुरंत बाद जारी किया गया। जाहिर है, यह हमला सुनियोजित था। आखिरकार विस्फोटकों से लदे एक वाहन को कम समय में तैयार नहीं किया जा सकता। इसलिए सीआरपीएफ की आसन्न गतिविधि की जानकारी लीक होने की पूरी आशंका है, जिसकी पड़ताल की जानी चाहिए।
इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक प्राप्त करने की आतंकियों की क्षमता की भी जांच होनी चाहिए। यह या तो नियंत्रण रेखा के माध्यम से सीमा पार से खरीदा गया होगा या उन संगठनों से हासिल किया गया होगा, जो इसका काम करते हैं। किसी भी मामले में इसकी जांच करने और खामियों को दूर करने की जरूरत है।
दूसरी बात यह है कि तमाम सुरक्षा इंतजामों के बावजूद ऐसा हुआ। ऐसे काफिले केवल एक बार सड़क खुलने के दौरान और अपनी सुरक्षा में आगे बढ़ते हैं। सड़क पर आने वाले वाहनों की जांच की जाती है, फिर भी विस्फोटक लदा वह वाहन अंदर घुसने में कैसे कामयाब रहा? इस पर चिंतन-मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता होगी। इससे संकेत मिलता है कि आतंकियों ने इलाके का सर्वे किया और व्यवस्था की खामियों का उन्हें पता था, जिसका उन्होंने फायदा उठाया।
हमले के साथ-साथ वाहनों पर गोलीबारी से पता चलता है कि आतंकवादियों ने सही समय पर अपने खुफिया तंत्र का संचालन किया था, जो सुरक्षा बलों की गतिविधियों से संबंधित जानकारियों के लीक होने की पुष्टि करता है। तीसरा मुद्दा यह है कि अपने आपमें यह आत्मघाती हमला ही है। सुरक्षा बलों के शिविरों पर अब तक जो आत्मघाती हमले हुए हैं, उनमें हमलावर ज्यादातर पाक नागरिक रहे हैं। शायद ही कभी कोई कश्मीरी उसमें शामिल रहा हो। यह हमला घाटी में आतंकवाद के पैटर्न में बदलाव का संकेत दे सकता है, इसलिए सुरक्षा बलों को अपनी मौजूदा रणनीति में बदलाव की आवश्यकता हो सकती है। ऐसी खबरें हैं कि आतंकवादियों को अफगानिस्तान में प्रशिक्षण दिया गया, जो एक चिंताजनक पहलू है।
चौथा मुद्दा हमले के समय से जुड़ा है। चूंकि लोकसभा का चुनाव करीब है, यह हमला भाजपा की छवि को धूमिल कर सकता है, जो कुछ समय पहले तक पाकिस्तान पर अपनी सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता और आतंकी घटनाओं पर रोक का दावा कर रही थी। अगर राजनीतिक दलों में पर्याप्त परिपक्वता होगी, तो इस घटना को चुनाव में मुद्दा नहीं बनना चाहिए। हालांकि, भारतीय राजनीतिक प्रणाली को जानने के बाद कोई भी विरोधी दल सरकार को तुरंत चुनौती नहीं देगा, क्योंकि यह भारतीय भावना की अनदेखी करने जैसा होगा। लेकिन कुछ समय बाद वे सरकार की कश्मीर और पाकिस्तान नीति पर सवाल उठा सकते हैं।
पाकिस्तान स्थित जैश-ए मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। उसने अपनी सेना के निर्देश पर ऐसा किया होगा, जिसका उद्देश्य गुप्त होगा। मुख्य रूप से उसने मौजूदा राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने और स्थानीय आतंकियों की शिथिलता दूर करने के लिए ऐसा किया होगा।
जैसा कि प्रधानमंत्री ने संसद में अपने अंतिम भाषण में कहा कि एक ही पार्टी की बहुमत के सरकार के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का सम्मान किया जाता है, जिसने राष्ट्र को निर्णायक रूप से कार्य करने की ताकत दी। इसलिए पाकिस्तान भारत में एक मजबूत पार्टी की सरकार के बजाय एक कमजोर गठबंधन की सरकार चाहता होगा। इससे उसे अधिक छूट पाने और अपनी शर्तों पर भारत को वार्ता में शामिल करने का मौका मिल सकता है। पर उसे कामयाब नहीं होने दिया जा सकता।
अगला पहलू घाटी में अलगाववादियों का रवैया है। सुरक्षा बलों ने जान गंवाई है और यह राष्ट्र के लिए त्रासदी है। दुख के इस क्षण में भी आतंकवादियों की आलोचना करने से इनकार करना, चुप्पी बनाए रखना और सुरक्षा बलों पर दूसरों की भावनाओं को समझे बिना ताकत का इस्तेमाल करने का आरोप लगाना राष्ट्र-द्रोह के समान है। सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के राष्ट्रीय निहितार्थ हैं। चूंकि सीआरपीए्रफ की भर्ती राष्ट्रीय स्तर पर होती है, इसलिए देश भर में शोक की लहर होगी, क्योंकि जिन लोगों ने अपनी जान गंवाई है या घायल हुए हैं, वे देश के लगभग सभी राज्यों से होंगे। इसके राजनीतिक निहितार्थ भी होंगे।
इससे इनकार नहीं कि अधिकांश आतंकी समूह सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई से प्रभावित हुए हैं। हालांकि उन्हें खत्म नहीं किया जा सका है। यह आतंकी हमला अपने चुने हुए स्थान पर हमला करने की उनकी क्षमता को दर्शाता है। ऐसे हमले से उनका मनोबल बढ़ेगा और संभवतः भर्ती भी बढ़ेगी। आतंकवादी उम्मीद करते होंगे कि सुरक्षा बल स्थानीय आबादी के साथ निर्मम होंगे और उन पर संदेह करेंगे। पर ऐसी कार्रवाई दीर्घ काल के लिए नुकसानदेह होगी, इसलिए सुरक्षा बलों को सुनिश्चित करना होगा कि स्थानीय लोगों के प्रति उनका रवैया न बदले। उन्हें पहले की तरह ही आतंकियों पर हमला और उनके नेतृत्व को खत्म करना चाहिए।
पूरे देश से बदला लेने की मांग उठेगी। सरकार भी जानती है कि उसे कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि हमले का समय चुनावों के करीब है। सर्जिकल स्ट्राइक के प्रचार से संकेत मिलता है कि राष्ट्र एक कठोर प्रतिक्रिया की उम्मीद करेगा। बेशक पाकिस्तान के खिलाफ सरकार को कूटनीतिक कार्रवाई जारी रखनी चाहिए, पर अपने विकल्पों और कार्रवाई पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। जल्दबाजी में जवाब देने की जरूरत नहीं है।
एक परिपक्व सरकार सभी विकल्पों को तौलने के बाद अपने चुने हुए समय और स्थान पर तैयारी के साथ कार्रवाई करती है, जब सफलता सुनिश्चित होती है। वह कभी दबाव और अल्पकालिक नतीजे के लिए काम नहीं करती। सरकार का इरादा एक संदेश देना, निडरता पैदा करना और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का निर्माण होना चाहिए। संदेश यह भी होना चाहिए कि ऐसी कार्रवाइयां भारत को प्रभावित नहीं कर सकती हैं।